<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5113688638599628772</id><updated>2012-03-01T22:51:08.608+05:30</updated><title type='text'>सदगुरू और सत्संग</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/'/><link rel='hub' 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href="http://1.bp.blogspot.com/-RFahJJb7JAI/T05aV2HmzjI/AAAAAAAAB74/ZGdyXbut3BY/s1600/425999_380205941991853_202856159726833_1566062_1501386316_n.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://1.bp.blogspot.com/-RFahJJb7JAI/T05aV2HmzjI/AAAAAAAAB74/ZGdyXbut3BY/s400/425999_380205941991853_202856159726833_1566062_1501386316_n.jpg" width="300" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: purple; font-size: large;"&gt;सत्संग सुमन&lt;/span&gt;&lt;/b&gt; पुस्तक से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: #134f5c;"&gt;तू ही तू&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जन्म-मृत्यु में ही तू ही तू.... मान तू..... अपमान भी तू.... तन्दरूस्ती तू... रोग भी तू..... सर्वत्र बस तू ही तू।' यदि मनुष्य को ऐसा ज्ञान हो जाये तो वह जीवनमुक्त हो गया। फिर कोई फिक्र नहीं। रोग, दुःख और अपमान में यदि आप अपने ही प्रियतम का हाथ देखेंगे तो ये उतना दुःखी नहीं बनाएँगे, जितना दुःख भेदबुद्धि से होता है। अभेदबुद्धि में दुःख और भय नहीं, उसमें तो ओज, तेज, आनंद, शांति होती है।&lt;br /&gt;आज कल समाज में जितने भी तनाव, खिंचाव, खून आदि &amp;nbsp;हो रहे हैं उनके पीछे भेदबुद्धि का ही हाथ है क्योंकि क्रोध कभी स्वयं पर नहीं, दूसरों पर ही आता है। ऐसे ही मनुष्य कभी भी स्वयं पर मोहित नहीं होता, चाहे वह कितना भी सुन्दर या सुन्दरी हो। मोह दूसरे पर ही होता है। ऐसे ही काम, लोभ, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष आदि हमें स्वयं को देखकर नहीं, अपितु दूसरे को देखकर ही उपजते हैं।&lt;br /&gt;यदि प्रत्येक अवस्था में अपने ही आत्मस्वरूप के दीदार करने की कला आ जाये तो सर्वत्र तू ही तू नजर आएगा।&lt;br /&gt;तस्यैवाहम्-तवैवाहम्-सोहम्।&lt;br /&gt;तस्यैवाहम् अर्थात् मैं उसी का हूँ। तवैवाहम् अर्थात् मैं तेरा हूँ। सोहम् अर्थात् वह मैं हूँ।&lt;br /&gt;मँगनी होने के बाद लड़की कहती हैः "मैं उसकी हूँ।" शादी होने के बाद वह कहती हैः "मैं तेरी हूँ।" घर में रहकर कुछ दिन पुरानी हो जाय और पति का मित्र अगर पूछने आवे कि अमुक भाई कहाँ है ? मुझे उनसे जरूरी काम है तो वह कहती हैः "मुझसे ही कह दो। वे और मैं एक ही हो तो हैं। यह घर मेरा नहीं है क्या ?"&lt;br /&gt;'तू ही तू' मानो मँगनी हुई। 'मेरा तू' अर्थात् शादी हो गई और मैं भी तू यानी काम पक्का हो गया..... मेरा घर है।&lt;br /&gt;मँगनी हुई तो लड़की बोलती है 'उनका घर है... मेरे ससुरालवालों का घर है'। शादी हुई तो कहती है 'मेरे पति का घर है' और थोड़ी पुरानी हो गई तो कहती है 'हमारा घर लगता है।' फिर मायके का घर पराया और ससुरालवाला घर अपना लगता है। यह सब भाव बदलने के कारण ही होता है। बाहर का घर 'मेरा तेरा' तो ठीक है लेकिन आत्मा-परमात्मा 'मैं हूँ.... मेरा है...' ऐसी सोच समझ आ गई तो काम बन जाएगा।&lt;br /&gt;भाव किसी साधन से नहीं, ज्ञान से बदलता है। बकरे के गले में फँदा हो फिर आप उसे घास खिलाओ, मिठाई खिलाओ, अगरबत्ती करो चाहे आरती करो फिर भी बँधन नहीं छूटेगा लेकिन फँदा कहाँ है व कैसे कटेगा यह जानकर कैंची ले आओ। बस, काम बन जाएगा। ऐसे ही मन रूपी बकरे के गले में जो फँदा पड़ा है उसे समझो.... विवेक, वैराग्य और सत्संग की कैंची से काटो तो जीव स्वतंत्र, स्व के तंत्र हो जाएगा।&lt;br /&gt;भगवान कहते हैः&lt;br /&gt;येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।&lt;br /&gt;ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः।।&lt;br /&gt;"जिन पुण्यकर्मा मनुष्यों के पाप नष्ट हो गये हैं, वे द्वन्द्व-मोह से रहित हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं।"&lt;br /&gt;(गीताः 7.28)&lt;br /&gt;द्वन्द्व क्या है ? सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान आदि सब द्वन्द्व हैं। द्वन्द्व और मोह से मुक्त पुरूष 'यह अच्छा कि वह अच्छा.... संसार में ऊँचे रहें कि भक्ति करें....' ऐसे संकल्प-विकल्प से रहित हो जातें। संसार की नश्वरता को वे भलीभाँति जान चुके होते हैं। ऐसे पुण्यात्मा लोग दृढ़ता से भगवान का भजन करते हैं और परमात्मतत्त्व के ज्ञान एवं विज्ञान को प्राप्त करते हैं।&lt;br /&gt;विद्याएँ तीन प्रकार की होती हैं- पहली ऐहिक विद्याः स्कूल-कॉलेजों में आज कल जो पेट भरने की विद्या मिलती है, वह ऐहिक विद्या कहलाती है।&lt;br /&gt;दूसरी योगविद्याः इससे अलौकिक सामर्थ्य आती है।&lt;br /&gt;तीसरी आत्मविद्याः ऐसा ज्ञान-विज्ञान प्राप्त करना, जिसका उल्लेख गीता में है।&lt;br /&gt;ज्ञान अपनी आत्मा का प्राप्त करना चाहिए कि मैं कौन हूँ ? शरीर का नाम तो रख दिया कि अमुक भाई, अमुक साहब, डॉक्टर साहब, वकील साहब, न्यायाधीश, कलेक्टर, संत आदि लेकिन ये सारे नाम शरीर तक ही संबंध रखते हैं। शरीर खत्म हो गया तो सब छू हो जाएँगे लेकिन ये सारे नाम-रूप और मन-बुद्धि की सत्ता स्फूर्ति जहाँ से आती है वह आत्मा है। उस आत्मा का ज्ञान पाना चाहिए कि आत्मा कैसा है ? उसका स्वरूप क्या है ? हम कौन हैं ? कहाँ से आये हैं ? लाखों-करोड़ों जन्म हो गये। हम शरीर लेते गये.... छोड़ते गये। वास्तव में हम कौन हैं ? इसका वेदान्ती व तत्त्वदृष्टि से ज्ञान प्राप्त करके, श्रवण करके फिर उसके अनुभव में आ जाना इसे कहते हैं विज्ञान।&lt;br /&gt;ऐहिक विज्ञान एक पृथक विषय है जिसमें वस्तुओं का ज्ञान होने पर उनका परिवर्तन, परिमार्जन कर उन्हें उपयोगी बनाना एवं उनमें संशोधन कर उनकी उपयोगिता बढ़ाना ऐहिक विज्ञान कहलाता है। लेकिन अपने स्वरूप के ज्ञान को अनुभव में लाना यह आत्मविज्ञान है। इलेक्ट्रीसीटी और इलेक्ट्रानिकरण का ज्ञान हुआ तो कितना लाभ होता है। विद्युत तत्त्व के ज्ञान के उपयोग से हम अनेकानेक उपकरण चलाते हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु व आकाश तत्त्व का यदि हम ज्ञान पाते हैं तो अनेकानेक ऐहिक लाभ होते हैं लेकिन ये पंचमहाभूत जिस प्रकृति से संचलित होते हैं, उस प्रकृति को संचालित करनेवाले आत्मा-परमात्मा का यदि ज्ञान पावें तो कितना सारा लाभ हो सकता है !&lt;br /&gt;चपरासी के घर की वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करके उसका उपयोग करने से इतनी खुशी मिलती है तो राष्ट्रपति के घर का खजाना मिल &amp;nbsp;जाए तो आपको कितना लाभ होगा ? .....और परमात्मा तो फिर राष्ट्रपतियों का भी राष्ट्रपति है। प्रवृत्ति परमात्मा के चरणों की दासी है। उस वासी के पंचभौतिक जगत के थोड़े से हिस्से का भी यदि ठीक से ज्ञान हो जाता है तो सांसारिक प्रसिद्धि मिल जाती है।&lt;br /&gt;आईन्स्टीन ने रिसर्च किया तो कितना प्रसिद्ध हो गया !&lt;br /&gt;जमनदादास बजाज के जामाता एवं गुजरात के भूतपूर्व राज्यपाल श्रीमन्ननारायण ने आईन्स्टीन से पूछाः "रिसर्च की दुनिया में तुम इतने आगे कैसे बढ़ गये ?"&lt;br /&gt;आईन्स्टीन ने कहाः "चलो, मैं दिखाता हूँ।" वह हाथ पकड़कर उन्हें एक कमरे में ले गया। कमरा साफ-सुथरा था जिसमें ध्यान करने के लिए एक आसन बिछा था और एक मूर्ति थी। आईन्स्टीन ने कहाः "मैं भारतीय योगविद्या के अनुसार प्रतिदिन ध्यान करता हूँ। मेरी पत्नी के साथ पिछले चार वर्षों से मेरा शारीरिक संबंध नहीं है। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने से मेरा तीसरा केन्द्र विकसित हुआ जिसे रिसर्च की दुनिया में लगाने से यह सब कुछ प्राप्त हुआ। मेरे लिये तो यह आसान है लेकिन लोगों के लिए चमत्कार है।"&lt;br /&gt;योगविद्या का आंशिक ज्ञान पाकर उस शक्ति को रिसर्च की दुनिया में खर्च कर आईन्स्टीन विश्वविख्यात हो गया। समर्थ रामदास ने योगविद्या सहित आत्मविद्या का ज्ञान पाया तो शिवाजी को इतना बल, शांति और समता मिली कि राजवैभव होते हुए भी शिवाजी राज्यदोष में नहीं आये।&lt;br /&gt;मुगल शासकों से शिवाजी का युद्ध होता और मुगलों की हार होती तो उनके सरदार तोहफे में खूबसूरत राजकुमारियाँ, शाहजादियाँ ले आते। अगर दूसरा कोई राजा होता तो तोहफा पाकर बोल उठताः "वाह ! शाबास !!" और लाने वाले को इनाम देता लेकिन शिवाजी कहते थेः "नहीं। हमारी दुश्मनी तो राजा से थी, उसकी कन्या या पत्नी से नहीं।"&lt;br /&gt;सरदार कहतेः "हम तो आपके लिए तोहफा लाये हैं। आप इसे अपनी भार्या बनाइये। यह बहुत सुन्दर है।"&lt;br /&gt;तब शिवाजी कहतेः "यह सुन्दर है तो मुझे अगर दूसरे जन्म में आना पड़ा तो ऐसी सुन्दर माँ की कोख से जन्म लूँगा। यह तो मेरी बहन के समान है, माँ के समान है।"&lt;br /&gt;भारतीय संस्कृति कितनी उदार है। कितनी महान है !! समर्थ रामदास की अनुभूति का प्रसाद शिवाजी के जीवन में उतरा है। इसे कहते हैं ज्ञान विज्ञान।&lt;br /&gt;मनुष्य का आत्मा इतना सुखस्वरूप है कि उसे ऐहिक विकारों की तो तनिक सी भी आवश्यकता नहीं है लेकिन उन बेचारे ने अपने लेकिन उस बेचारे ने अपने आत्मसुख का अभी ज्ञान ही नहीं पाया तो विज्ञान कैसे पायेगा ? इसी कारण तो उसे तृप्ति नहीं होती है और कहता हैः "सिगरेट, तू सुख दे। डिस्को, तू सुख दे। परदेश के रूपयों की थप्पियाँ, तुम सुख दो...." लेकिन वे बेचारी खुद लाचार हैं सुख के लेने के लिए।&lt;br /&gt;विदेशों में पति भी दुःखी है, पत्नी भी दुःखी है, उनके बच्चे भी दुःखी हैं इन चीजों से। मैंने विश्व के कई देशों की यात्रा की और देखा कि उन लोगों ने कितना भी एकत्रित कर लिया, कितना भी डिस्को कर लिया लेकिन उन लोगों में हमारे देश की तुलना में कई गुना अशांति है क्योंकि वहाँ ऐहिक ज्ञान-विज्ञान तो है लेकिन आत्मज्ञान का प्रसाद नहीं है। ऐहिक ज्ञान तो प्रकृति का अंश मात्र है, लेकिन प्रकृति को जहाँ से सत्ता आती है, उस स्व का, परमात्मतत्त्व का ज्ञान मिल जाए और उस ज्ञान में थोड़ी यात्रा करके गहरा उतर कर उस विज्ञान का अनुभव कर लिया जाए तो वह व्यक्ति सुखी, खुशहाल व तृप्त हो जाता है। फिर ऐसा आदमी अगर लाखों पुरूषों के बीच भी बोले तो उन सभी को अन्तरात्मा की तृप्ति की झलकें प्राप्त हो जाती हैं जो कि संसार से प्राप्त होना असंभव है।&lt;br /&gt;गीता प्रेस, गोरखपुर के भक्तांक में एक घटना प्रकाशित हुई थी। काशी में एक महात्मा की कुटी की द्वार पर कोई बिल्ली मर गयी थी। महात्मा का स्वभाव दयालु था अतः उन्होंने बिल्ली को कपड़े में लपेटकर गंगाजी में प्रवाहित कर दिया तो बिल्ली का जीव देव की देह धारण करके प्रकट होकर बोलाः&lt;br /&gt;"महात्मा जी ! आपने मेरा कल्याण कर दिया। मैं वही बिल्ली हूँ जो आपके द्वार पर मरी हुई पड़ी थी। आपकी दृष्टि पड़ने से तथा आपके करकमलों से अत्येष्टि होने से मुझे देव की देह मिली है, महाराज !"&lt;br /&gt;यह भी कोई बड़ी बात नहीं है। जो ज्ञान-विज्ञान से तृप्त होता है ऐसा महापुरूष यदि किसी मुर्दे की जलती चिता के धुएँ को भी देख लेता है तो फिर मरने वाला महापापी व पातकी भी क्यों न रहा हो, उसे नरक की यात्रा नहीं करनी पड़ती, उसकी सदगति हो जाती है। यह कितना अदभुत विज्ञान है !&lt;br /&gt;सितारों से आगे जहाँ कुछ और भी है।&lt;br /&gt;इश्क के इम्तहाँ कुछ और भी है।।&lt;br /&gt;बालक के सम्मुख चाकलेट, लालीपॉप व बिस्किट के साथ चाहे आप हीरे जवाहरात रख दो या सुन्दर कीमती रत्न, मोती रख दो, वह नन्हा-मुन्ना इन रत्नों को छूकर या देखकर नहीं रख देगा और चॉकलेट-बिस्किट में खुश हो जाएगा। ऐसे ही हमारी मति भी ऐहिक जगत में उलझी होकर तात्त्विक दृष्टि से नन्हें-मुन्नों जैसी ही है। हम भी संसार के खिलौनों में इतना उलझ जाते हैं कि आत्महीरा हमारे साथ, हमारे पास होते हुए भी हमें अनुभूति नहीं होती है। जब तक आत्मा-परमात्मा के विषय में हमने श्रवण-मनन नहीं किया और भीतर थोड़ा रिसर्च नहीं किया तब तक आत्महीन ऐसे ही पढ़ा रह जाता है।&lt;br /&gt;तुलसीदास जी ने कहा हैः&lt;br /&gt;घट में है सूझे नहीं, नालत ऐसे जिन्द।&lt;br /&gt;तुलसी ऐसे जीव को, भयो मोतियाबिन्द।।&lt;br /&gt;कबीर जी ने कहा हैः&lt;br /&gt;भटक मूँआ भेदू बिना पावे कौन उपाय।&lt;br /&gt;खोजत खोजत जुग गये, पाव कोस घर आय।।&lt;br /&gt;आदमी खोजता क्या है ? सुख। सुख भी कैसा ? ऐसा नहीं कि आपको दस मिनट के लिए सुख मिले फिर दुःख। दस घंटे, दस दिन या दस साल तक आपको सुख मिले फिर भी बाद में आप दुःख नहीं चाहते हैं। जीवन भर सुख और मरने के बाद आपको दुःख मिले ऐसा भी आप नहीं चाहते। कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं चाहता। सदा रहने वाला सुख प्रत्येक मनुष्य की माँग है लेकिन वह कितनी भी कोशिश करके देख ले, सदा रहने वाला सुख प्रकृति में है ही नहीं।&lt;br /&gt;स्थाई सुख की माँग है तो ऐसा सुख भी कहीं न कहीं है। वह दूर नहीं, किसी आकाश-पाताल में नहीं, वह तो तुम्हारे वास्तविक शुद्ध स्वभाव में है, उसका तुम ज्ञान प्राप्त कर लोगे तो सदा रहने वाला सुख तुम्हारे घर का खजाना हो जाएगा।&lt;br /&gt;जो सुख नित्य प्रकाश विभू नाम रूप आधार।&lt;br /&gt;वह नित्य है, प्रकाशस्वरूप है, लेकिन सूर्य, विद्युत या नेत्रों के प्रकाशस्वरूप नहीं, उसे देखने के लिए तो मन का प्रकाश चाहिए।&lt;br /&gt;ज्योतिषामपि तज्ज्योतिः तमसः परमुच्यते।&lt;br /&gt;वह अन्धकार से परे, माया से परे, ज्योतियों की ज्योति तुम्हारा आत्मा है। मन ठीक देखता है कि नहीं इसे भी देखने वाली मति है और मति ठीक है कि नहीं इसे देखने वाली ज्योति है आत्मज्योति। वह सदा ज्यों की त्यों रहती है। नेत्रों की ज्योति, सूर्य-चन्द्र की ज्योति, अग्नि और विद्युत की ज्योति तो कम ज्यादा हो जाती है लेकिन अंधकार में भी महाअंधकार को देखने वाली, दुःख और सुख दोनों ही को देखने वाली आत्मज्योति है। हम दुःख से जुड़ जाते हैं तो दुःखी होते हैं और सुख से जुड़ जाते हैं तो आसक्त होते हैं क्योंकि हमें अपना ज्ञान नहीं है। यदि हम अपने ज्ञान से जुड़ जावें तो न तो हमें आसक्ति होगी, न सुख होगा, न दुःख होगा। हम सदैव परमानंद में रह सकते हैं, ऐसा हमारा आत्मदेव है।&lt;br /&gt;ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।&lt;br /&gt;युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।।&lt;br /&gt;"जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जो कूटस्थ है, कूट की तरह निर्विकार है, जितेन्द्रिय है और मिट्टी के ढेले, पत्थर तथा स्वर्ण में समबुद्धिवाला है, ऐसा योगी युक्त (योगरूढ़) कहा जाता है।"&lt;br /&gt;(गीताः 6.8)&lt;br /&gt;भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने राज्याभिषेकोपरांत अपने पिताश्री का श्राद्धकर्म किया जिसमें भुजाएँ पसारकर सबको आमंत्रित किया किः "देव, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, देवाधिदेव और महादेव भी अगर इस दास राम की प्रार्थना सुन लें तो पधार सकते हैं।"&lt;br /&gt;श्राद्ध हुआ। जिन्हे रूचि थे वे साधु-संत तो आये ही अपितु साधुओं के भी साधु भगवान सांब सदाशिव भी साधुओं का वेष धारणकरके अयोध्या आये। जिन्हें भुवनों को भंग करने का व्यसन है, ऐसे शिवजी अगर भोजन करने बैठें तो उनकी मौज है ! वे एक ग्रास से भी तृप्त हो सकते हैं और पूरी सृष्टि को स्वाहा कर दें फिर भी अतृप्त रह सकते हैं। उनके संकल्प का अपना अनुपम सामर्थ्य है। शिवजी को तो लीला करनी थी। जितना भी परोसा सब स्वाहा... थाली में आया कि स्वाहा।&lt;br /&gt;भरत और शत्रुघ्न परोसते-परोसते थक गये तो लखन भैया से कहा गया। वे भी परोसने में अपना जोर आजमाते हुए थकने लगे। लखनजी भी देखते हैं कि ये बाबा गजब के हैं !&lt;br /&gt;वे राम जी के पास गये और कहने लगेः "ये बाबा जी को जितना भी परोसते हैं सब खत्म कर जाते हैं। परोसकर वापस लेने जाते हैं तब तक वे थाली साफ कर देते हैं और पेट की आकृति वही की वही है। तनिक सा भी फर्क नहीं पड़ रहा है। ऊपर से आवाज देकर परोसने बुला रहे हैं। हजारों लोगों को अभी भोजन कराना बाकी है। हमने सोचा कि पहले बाबा लोगों को भोजन करवा दें बाद में अन्य लोगों को करवाएँगे। दूसरे सभी बाबा तो तृप्त हो गये मात्र दो-तीन बार परोसने मे ही लेकिन इन बाबा ने पेंदे की आवाज भी सुन मारी है फिर भी भूखे ही हैं। अब क्या करें प्रभु !"&lt;br /&gt;प्रभु आये और देखा कि ये कोई पृथ्वीलोक का बाबा नहीं, यह तो शिवलोक का बाबा है। भगवान सांब सदाशिव स्वयं पधारे हैं। रामजी ने मन ही मन प्रणाम किया और आनंदित हुए। उन्होंने लक्ष्मण जी से कहा कि इन बाबा को तृप्त करना हमारे बस की बात नहीं है। रामजी ने माँ अन्नपूर्णा (पार्वती) का आवाहन कर माँ से ही परोसने का अनुरोध किया। माँ परोसने लगी तो बाबा बोलते हैं- "बस ! अब खेल खत्म हुआ।"&lt;br /&gt;शिवजी ने यह खेल खत्म करते ही दूसरा खेल शुरू कर दिया। शत्रुघ्न को शिवजीरूपी बाबा कहते हैं- "तुम तो शत्रुओं का नाश करने वाले शत्रुघ्न हो।"&lt;br /&gt;शत्रुघ्नः "हाँ, महाराज !"&lt;br /&gt;शिवजीः "अच्छा, तो मुझे सहारा देकर उठा दो। बहुत खाया है तो उठा नहीं जा रहा है।" शत्रुघ्न ने अपना जोर लगाया लेकिन वे उठा न सके। आज तक शत्रुघ्न के मन में जो थोड़ी-बहुत हवा घुसी होगी वह बराबर हो गई। भगवान और तो सब कुछ सहन कर लेते हैं लेकिन अपने प्रिय भक्त का अहंकार नहीं सहते हैं। शिवजी ने अब भरत से कहाः&lt;br /&gt;"भरत भैया ! तुम थोड़ी कोशिश करो।" भरत जी ने भी कोशिश करने के बाद क्षमा माँगी।&lt;br /&gt;शिवजीः "लक्ष्मण लाला ! तुम उठा दो भाई ! बहुत खिला दिया है, इसलिए हम उठ नहीं पा रहे हैं।"&lt;br /&gt;लक्ष्मणजी रामजी के साथ अधिक रहे थे। बड़ों के साथ अधिक रहने से दृष्टि भी बड़ी होती है। अपने से उच्च पुरूषों का संग करने से सहज में ही मति की ऊँचाई होती है और नीच व्यक्तियों की बातों में आने से बहुत नुकसान होते हैं।&lt;br /&gt;राजा जनक ने ज्ञान-विज्ञान से तृप्त अष्टावक्र की शरण ली तो वे भी ज्ञान-विज्ञान से तृप्त हो गये। अश्व राजा, शिवाजी महाराज तथा अन्य वे सभी राजा-महाराजा, जिन्होंने ज्ञान-विज्ञान से तृप्त ब्रह्मवेत्ताओं की शरण ली, वे भी वहाँ पहुँच गये।&lt;br /&gt;जैसा आपका संग होगा वैसा ही रंग आपको लगेगा। आपका मन उस सच्चिदानंद चैतन्य परमात्मा से स्फुरित होता है इसलिए बड़ा संवेदनशील रहता है। इसको जैसा रंग लगा दो, तुरन्त लग जाता है।&lt;br /&gt;धरती में तमाम प्रकार के बीजों में रस भरने की शक्ति है। जैसा बीज होता है, ऐसा रस ले आता है धरती से। ऐसे ही हमारा साहित्य कैसा है ? हमारा संग कैसा है ? हमारा खानपान कैसा है ? हमारी इच्छा कैसी है ? हमारी आवश्यकता कैसी है ? जैसी-जैसी हमारी इच्छा, आवश्यकता, संग, खानपान आदि होते हैं, देर सवेर वैसी ही हमें प्राप्ति होती है।&lt;br /&gt;नश्वर वस्तुओं की इच्छा-वासना बढ़ाने वाला संग करके नश्वर वस्तुओं की ही सत्यबुद्धि से इच्छा और प्रयत्न करते हैं तो हम नश्वर वस्तु और नश्वर शरीर प्राप्त करते जाते हैं... फिर मरते जाते हैं.... फिर जन्मते जाते हैं। यदि हम शाश्वत का ज्ञान सुनें, शाश्वत की इच्छा पैदा हो और मनन करके शाश्वत की गहराई में तनिक सी खोज करें तो शाश्वत आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार भी हो सकता है। वे लोग सचमुच में भाग्यशाली है जिनकी सत्संग में रूचि है और जिन्हें आत्मज्ञान और आत्मविज्ञान श्रवणार्थ मिलता है।&lt;br /&gt;शिवजी ने लक्ष्मण की ओर देखा तो लक्ष्मण जी भगवान राम से प्रार्थना करते हैं- "प्रभु ! आपकी कृपा और आशीर्वाद होगा तो ही मैं सफल हो सकूँगा अन्यथा दोनों भ्राताओं जैसा मेरा हाल भी होगा।" श्रीराम का संकेत पाकर लक्ष्मणजी ने शिवजी से प्रार्थना की किः "नाथ ! उठेंगे तो आप अपनी ही सत्ता से, किन्तु यश इस दास को मिल रहा है।"&lt;br /&gt;शिवजी प्रसन्न होकर उठ खड़े हुए।&lt;br /&gt;राम जी गालों में मन्द-मन्द मुस्कराये।&lt;br /&gt;मुस्कान तीन प्रकार की होती है। एक तो साधारण तौर पर हम लोग ठहाका मारकर खुलेआम हँसते हैं- स्वास्थ्य के लिये यह बहुत अच्छा है।&lt;br /&gt;दूसरी होती है मधुर मुस्कान, जो गालों में ही मुस्करा दी जाती है।&lt;br /&gt;तीसरी है यौगिक मुस्कान, जिसे ज्ञान-विज्ञान से तृप्त हुए आत्मयोगी पुरूष नेत्रों से मुस्कुरा देते हैं। नेत्रों की यह मुस्कान इतना अधिक महत्त्व रखती है कि हजारों नहीं, लाखों आदमी भी अगर बैठे हों और योगी नेत्रों से मुस्कुरा दिया तो लाखों आदमियों को ऐसी शीतलता, शांति और आनंद मिलेगा जो दुनिया की तमाम सुख-सुविधाओं और साधनों के उपभोग से भी उन्हें नहीं मिल सकता है। जिन्हें श्रीराम, श्रीकृष्ण अथवा महापुरूषों के नेत्रों की मुस्कान मिली होगी, उसका आनंद वे ही जानते होंगे।&lt;br /&gt;निगाहों से वे निहाल हो जाते हैं&lt;br /&gt;जो निगाहों में आ जाते हैं।।&lt;br /&gt;ब्रह्मज्ञानी की दृष्टी अमृतवर्षी।&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण ने भी ऐसा ही अमृत बरसाया था अन्यथा बाँसुरी की धून से ग्वाल-गोपियाँ पागल हो जाएँ और गौ के बछड़े दूध पीना छोड़ दें यह संभव नहीं था। बंसी के साथ श्रीकृष्ण के नेत्रों की मुस्कान छलकती थी तभी तो ग्वाल-बाल बावरे हो जाते थे।&lt;br /&gt;सिंधी जगत में एक भजन बना हैः&lt;br /&gt;क्या जादू हणी मुंजे जीय में जोगी....&lt;br /&gt;तिन सामीन खे त संभार्या पई।&lt;br /&gt;करे याद उननजी रहमत खे&lt;br /&gt;मां वर वर ओडां निहार्या पई।।&lt;br /&gt;"मेरे जी में, मेरे हृदय में, मेरे चित्त में वह जोगी जादू लगाकर गया है। एक निगाह डाल दी बस ! अब मैं उन्हें बार-बार याद करती हूँ।"&lt;br /&gt;रामकृष्ण परमहंस ने नरेंद्र पर ऐसा ही जादू बरसाया था कि नरेन्द्र में से विवेकानंद हो गये जिन्होंने कहा थाः "मुझे बेचकर चने खा जायें ऐसे विद्वान मेरे कालेज से निकले। मेरी कक्षा के लड़के व मुझे पढ़ानेवाले लोग भी मुझसे आगे थे। काशी में मुझे बेचकर चने खा जाएँ ऐसे विद्वान अभी-भी मिलेंगे फिर भी खेतड़ी के महाराजा रथ में से घोड़ों को हटाकर स्वयं रथ खींचते थे और मुझे बिठाकर स्वागत करते थे, यह मेरे गुरूदेव की निगाह का प्रसाद नहीं तो और क्या है....?"&lt;br /&gt;नूरानी नजर सां दिलबर दरवेशन मोखे निहाल करे छड्यो।&lt;br /&gt;ज्ञान-विज्ञान से जो तृप्त हुए हैं उनकी नजरें नूरानी होती हैं। बाहर से तो वे साधारण दिखती हैं लेकिन उन आँखों से सदैव जो आध्यात्मिकता की ज्योति का प्रकाश बरसता है वह अदभुत होता है।&lt;br /&gt;अमेरिका की डेलाबार प्रयोगशाला में पिछले दस वर्षों से निरंतर रिसर्च करते हुए वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि जो उन्नत एवं उत्तम पुरूष हैं उनकी दृष्टि पड़ते ही या उनके वातावरण में आते ही हमारे एक घन मिलीमीटर रक्त में 1500 श्वेतकण निर्मित होते हैं जो आरोग्यता और प्रसन्नता प्रदान करने में सहायक होते हैं।&lt;br /&gt;विज्ञान तो अब बता रहा है लेकिन हमारे शास्त्र, संत और परम्परा तो सदियों से कहती आ रही है कि दूल्हा-दुल्हन जब आवें तो पहले उन्हें गुरू महाराज के पास शीश नवाने भेजना चाहिए। मरणोपरांत शवयात्रा ले जाते समय श्मशान के मार्ग में कोई मंदिर आता है तो उस मुर्दे को भी देवदर्शन करवाने का विधान है ताकि देवदर्शन के निमित्त किसी हृदय के ज्ञान-विज्ञान से तृप्त हुए महापुरूष की नजर पड़ जाए तो इस मुर्दे का भी कल्याण हो जाए। यह हमारी व्यवस्था थी।&lt;br /&gt;ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।&lt;br /&gt;युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।।&lt;br /&gt;'जिसका अंतःकरण ज्ञान विज्ञान से तृप्त है, जो कूट की तरह निर्विकार है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान है वह योगी युक्त अर्थात् भगवत्प्राप्त है ऐसा कहा जाता है।'&lt;br /&gt;(भगवद् गीताः 6.8)&lt;br /&gt;कूट अर्थात् लोहार की ऐरन, सुनार की ऐरन। सुनार की ऐरन पर गहने बनते जाते हैं, गहनों में चमक व डिजाइनें बनती हैं लेकिन ऐरन जैसी की तैसी ही रहती हैं। ऐसे ही तुम्हारी आत्मा पर मन-बुद्धि के विचार एवं सुख-दुःख की तरंगे आती हैं लेकिन तुम्हारे निजी स्वस्वरूप पर कोई असर नहीं पड़ता है, इस प्रकार का ज्ञान प्राप्त कर यदि आप उसका अनुभव कर लेंगे तो परमात्मतत्त्व के ज्ञान-विज्ञान से आप भी तृप्त हो जाएँगे व दूसरों को भी तृप्त करने का सामर्थ्य पा लेंगे।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-3907729247366547238?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/3907729247366547238/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2012/02/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/3907729247366547238'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/3907729247366547238'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2012/02/blog-post.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://3.bp.blogspot.com/-SYU1kli6gA4/TXJ-0PC2mJI/AAAAAAAAAY4/MN_oJ9Hu2-4/s220/IMG0345A.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-RFahJJb7JAI/T05aV2HmzjI/AAAAAAAAB74/ZGdyXbut3BY/s72-c/425999_380205941991853_202856159726833_1566062_1501386316_n.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5113688638599628772.post-7608681643337217961</id><published>2012-01-29T20:11:00.004+05:30</published><updated>2012-01-29T20:17:06.135+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-acvI4Y77eqM/TyVaIdZzDEI/AAAAAAAAAyI/fzGiZxJ42n8/s1600/413524_289809347741964_100001387040518_810457_1405327217_o.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="258" src="http://4.bp.blogspot.com/-acvI4Y77eqM/TyVaIdZzDEI/AAAAAAAAAyI/fzGiZxJ42n8/s400/413524_289809347741964_100001387040518_810457_1405327217_o.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="background-color: #f6f6f6; font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: x-large;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&lt;span style="color: #351c75;"&gt;क्या करें, न करें&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang="HI" style="background-color: #f6f6f6; font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 14px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium; font-weight: bold;"&gt;&lt;span style="color: #351c75;"&gt;? &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #274e13; font-size: medium; font-weight: bold;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;पुस्तक से&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: #a64d79;"&gt;घर में सुख-शांति के लिए&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तुशास्त्र के नियमों के उचित पालन से शरीर की जैव-रासायनिक क्रिया को संतुलित रखने में सहायता मिलती है।&lt;br /&gt;घर या वास्तु के मुख्य दरवाजे में देहरी (दहलीज) लगाने से अनेक अनिष्टकारी शक्तियाँ प्रवेश नहीं कर पातीं व दूर रहती हैं। प्रतिदिन सुबह मुख्य द्वार के सामने हल्दी, कुमकुम व गोमूत्र मिश्रित गोबर से स्वस्तिक, कलश आदि आकारों में रंगोली बनाकर देहरी (दहलीज) एवं रंगोली की पूजा कर परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि 'हे ईश्वर ! आप मेरे घर व स्वास्थ्य की अनिष्ट शक्तियों से रक्षा करें।'&lt;br /&gt;प्रवेश-द्वार के ऊपर नीम, आम, अशोक आदि के पत्ते का तोरण (बंदनवार) बाँधना मंगलकारी है।&lt;br /&gt;वास्तु कि मुख्य द्वार के सामने भोजन-कक्ष, रसोईघर या खाने की मेज नहीं होनी चाहिए।&lt;br /&gt;मुख्य द्वार के अलावा पूजाघर, भोजन-कक्ष एवं तिजोरी के कमरे के दरवाजे पर भी देहरी (दहलीज) अवश्य लगवानी चाहिए।&lt;br /&gt;भूमि-पूजन, वास्तु-शांति, गृह-प्रवेश आदि सामान्यतः शनिवार एवं मंगलवार को नहीं करने चाहिए।&lt;br /&gt;गृहस्थियों को शयन-कक्ष में सफेद संगमरमर नहीं लगाना चाहिए क्योंकि यह पवित्रता का द्योतक है।&lt;br /&gt;कार्यालय के कामकाज, अध्ययन आदि के लिए बैठने का स्थान छत की बीम के नीचे नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे मानसिक दबाव रहता है।&lt;br /&gt;बीम के नीचे वाले स्थान में भोजन बनाना व करना नहीं चाहिए। इससे आर्थिक हानि हो सकती है। बीम के नीचे सोने से स्वास्थ्य में गड़बड़ होती है तथा नींद ठीक से नहीं आती।&lt;br /&gt;जिस घर, इमारत आदि के मध्य भाग (ब्रह्मस्थान) में कुआँ या गड्ढा रहता है, वहाँ रहने वालों की प्रगति में रूकावट आती है एवं अनेक प्रकार के दुःखों एवं कष्टों का सामना करना पड़ता है।&lt;br /&gt;घर का ब्रह्मस्थान परिवार का एक उपयोगी मिलन स्थल है, जो परिवार को एक डोर में बाँधे रखता है।&lt;br /&gt;यदि ब्रह्मस्थान की चारों सीमारेखाओं की अपेक्षा उसका केन्द्रीय भाग नीचा हो या केन्द्रीय भाग पर कोई वजनदार वस्तु रखी हो तो इसको बहुत अशुभ व अनिष्टकारी माना जाता है। इससे आपकी आंतरिक शक्ति में कमी आ सकती है व इसे संततिनाशक भी बताया गया है।&lt;br /&gt;ब्रह्मस्थान में क्या निर्माण करने से क्या लाभ व क्या हानियाँ होती हैं, इसका विवरण इस प्रकार हैः&lt;br /&gt;बैठक कक्ष- परिवार के सदस्यों में सामंजस्य&lt;br /&gt;भोजन कक्ष- गृहस्वामी को समस्याएँ, गृहनाश&lt;br /&gt;सीढ़ियाँ – मानसिक तनाव व धन नाश&lt;br /&gt;लिफ्ट – गृहनाश&lt;br /&gt;शौचालय – धनहानि एवं स्वास्थ्य हानि&lt;br /&gt;परिभ्रमण स्थान – उत्तम&lt;br /&gt;गृहस्वामी द्वारा ब्रह्मस्थान पर रहने, सोने या फैक्ट्री, दफ्तर, दुकान आदि में बैठने से बाकी सभी लोग उसके कहे अनुसार कार्य करते हैं और आज्ञापालन में विरोध नहीं करते। अपने अधीन कर्मचारी को इस स्थान पर नहीं बैठाना चाहिए, अन्यथा उसका प्रभाव आपसे अधिक हो जायेगा। इस स्थान को कभी भी किराये पर नहीं देना चाहिए।&lt;br /&gt;नैर्ऋत्य दिशा में यदि शौचालय अथवा रसोईघर का निर्माण हुआ हो तो गृहस्वामी को सदैव स्वास्थ्य-संबंधी मुश्किलें रहती हैं। अतः इन्हें सर्वप्रथम हटा लेना चाहिए। चीनी 'वायु-जल' वास्तुपद्धति 'फेंगशुई' के मत से यहाँ गहरे पीले रंग का 0 वाट का बल्ब सदैव जलता रखने से इस दोष का काफी हद तक निवारण सम्भव है।&lt;br /&gt;ईशान रखें नीचा, नैर्ऋत्य रखें ऊँचा।&lt;br /&gt;यदि चाहते हों वास्तु से अच्छा नतीजा।।&lt;br /&gt;शौचकूप (सैप्टिक टैंक) उत्तर दिशा के मध्यभाग में बनाना सर्वोचित रहता है। यदि वहाँ सम्भव न हो तो पूर्व के मध्य भाग में बना सकते हैं परंतु वास्तु के नैर्ऋत्य, ईशान, दक्षिण, ब्रह्मस्थल एवं अग्नि भाग में सैप्टिक टैंक बिल्कुल नहीं बनाना चाहिए।&lt;br /&gt;प्लॉट या मकान के नैर्ऋत्य कोने में बना कुआँ अथवा भूमिगत जल की टंकी सबसे ज्यादा हानिकारक होती है। इसके कारण अकाल मृत्यु, हिंसाचार, अपयश, धन-नाश, खराब प्रवृत्ति, आत्महत्या, संघर्ष आदि की सम्भावना बहुत ज्यादा होती है।&lt;br /&gt;परिवार के सदस्यों में झगड़े होते हों तो परिवार का मुख्य व्यक्ति रात्रि को अपने पलंग के नीचे एक लोटा पानी रख दे और सुबह गुरुमंत्र अथवा भगवन्नाम का उच्चारण करके वह जल पीपल को चढ़ायें। इससे पारिवारिक कलह दूर होंगे, घर में शांति होगी।&lt;br /&gt;झाड़ू और पोंछा ऐसी जगह पर नहीं रखने चाहिए कि बार-बार नजरों में आयें। भोजन के समय भी यथासंभव न दिखें, ऐसी सावधानी रखें।&lt;br /&gt;घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने के लिए रोज पोंछा लगाते समय पानी में थोड़ा नमक मिलायें। इससे नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव घटता है। एक डेढ़ रूपया किलो खड़ा नमक मिलता है उसका उपयोग कर सकते हैं।&lt;br /&gt;घर में टूटी-फूटी अथवा अग्नि से जली हुई प्रतिमा की पूजा नहीं करनी चाहिए। ऐसी मूर्ति की पूजा करने से गृहस्वामी के मन में उद्वेग या घर-परिवार में अनिष्ट होता है।&lt;br /&gt;(वराह पुराणः 186.43)&lt;br /&gt;50 ग्राम फिटकरी का टुकड़ा घर के प्रत्येक कमरे में तथा कार्यालय के किसी कोने में अवश्य रखना चाहिए। इससे वास्तुदोषों से रक्षा होती है।&lt;br /&gt;किसी दुकान या प्रतिष्ठान के मुख्य द्वार पर काले कपड़े में फिटकरी बाँधकर लटकाने से बरकत आती है। दक्षिण भारत व अधिकांशतः दुकानों के मुख्य द्वार पर फिटकरी बाँधने का रिवाज लम्बे समय से प्रचलित है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-7608681643337217961?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/7608681643337217961/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2012/01/0-186.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/7608681643337217961'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/7608681643337217961'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2012/01/0-186.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://3.bp.blogspot.com/-SYU1kli6gA4/TXJ-0PC2mJI/AAAAAAAAAY4/MN_oJ9Hu2-4/s220/IMG0345A.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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/&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: left;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #783f04; font-size: large;"&gt;अपने रक्षक आप&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #38761d;"&gt;विद्यार्थी और ब्रह्मचर्य&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;"&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है।&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;विद्यार्थी काल शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक विकास का समय है और इस विकास का मुख्य आधार है वीर्यरक्षा&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;!&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&amp;nbsp;विद्यार्थी को अपने अध्ययन और प्रवृत्ति&amp;nbsp;&amp;nbsp;लिए उत्साह, बुद्धिशक्ति, स्मृतिशक्ति, एकाग्रता, संकल्पबल आदि गुणों के विकास की बहुत आवश्यकता होती है। इन सबमें वीर्यरक्षा द्वारा बहुत प्रगति प्राप्त की जा सकती है। इसके विपरीत वीर्यनाश से तन और मन को बहुत नुकसान होता है। वीर्यनाश से निर्बलता, रोग, आलस्य, चंचलता, निराशा और पलायनवादिता के दुर्गुण आ धमकते हैं। इस दुष्प्रवृत्ति का शिकार विद्यार्थी अपने विकासकाल के अति महत्त्वपूर्ण समय को गँवा बैठता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;विद्यार्थीकाल जीवनरूपी इमारत को बनाने के लिए नींव का पत्थर है। क्या विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य की आवश्यकता है&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;?&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&amp;nbsp;यह प्रश्न ऐसा ही है, जैसे कोई पूछेः&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;क्या इमारत के लिए मजबूत नींव की जरूरत है&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;?&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&amp;nbsp;मछली को पानी की आवश्यकता है&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt;?&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;जीवन में दो विरोधियों को साथ में रखना यह प्रकृति का नियम है। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विवेक होना जरूरी है। विद्यार्थीकाल में जहाँ एक ओर जगत को कँपाने में सक्षम, चाहे जो करने में समर्थ ऐसी प्रचंड वीर्यशक्ति और मौका प्रकृति युवान को देती है, वहीं दूसरी ओर उसके यौवन को लूट लेने वाली विजातीय आकर्षण की सृष्टि भी उसके सामने आ खड़ी होती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;जिस देश के युवक गुरुकुलों में रहकर 25 वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करके चक्रवर्ती सम्राट, वीर योद्धा आदि बन कर असम्भव जैसे कार्य भी सहज ही कर लेते थे, उसी देश के निस्तेज युवक अपने परिवार को और खुद को भी नहीं सँभाल पाते यह कैसा दुर्भाग्य है। गोलियाँ बरसा के खुद को और अपने परिवार को अकाल मौत के घाट उतार देते हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;युवा पीढ़ी को निस्तेज बनाने वाले सेक्सोलॉजिस्टों एवं अखबारों को डॉ निकोलस के इस कथन को पढ़कर अपनी बुद्धि का सुधार करना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;डॉ. निकोलस कहते हैं-&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;"&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;वीर्य को पानी की तरह बहाने वाले आजकल के अविवेकी युवाओं के शरीर को भयंकर रोग इस प्रकार घेर लेते हैं कि डॉक्टर की शरण में जाने पर भी उनका उद्धार नहीं होता। अंत में बड़ी कठिन विपत्तियों का सामना करने के बाद असमय ही उन अभागों का महाविनाश हो जाता है।&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;"&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: justify; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;यौवन में शक्ति जरूर है परंतु सजगतापूर्वक संयम का पालन नहीं किया तो छोटी-सी गलती भी बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है, खिलते फूल-सदृश विद्यार्थी-जीवन को निचोड़कर नरकतुल्य बना सकती है। अतः सावधान&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;!&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&amp;nbsp;इस संबंध में फैल रही भ्रांत धारणाओं के निर्मूलन के लिए आश्रम से प्रकाशित पुस्तक -&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;दिव्य प्रेरणा प्रकाश&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&amp;nbsp;और पूज्य संत स्वामी श्री लीलाशाह जी महाराज के सत्संग-प्रवचनों की पुस्तकें&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;निरोगता का साधन&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&amp;nbsp;व&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;मन को सीख&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&amp;nbsp;अवश्य पढ़ें-पढ़ायें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-948521940110506920?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/948521940110506920/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/12/25.html#comment-form' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/948521940110506920'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/948521940110506920'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/12/25.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://3.bp.blogspot.com/-SYU1kli6gA4/TXJ-0PC2mJI/AAAAAAAAAY4/MN_oJ9Hu2-4/s220/IMG0345A.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-6savSh23Uok/TuTlMe4XukI/AAAAAAAAAxM/1J989CYmjCU/s72-c/296045_227869653946767_100001712012611_604730_426689808_n.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5113688638599628772.post-2227986909031849562</id><published>2011-11-07T00:35:00.005+05:30</published><updated>2011-11-07T00:36:49.170+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-K02nYAV2NxU/TrbaBnDs9LI/AAAAAAAAAv8/G3tNbRYZaKY/s1600/270646_133028743448565_100002243197207_232644_5750599_n+%25281%2529.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="271" src="http://1.bp.blogspot.com/-K02nYAV2NxU/TrbaBnDs9LI/AAAAAAAAAv8/G3tNbRYZaKY/s400/270646_133028743448565_100002243197207_232644_5750599_n+%25281%2529.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="font-size: x-large;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #351c75;"&gt;सत्संग अमृत &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&amp;nbsp;पुस्तक से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #cc0000;"&gt;नाव पानी में रहे, पानी नाव में नहीं....&lt;/span&gt;.&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह नींद में से उठ के श्वास गिनो और शांत हो जाओ। अपने परमात्मा में, आत्मा मे ही खुश रहना। 'मेरा पैसा कहाँ है ? मेरा छोरा कहाँ है ?' नश्वर दुनिया की चीजों की क्या इच्छा करना ! 'मैं अमर आत्मा हूँ। शरीर मरेगा, मैं तो अपने-आप में मस्त हूँ। मुझे मारे ऐसी कोई तलवार नहीं, कोई मौत नहीं। अमर आत्मा के आगे तो मौत की मौत हो जाये। मैं तो अमर आत्मा हूँ। ॐ....हरिॐ....ॐ....' – इस प्रकार अमर आत्मा का विचार करे तो अमर आत्मा को पायेगा और बेट-बेटी का विचार करे, नाती-पोते का विचार करे तो अंत में उन्हीं की याद आयेगी और वहीं जन्मेगा।&lt;br /&gt;भगवान ने गीता में कहा हैः&lt;br /&gt;यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।&lt;br /&gt;तं तमेवैति कौन्तेय सदा तदभावभावितः।।&lt;br /&gt;' हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव का स्मरण करता हुआ शरीर का त्याग करता है, उस उस को ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है।' (8.6)&lt;br /&gt;एक बार संत कबीर जी ने एक किसान से कहाः "तुम सत्संग में आया करो।"&lt;br /&gt;किसान बोलाः "हाँ महाराज ! मेरे लड़के की सगाई हो गयी है, शादी हो जाये फिर आऊँगा।"&lt;br /&gt;लड़के की शादी हो गयी। कबीर जी बोलेः "अब तो आओ।"&lt;br /&gt;"मेहमान आते जाते हैं। महाराज ! थोड़े दिन बाद आऊँगा।"&lt;br /&gt;ऐसे दो साल बीत गये। बोलेः "अब तो आओ।"&lt;br /&gt;"महाराज ! मेरी बहू है न, वह माँ बनने वाली है। मेरा छोरा बाप बनने वाला है। मैं दादा बनने वाला हूँ। घऱ में पोता आ जाय, फिर कथा में आऊँगा।"&lt;br /&gt;पोता हुआ। "अब तो सत्संग में आओ।"&lt;br /&gt;"अरे महाराज ! आप मेरे पीछे क्यों पड़े हैं ? दूसरे नहीं मिलते हैं क्या ?"&lt;br /&gt;कबीर जी ने हाथ जोड़ लिये। कुछ वर्ष के बाद कबीरजी फिर गये, देखा कि कहाँ गया वह खेतवाला ? दुकानें भी थीं, खेत भी था। लोग बोलेः "वह तो मर गया !"&lt;br /&gt;"मर गया।"&lt;br /&gt;"हाँ।"&lt;br /&gt;मरते-मरते वह सोच रहा था कि 'मेरे खेत का क्या होगा, दुकान का क्या होगा ?' कबीर जी ने ध्यान लगा के देखा कि दुकान में चूहा बना है कि खेत में बैल बना है ? देखा कि अरहट में बँधा है, बैल बन गया है। उसके पहले हल में जुता था, फिर गाड़ी में जुता। अब बूढ़ा हो गया है। कबीर जी थोड़े-थोड़े दिन में आते जाते रहे। फिर उस बूढ़े बैल को, अब काम नहीं करता इसलिए तेली के पास बेच दिया गया। तेली ने भी काम लिया फिर बेच दिया कसाई को और कसाई ने 'बिस्मिल्लाह !' करके छुरा फिरा दिया। चमड़ा उतार के नगाड़ेवाला को बेच दिया और टुकड़े-टुकड़े कर के मांस बेच दिया।&lt;br /&gt;कबीर जी ने साखी बनायीः&lt;br /&gt;कथा में तो आया नहीं, मरकर&lt;br /&gt;बैल बने हल में जुते, ले गाड़ी में दीन।&lt;br /&gt;हल नहीं खींच सका तो गाड़ी, छकड़े को खींचने में लगा दिया।&lt;br /&gt;तेली के कोल्हू रहे, पुनि घर कसाई लीन।&lt;br /&gt;मांस कटा बोटी बिकी, चमड़न मढ़ी नगार।&lt;br /&gt;कुछ एक कर्म बाकी रहे, तिस पर पड़ती मार।।&lt;br /&gt;नगारे पर डंडे पड़ रहे हैं। अभी कर्म बाकी हैंतो उसे डंडे पड़ रहे हैं। मेरा बेटा कहाँ है ? मेरी बेटी कहाँ है ?....' डंडे पड़ेंगे फिर। 'मेरा परमात्मा कहाँ है ? अमर आत्मा कहाँ है ? यह तो मरने वाला शरीर मर रहा है, सपने जैसा है। कई बेटे-बेटी सपना हो गये, संसार सपना हो रहा है लेकिन जो बचपन में मेरे साथ था, शादी में साथ था, बुढ़ापे में साथ है, मरने के बाद भी जो साथ नहीं छोड़ेगा वह मेरा प्रभु आत्मा कैसा है ? ॐ आनंद.... ॐ शांति...' – ऐसा करके उस आत्मा को जाने तो मुक्त हो जाये और 'छोरे क्या क्या होगा ? खेती का क्या होगा ?' किया तो बैल बनो बेटा ! जाओ।&lt;br /&gt;इसलिए मन को संसार में नहीं लगाना। नाव पानी में रहे लेकिन पानी नाव में नहीं रहे। शरीर संसार में रहे किंतु अपने दिमाग में संसार नहीं घुसे। अपने दिमाग में तो 'ॐ आनन्द... ॐ शांति.... ॐ माधुर्य... संसार सपना, परमात्मा अपना....' – ऐसा चिंतन चलता रहे। चिंतन करके निश्चिंत नारायण में विश्रान्ति पायें, निश्चिंत नारायण-व्यापक ब्रह्म में आयें।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-2227986909031849562?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/2227986909031849562/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/11/blog-post.html#comment-form' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/2227986909031849562'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/2227986909031849562'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://3.bp.blogspot.com/-SYU1kli6gA4/TXJ-0PC2mJI/AAAAAAAAAY4/MN_oJ9Hu2-4/s220/IMG0345A.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-K02nYAV2NxU/TrbaBnDs9LI/AAAAAAAAAv8/G3tNbRYZaKY/s72-c/270646_133028743448565_100002243197207_232644_5750599_n+%25281%2529.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5113688638599628772.post-323297463146308717</id><published>2011-10-20T19:34:00.001+05:30</published><updated>2011-10-20T19:34:59.016+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-bQJSYdIYmAQ/TqAikb58KjI/AAAAAAAAAmE/aiLseQxK3Yw/s1600/264244_238434786185871_100000580558241_921326_5104416_n.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300" src="http://2.bp.blogspot.com/-bQJSYdIYmAQ/TqAikb58KjI/AAAAAAAAAmE/aiLseQxK3Yw/s400/264244_238434786185871_100000580558241_921326_5104416_n.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: #f6f6f6; font-family: Courier, monospace; font-size: 14px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #274e13;"&gt;&lt;b&gt;सच्चा सुख&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&amp;nbsp;पुस्तक से&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: #f6f6f6; font-family: Courier, monospace; font-size: 14px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #a64d79;"&gt;&lt;b&gt;संयम से ही सफलता&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्माजी ने जब आँख खोली तो भगवान विष्णु की विचित्र रचनाओं पर बड़ा आश्चर्य हुआ। सोचने लगेः 'यह सब क्या है ? कैसे हुआ ?'&lt;br /&gt;ब्रह्माजी ज्यों-ज्यों सोचते गये त्यों-त्यों उनका मन गहरा चलता गया। भीतर से आवाज आयीः तप.... तप..... तप..... (अर्थात् तप करो)&lt;br /&gt;तप करने का मतलब है कि इन्द्रियों को मन में लीन करो। मन को बुद्धि में लीन करो। बुद्धि को परिश्रम नहीं होगा। बुद्धि को शान्ति मिलेगी तो वह शान्त स्वरूप परमात्मा में टिकेगी। शान्त स्वरूप परमात्मा में टिकने से मति का गाढ़ापन हो जाता है। यदि मति हल्की वस्तुओं में उलझती है तो छीछरी हो जाती है।&lt;br /&gt;पीपल का पत्ता हल्का-सा है। थोड़ी सी हवा लगती है तो वह फड़कता रहता है। सुमेरू पर्वत कैसी भी आँधी में स्थिर रहता है। ऐसे ही जिसने तप किया है वह परब्रह्म परमात्मा में स्थित होता है। सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म। जो सत्यस्वरूप है, ज्ञानस्वरूप है, जिसका कभी अन्त नहीं होता उस परब्रह्म परमेश्वर में मति प्रतिष्ठित हो जाती है। परब्रह्म परमेश्वर में मति जब प्रतिष्ठित हो जाती है तो उस मति का नाम बदल जाता है, वह प्रज्ञा बन जाती है, ऋतंभरा प्रज्ञा। ऋत माने सत्य। सत्यस्वरूप परमेश्वर से भरी हुई प्रज्ञा है ऋतंभरा प्रज्ञा।&lt;br /&gt;मनुष्य जब प्राण छोड़ता है, मरता है तब उसके चित्त में जैसी-जैसी वासना होती है, उसकी मति में जैसा-जैसा निश्चय होता है उसी के अनुसार उसका मन और प्राण लोक-लोकान्तर में गति करता है। जैसे, आपकी मति में निश्चय हो गया कि हम शिविर में जाएँगे, फिर चाहे उत्तरायण की ठण्ड लगे या मार्च-अप्रैल की गर्मी बरसे, हम तो शिविर में जाएँगे ही। सत्संग सुनेंगे, साधना करेंगे और जो कुछ कठिनाइयाँ होगी उन्हें सहेंगे तो तप हो जाएगा। सत्संग-कीर्तन से आनन्द होगा और साधन से मति की शुद्धि होगी, परमात्मा के मार्ग में आगे बढ़ जाएँगे !&lt;br /&gt;यह निर्णय मति ने किया कि ध्यान योग साधना शिविर में जाना है। मन ने और प्राण ने योजना बनायी कि फलानी तारीख को, फलानी गाड़ी से जाना है। हाथों ने हिलचाल की, पैरों ने यात्रा की, आँखों ने देखने का काम किया। बाद में सब काम में लग गये लेकिन प्रारंभ में निर्णय मति का था।&lt;br /&gt;इन्द्रियों को जैसा मिलेगा उस प्रकार का इन्द्रियों का आकर्षण और मन का मनन बनेगा। इन्द्रियों के आकर्षण और मन के मनन का निष्कर्ष बुद्धि के आगे पहुँचेगाः अच्छा हुआ कि बुरा हुआ..... दूसरी बार यह करेंगे, यह नहीं करेंगे....यह लाएँगे, यह नहीं लाएँगे......आदि। मति में अगर अच्छे संस्कार हैं, मति अगर तप से युक्त है तो वह मन इन्द्रियों की अच्छी बात को हाँ बोलेगी और घटिया बात को काटकर फेंक देगी। मति घटिया है तो वह मन इन्द्रियों की घटिया बात को हाँ बोल देगी और बढ़िया बात की ओर ध्यान नहीं देगी।&lt;br /&gt;तुम्हारे पास समाचार तो लाती हैं इन्द्रियाँ। आँख दृश्य के समाचार भरती है, कान शब्द के समाचार भरते हैं, नाक दुर्गन्ध-सुगन्ध के समाचार भरता है, जीभ रस का समाचार भरती है। मन ये सब समाचार लेकर मति के पास जाता है। मति में अगर तप है तो वह सारासार का विवेक करती है। मति में अगर तप नहीं है तो वह मन इन्द्रियों को जो अच्छा लगे वही निर्णय देती है। ऐसा करते-करते मति मन्द हो जाती है। चपरासी और कारकून अपने को जैसा अच्छा लगे वैसा साहब से काम करवाते रहे, कागजों पर साहब के हस्ताक्षर करवाते रहे तो साहब कभी न कभी उनकी जाल में फँस मरता है। ऐसे ही मन-इन्द्रियों की साहब मति देवी मन-इन्द्रियों की बातों में आकर फँसती है। वह साहब तो फँसता है तब नौकरी गँवाता है, घर बैठता है लेकिन यह मति देवी चौरासी लाख योनियों की जेल भोगती है। जब देखने, सुनने, चखने, भोगने की वासना मति ने स्वीकार कर ली तो मति का स्वभाव हो जाता है कि अभी वह चखना है, यह खाना है, यह भोगना है। ऐसा करते-करते जीवन पूरा हो जाता है फिर भी कुछ न कुछ करना-भोगना, खाना-पीना बाकी रह जाता है।&lt;br /&gt;जब प्राण निकलते है तब भोग की वासनायुक्त मति में जिस भोग का आकर्षण होता है उसी प्रकार के वातावरण में वह फिर से जन्म लेती है। वही भोग भोगते-भोगते दूसरे संस्कार संचित होते रहते हैं। एक वासना मिटी न मिटी वहाँ दूसरी खड़ी हो जाती है।&lt;br /&gt;जैसे, कोई सोचता है कि तीन घण्टे का समय है। चलो, सिनेमा देख लें। सिनेमा में दूसरी सिनेमा के एवं दूसरी कई चीजों के विज्ञापन भी दिखाये जाते हैं। इससे एक सिनेमा देखते-देखते दूसरी सिनेमा देखने की एवं दूसरी चीजें खरीदने की वासना जाग उठती है। वासनाओं का अन्त नहीं होता। वासनाओं का अन्त नहीं होता। इसलिए यह जीव बेचारा परमात्मा तक नहीं पहुँच पाता। वासना से ग्रस्त मति परमात्मा में प्रतिष्ठित नहीं हो पाती। मति परमात्मा में प्रतिष्ठित नहीं होती है तो जीव जीने की और भोगने की वासना से आक्रान्त रहता है।&lt;br /&gt;जो चैतन्य जीने और भोगने की इच्छा से आक्रान्त रहता है उसी चैतन्य का नाम जीव पड़ गया। वास्तव में जीव जैसी कोई ठोस चीज नहीं।&lt;br /&gt;जीव ने अच्छे कर्म किये, सात्त्विक कर्म किये, भोग भोगे तो सही लेकिन ईमानदारी से, त्याग से, सेवाभाव से, भक्ति से अच्छे संस्कार भी सर्जित किये, परलोक में भी सुखी होने के लिए दान-पुण्य किये, सेवाकार्य किये तो उसकी मति में अच्छे सात्त्विक सुख भोगने की इच्छा आयेगी। वह जब प्राण त्याग करेगा तब सत्त्वगुण की प्रधानता रहेगी और वह स्वर्ग में जाएगा।&lt;br /&gt;जीव को अगर हल्के सुख भोगने की इच्छा रही तो वह नीचे के केन्द्रों में ही उलझा रहेगा। मानो उसे काम भोगने की इच्छा रही तो मरने के बाद उसे स्वर्ग में जाने की जरूरत नहीं, मनुष्य होने की भी जरूरत नहीं। उसकी शिश्नेन्द्रिय को भोग भोगने की अधिक-से-अधिक छूट मिल जाय ऐसी योनि में प्रकृति उसे भेज देगी। शूकर, कूकर, कबूतर का शरीर दे देगी। उस योनि में एकादशी, व्रत, नियम, बच्चों को पढ़ाने की, शादी कराने की जिम्मेदारी आदि कुछ बन्धन नहीं रहेंगे। जीव वहाँ अपने को शिश्नेन्द्रिय के भोग में खपा देगा।&lt;br /&gt;इस प्रकार जिस इन्द्रिय का अधिक आकर्षण होता है उस इन्द्रिय को अधिक भोग मिल सके ऐसे तन में प्रकृति भेज देती है। क्योंकि तुम्हारी मति उस सत्यं ज्ञानं अनंतं ब्रह्म से स्फुरी थी इसलिए उस मति में सत्य संकल्प की शक्ति रहती है। वह जैसी इच्छा करती है, देर सवेर वह काम होकर रहता है।&lt;br /&gt;इसलिए हमें सावधान रहना चाहिए कि हम जो संकल्प करें, मन-इन्द्रियों की बातों पर जो निर्णय दें वह सदगुरू, शास्त्र और अपने विवेक से नाप-तौलकर देना चाहिए। विवेक विचार से परिशुद्ध होकर इच्छा को पुष्टि देने या न देने का निर्णय करना चाहिए।&lt;br /&gt;इच्छा काटने की कला आ जाएगी तो मन निर्वासनिक बनने लगेगा। मन निर्वासनिक होगा तो बुद्धि निश्चिन्त तत्त्व परमात्मा में टिकेगी। मन में अगर हल्की वासना होगी तो हल्का जीवन, ऊँची वासना होगी तो ऊँचे लोक-लोकान्तर का जीवन और मिश्रित वासना होगी तो पुण्य-पाप की खिचड़ी खाने के लिए मनुष्य शरीर मिलेगा। सत्संग और तप करके आत्मा-परमात्मा विषयक ज्ञान पा ले तो सबसे ऊँचा जीवन बन जाए। प्रारंभ में यह कार्य थोड़ा कठिन लग सकता है लेकिन एक बार आत्मा-परमात्मा का ज्ञान पा ले तो मति को, मन को, इन्द्रियों को जो शान्ति, आनन्द और रस मिलता है वह रस, शान्ति और आनन्द इहलोक में तो क्या, स्वर्गलोक में और ब्रह्मलोक में भी नहीं मिलते। ब्रह्मलोक में वह सुख नहीं जो ब्रह्म परमात्मा के साक्षात्कार में है।&lt;br /&gt;ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पाशेभ्यः।&lt;br /&gt;उस देव को जानने से जीव सारे पाशों से, सारी जंजीरों से मुक्त हो जाता है।&lt;br /&gt;मनुष्य जन्म में ऐसी मति मिली है कि इससे वह भूत का, भविष्य का चिन्तन-विचार कर सकता है। पशु तो कुछ समय के बाद अपने माँ-बाप को भी भूल जाते हैं, भाई-बहन को भी भूल जाते है और संसार व्यवहार कर लेते हैं। मनुष्य की मति में स्मृति रहती है।&lt;br /&gt;इन्द्रियाँ तुम्हें संसार की ओर आकर्षित करेंगी लेकिन मति परिणाम का विचार करेगी। मति का आदर करोगे तो विकारों में से निर्विकारिता की ओर जाना बिल्कुल जरूरी दिखेगा। मति का आदर नहीं करोगे, मन-इन्द्रियाँरूपी चपरासी और कारकूनों के कहने में मति को बहाते रहोगे तो जगत सच्चा लगेगा। जगत सच्चा लगेगा तो जगत के भोगों में आकर्षण होगा। जगत के भोगों में आकर्षण होने से राग-द्वेष पनपेंगे। राग-द्वेष पनपने से इच्छा, भय, क्रोध, अशान्ति, जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधि बने ही रहेंगे। अगर मति का आदर करोगे तो मति परिणाम का विचार करेगी। परिणाम का विचार करोगे तो मति मन को, इन्द्रियों को खाने-पीने की, देखने सुनने की इजाजत तो देती है लेकिन औषधवत्। खाना पीना, देखना-सुनना आदि सब औषधवत् हो जाय तो इन्द्रियों और मन का परिश्रम कम हो जाता है। उससे भी मति को थोड़ी पुष्टि मिलती है। ज्यों-ज्यों मति को पुष्टि मिलती है त्यों-त्यों मति देखने-सुनने आदि की इच्छाएँ कम करके अपने आप में तृप्त रहती है। तृप्त मति की योग्यता बढ़ जाती है। योग्यता बढ़ जाती है तो मन और इन्द्रियाँ मति के आधीन हो जाते हैं।&lt;br /&gt;मनुष्य जन्म में ही ऐसी अवस्था आ जाती है कि जब चाहा तब इन्द्रियों को समेटकर मन में ले आये, मन को समेटकर परमात्मा में गोता मार दिया।&lt;br /&gt;दिले तस्वीरे है यार.....&lt;br /&gt;जबकि गरदन झुका ली, मुलाकात कर ली।&lt;br /&gt;जब चाहा, आत्मसुख पा लिया।&lt;br /&gt;मति में आत्मसुख पाने की आदत पड़ जाती है तो जब शरीर छूटता है तब मति में, अन्तःकरण में कोई वासना नहीं रहती। जब वासना नहीं रहती तो प्राण लोक-लोकान्तर में जाने के लिए उत्क्रमण नहीं करते। अभी तुम्हें चाय पीने की या कुछ खाने पीने की वासना जाग जाय तो तुम यहाँ से खिसक जाओगे। जब कोई वासना नहीं है तो भाग-दौड़ करने की जरूरत क्या है ? वासना जोर करती है तो आदमी की नजर इधर उधर जाती है। वह बेईमानी भी करता है, पैसे भी खर्च करता है। सब वासना के लिए ही करता है। जिसकी मति में कोई वासना नहीं होती उसकी मति परब्रह्म परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाती है।&lt;br /&gt;तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठति।&lt;br /&gt;वह साधक जीते जी सिद्ध पद को पा लेता है।&lt;br /&gt;ज्ञानीनाम् प्राणाः न उत्क्रामन्ते-अत्रैव प्रवीलियन्ते।।&lt;br /&gt;जिनको आत्मा, परब्रह्म परमात्मा का सुख मिल गया है, आत्म-साक्षात्कार हो गया है ऐसे ज्ञानी के प्राण देहोत्सर्ग के बाद उत्क्रमण नहीं करते हैं। शरीर का प्रारब्ध पूरा होते ही स्थूल शरीर पाँच भूतों में लीन हो जाता है, सूक्ष्म शरीर सूक्ष्म भूतों में लीन हो जाता है। आत्मा तो पहले से ही परब्रह्म परमात्मा में मिली हुई है। वह तो आत्म-साक्षात्कार के दिन ही सत् चित् आनन्दस्वरूप, आकाश भी अत्यन्त सूक्ष्म परब्रह्म परमात्मा से एक हो गई थी। केवल देह की बाधा थी। प्रारब्ध ने देह की बाधा को निवृत्त कर दिया। ज्ञानी व्यापक ब्रह्म हो गया।&lt;br /&gt;अब हमारे हिस्से क्या कर्त्तव्य आता है ?&lt;br /&gt;हमारे हिस्से आता है कि हम मन और इन्द्रियों का अधिक आदर न करें। तुलसीदासजी ने ठीक ही कहा हैः&lt;br /&gt;देखिये सुनिये गुनिये मन माँही।&lt;br /&gt;मोहमूल परमारथ नाँही।।&lt;br /&gt;देखने, सुनने और विचार करने में जो आता है वह सब मोहमूलक है। वह परमारथ माने वास्तविक सत्य नहीं है।&lt;br /&gt;पतंगे को दिये में सत्य सुख दिखता है और वह उसमें कूदकर जल मरता है। मछली को काँटे में सत्य सुख दिखता है और वह फँस मरती है। हाथी को कृत्रिम हथिनी में सत्य सुख दिखता है और वह खड्डे में जा गिरता है, सदा के लिए बन्दी हो जाता है। भौंरे को कमल में सत्य सुख दिखता है और वह वहीं लिप्त रहता है। शाम होते ही कमल की पंखुड़ियाँ मुँद जाती हैं, भ्रमर कैद हो जाता है। हालाँकि लकड़ी में भी छेद करने वाले भौंरे में कमल की कोमल पँखुड़ियाँ छेदने की ताकत है लेकिन प्रमाद में सुख का एहसास करता हुआ पड़ा रहता है। इन्द्रियों के आकर्षण में फँसा रहता है। हाथियों का झुण्ड आता है, तालाब में उतरकर कमल को उखाड़ फेंकता है, पैरों तले कुचला जाता है, मारा जाता है।&lt;br /&gt;ऐसा नहीं है कि हम बिल्कुल अज्ञानी हैं। क्या अच्छा है क्या बुरा है यह सब लोग जानते हैं। क्या पुण्य है क्या पाप है यह भी हम काफी हिस्से में जानते हैं। क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए यह भी हम लोग जानते हैं। फिर भी जो नहीं करना चाहिए वह करते हैं। उसके पीछे एक ही कारण है सुख का लालच। कुछ काम भयभीत होकर भी करने पड़ते हैं- लोग क्या बोलेंगे ? समाज क्या कहेगा ?&lt;br /&gt;सुख के लालच और दुःख के भय ने अन्तःकरण को कमजोर कर दिया। उन्होंने मति को अपने नियंत्रण में ला दिया। मन और इन्द्रियाँ मति की कमजोरी को जान लेते हैं। इससे उसको घसीटते रहते हैं। मन और इन्द्रियाँ नीति का और मुक्ति का आदर नहीं करते, सुख का लालच रखते हैं, मति भी सुख के लालच में फिसलने लगती है, दुःख के भय से भयभीत होती है तो न चाहते हुए भी मति को हल्के निर्णय करने पड़ते हैं, न चाहते हुए हल्के कामों में जुड़ना पड़ता है। इससे मति का स्वभाव हल्का बन जाता है।&lt;br /&gt;ब्रह्मा जी को प्रेरणा हुई किः 'तपः....।'&lt;br /&gt;तप करने से तेज बढ़ेगा, शक्ति बढ़ेगी। तप करने से 'स्व' का ख्याल आयेगा कि मैं इन मन इन्द्रियों का गुलाम नहीं हूँ। शरीर के मिटने से भी मैं नहीं मिटता हूँ। न मरने का डर, न जीने का लालच, न भोगने की वासना। ये तीनों झंझटें जब निकल जाती हैं तब जीव अपने वास्तविक आत्मा, परब्रह्म परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाता है।&lt;br /&gt;मम दरशन फल परम अनूपा।&lt;br /&gt;जीव पावहिं निज सहज स्वरूपा।।&lt;br /&gt;भगवान राम कहते है कि मेरे दर्शन का परम फल क्या है ? परम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूप को, जो सत् चित् आनन्दस्वरूप है, जो रोम-रोम में रमा हुआ है उस राम को पा लेता है।&lt;br /&gt;थका, हारा, नौकरों से सताया हुआ सेठ अपने निकट के मित्र सेठ से मिलता है तो उसका बल बढ़ जाता है। ऐसे ही जब हम जप करते हैं, तप करते हैं, ध्यान करते हैं, तो सेठों का भी सेठ, सारे विश्व का मालिक जो हमारा आत्मा होकर बैठा है उस विश्वेश्वर का सहयोग मति को मिल जाता है। मति में शक्ति आ जाती है और वह मुक्ति के मार्ग पर चल पड़ती है।&lt;br /&gt;तपःषु सर्वेषु एकाग्रता परं तपः।&lt;br /&gt;सब तपस्याओं में एकाग्रता परम तपस्या है।&lt;br /&gt;हम जब इन्द्रियगत ज्ञान का आदर करते हैं तब हम पर विकारों का हमला अवश्य होता है। हम जब बुद्धिगत ज्ञान का आदर करते हैं तब हम विकारी सुखों का आदर नहीं करते, विकारी वस्तुओं का उपयोग करेंगे। जैसे कहीं जाना है तो आँख से मार्ग देख लिया, शरीर को टिकाना है तो तन्दुरूस्ती का ख्याल करके खा लिया, सुनना है तो सार-सार बात सुन ली, बाकी पर ध्यान नहीं दिया। इससे हमारी शक्ति बच जाती है।&lt;br /&gt;बुद्धिगत ज्ञान का आदर करने से इन्द्रियों का, मन का झंझट कम हो जाता है और बुद्धि को कम परिश्रम पड़ता है। बुद्धिगत ज्ञान का आदर करने से हमारा विवेक बढ़ता जाता है। विवेक बढ़ने से वैराग्य बढ़ेगा। संसार से राग उठ जायगा। देखेंगे कि संसार की कितनी वस्तुओं को सँभाला..... आखिर सब छोड़कर मरना है तो फिर बहुत पसारा क्यों करना ? शरीर को इतना अधिक खिलाया पिलाया तो बीमारी हुई। अतः संयम से खाना चाहिए। इन आँखों को आज तक कितना सारा दिखाया लेकिन अभी तृप्ति नहीं हुई। कानों को कितना सुनाया ? जीभ को कितना खिलाया ? आखिर क्या ? ऐसा विवेक जागेगा। विवेक जागेगा तो वैराग्य आयगा।&lt;br /&gt;बुद्धि जब परिणाम का विचार करती है तब उसका परिश्रम कम होता है। उसको परमात्मा में प्रतिष्ठित होने का, समता में आने का समय मिलता है।&lt;br /&gt;भगवान को बुलाना भी नहीं है और भगवान को प्रकट भी नहीं करना है। भगवान हाजराहजूर हैं।&lt;br /&gt;आद् सत् जुगात् सत् है भी सत् नानक ! होसे भी सत्।&lt;br /&gt;वर्षा की ऋतु में बादलों के कारण सूरज नहीं दिखता है। सूरज को बुलाना भी नहीं है, प्रकट भी नहीं करना है। केवल हवाएँ चलें, बादल बिखरें, सूरज दिख जाएगा। सूरज तो पहले से ही है और शाम तक दिखेगा।&lt;br /&gt;यह आकाश का सूरज तो शाम तक दिखेगा लेकिन आत्म-सूर्य के लिए तो कोई शाम ही नहीं है। परमात्मारूपी सूर्य से हम कभी अलग नहीं होते। उस सत्यस्वरूप परमात्मा में बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाय, बस। सागर में तरंग विलय हो जाती है तो तरंग सागर बन जाती है। तरंग पानी तो पहले से ही था, सागर पहले से ही था। ऐसे ही जीव ब्रह्म तो पहले से ही था, सागर पहले से ही था। ऐसे ही जीव ब्रह्म तो पहले से ही था लेकिन इस बेचारे जीव को इन्द्रियों के आकर्षणों ने, जगत की सत्यता ने, बेवकूफी ने कई जन्मों तक भटकाया।&lt;br /&gt;जीव को माता का गर्भ सीधा ही मिल जाता है ऐसी बात नहीं है। कई जीव माता के गर्भ में वीर्यबिन्दु के रूप में गिरते है लेकिन बाथरूम के द्वारा नालियों में बह जाते हैं। क्या दुर्दशा होती है जीवों की ? इस पृथ्वी पर जितने हम लोग घूमते हैं इससे अधिक मनुष्य जीव नालियों में बहते होंगे। इस बात को कोई भी तार्किक या नास्तिक भी अस्वीकार नहीं कर सकता है।&lt;br /&gt;'मेरे दो बेटे हैं।'&lt;br /&gt;'कैसे तुम्हारे बेटे ?'&lt;br /&gt;'क्योंकि मेरे शरीर से पैदा हुए हैं।'&lt;br /&gt;'तुम्हारे शरीर से पैदा क्या हुए, केवल गुजरे।'&lt;br /&gt;हम लोग अन्न-जल-फल आदि खाते हैं। उसमें स्थित जीव वीर्य के द्वारा पत्नी के गर्भ में जाते हैं। कई जीवों में से एक जीव बेटा होकर जन्म लेता है, बाकी के जीव नाली में बह जाते हैं। वीर्य के एक बिन्दु में करीब तीन हजार जीव होते हैं। माता के उदर में जो जीव नहीं टिक पाते वे कहाँ जाएँगे ? रज-वीर्य के रूप में बहकर बाथरूम के द्वारा नाली में जाएँगे।&lt;br /&gt;ऐसी कितनी ही दुःखद अवस्थाएँ हम लोग कितनी ही बार भोग चुके हैं। यह बात अगर मति को समझ में आ जाय तो मति में संसार का आकर्षण कम हो जाएगा। फिर राग नहीं रहेगा। राग नहीं रहेगा तो द्वेष भी नहीं रहेगा। राग में कोई विघ्न डालता है तो उससे द्वेष होता है। बड़ा आदमी विघ्न डालता है तो उससे भय होता है, छोटा आदमी विघ्न डालता है तो क्रोध होता है, बराबर का आदमी विघ्न डालता है तो उससे द्वेष होता है। जब वासना ही नहीं है तो भय कहाँ ? वासना ही &amp;nbsp;नहीं तो उद्वेग कहाँ ? वासना ही नहीं तो द्वेष कहाँ ? निर्वासनिक मनुष्य के राग, द्वेष, क्रोध, भय, उद्वेग आदि सब शिथिल हो जाते हैं। जब राग, द्वेष, भय, उद्वेग, चिन्ता आदि सब शिथिल हो जाते हैं। तो जीव निश्चिन्त हो जाता है। वस्तु मिलेगी कि नहीं मिलेगी.... काम होगा कि नहीं होगा.... मेरा आखिर क्या होगा ? पहले यह चिन्ता थी। जीव जब निर्वासनिक हो जाता है तो हिम्मत आ जाती है कि हो होकर मेरा क्या होगा ? जो होगा सो शरीर, मन, इन्द्रियों को होगा, मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा। शरीर, मन, इन्द्रियों का कितना भी लालन-पालन करो, आखिर तो छूटना ही है। रोटी तो भगवान देता ही है और साथ में कुछ ले जाना नहीं है। फिर चिन्ता किस बात की ? जो बना है और जो बनाएँगे वह सब मृत्यु के एक झटके में छोड़ना है। मति अगर यह दृढ़ निश्चय कर ले तो आदमी की चिन्ता टिक नहीं सकती। आदमी निश्चिन्त होकर मति में टिकेगा तो जिस बात का वह चिन्तन करता है वह काम अपने आप हो जाएगा।&lt;br /&gt;आदमी जितना निश्चिन्त होता है उतनी उसकी मति परमात्मा में टिकती है। मति जितनी परमात्मा में टिकती है उतनी प्रकृति और लोग अनुकूल होने लगते हैं। यही कारण है कि जो दुरात्मा होता है उसकी इच्छाएँ जल्दी पूरी नहीं होती। थोड़ी-बहुत इच्छाएँ पूरी होती हैं फिर भी वह दुःखी का दुःखी ही रहता है। जो धर्मात्मा है, पवित्रात्मा है उसकी ज्यादा इच्छाएँ होती नहीं जो होती हैं वे तो पूरी हो ही जाती हैं, जो उसके नाम की मनौती मानते हैं उन लोगों की इच्छाएँ भी कुदरत पूरी कर देती है।&lt;br /&gt;तप से ही जगत को धारण किया जाता है, तप से ही जगत चलता है और तप से ही जगत के आकर्षण से छूटकर जगदीश्वर को प्राप्त किया जाता है। अतः हमारे जीवन में तप का स्थान होना चाहिए, तप के लिए नियत समय रखना चाहिए। बाईस घण्टे भले व्यवहार एवं अन्य प्रवृत्ति के लिए रखो लेकिन ज्यादा नहीं तो कम से कम दो घण्टे तप करो, ध्यान करो। छः घण्टे नींद करो, आठ घण्टे नौकरी – धन्धा करो, फिर भी दस घण्टे बचते हैं। उन दस घण्टों में सत्कर्म और तप आदि करो, सेवा करो, सत्संग करो, स्वाध्याय करो लेकिन कम से कम दो घण्टों तप करो, ध्यान करो।&lt;br /&gt;पानी को गर्म किया जाता है तो वह वाष्प बन जाता है और उसमें 1300 गुनी शक्ति आ जाती है। ऐसे ही तप से, ध्यान से मति सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम बन गई तो परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी। ऐसी शक्तिशाली मति आत्म-सूर्य के आगे आये हुए बादलों को हटा देगी। बादल फटते हीः&lt;br /&gt;डीठो मुख शहनशाह जो हींयरें थ्योमकरार।&lt;br /&gt;लथा रोग शरीर जा मुझे सत्गुर जे दीदार।।&lt;br /&gt;अविद्या-अज्ञान के बादल हटते ही ब्रह्मविद्या के बल से मति परब्रह्म परमात्मा का प्रसाद पा लेती है। उस प्रसाद से जीव के सारे दुःख दूर हो जाते हैं। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि, माताओं के गर्भों में जाना-आना तो दूर हो जाएगा, इस जन्म के कर्म भी जलकर भस्म हो जाएँगे।&lt;br /&gt;भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं-&lt;br /&gt;यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरूतेऽर्जुन।&lt;br /&gt;ज्ञानग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरूते तथा।।&lt;br /&gt;'हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को भस्ममय कर &amp;nbsp;देती है वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्ममय कर देती है।'&lt;br /&gt;(भगवद् गीताः 4.37)&lt;br /&gt;जैसे सूर्य को दीमक नहीं लगती ऐसे ही जब आत्मसूर्य से एक होकर मति संसार में जीती है तो उसे कर्मों की दीमक नहीं लगती। पहले के कर्म ज्ञानाग्नि से जलकर भस्म हो जाते हैं और नये कर्म बनते नहीं हैं। मति में कर्त्ताभाव नहीं रहता। मति अब वास्तविक सत्ता को जानती है कि सब परमेश्वर में हो रहा है। मति को अपनी वासना नहीं है।&lt;br /&gt;अष्टावक्र मुनि ने जनक से कहाः&lt;br /&gt;अकर्तृत्वं अभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा।&lt;br /&gt;तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः।।&lt;br /&gt;'जब पुरूष अपने आत्मा के अकर्त्तापने को, अभोक्तापने को मानता है तब उसकी सम्पूर्ण चित्त की वृत्तियाँ निश्चय करके नाश होती है।'&lt;br /&gt;(अष्टावक्रगीताः 18.51)&lt;br /&gt;चित्त की वृत्तियों से ही जीव को जन्म-मरण हो रहे हैं, चित्त की वृत्तियों से ही राग-द्वेष हो रहे हैं, चित्त की वृत्तियों से ही भय-शोक हो रहे हैं, चित्त की वृत्तियों से ही काम-क्रोध हो रहे हैं, चित्त की वृत्तियों से ही लोभ-मोह हो रहे हैं, चित्त की वृत्तियों से ही परेशानियों का प्रादुर्भाव हो रहा है। जब चित्तवृत्तियाँ क्षीण हो जाएँगी या बाधित हो जाएँगी तब जीव परम शांति को प्राप्त होगा।&lt;br /&gt;चित्तवृत्तियाँ क्षीण होना या बाधित होना माने क्या ?&lt;br /&gt;नारियल की रस्सी दिख रही है। उसे जला दो। फिर उसका आकार तो वैसा ही दिखेगा लेकिन वह रस्सी अब बाँध नहीं सकेगी। मरूभूमि में दूर से पानी दिख रहा है। पास में जाकर देख लो तो रेत ही रेत है, पानी का नामोनिशान नहीं है। अब अपनी गद्दी पर पुनः बैठकर देखो तो वैसा ही पानी दिखेगा लेकिन पहले वाला आकर्षण नहीं रहेगा। ठूँठे में किसी को चोर दिखता है किसी को साहूकार दिखता है लेकिन बैटरी जलाकर देख लिया कि यह ठूँठा है। न चोर है न साहूकार है।&lt;br /&gt;ऐसे ही जगत में न सुख है न दुःख है, न पुण्य है न पाप है, न अपना है न पराया है। एक ही परब्रह्म परमात्मा का सब विवर्त है। मति ने ऐसा जान लिया तो जगत का न आकर्षण होगा न द्वेष होगा, न राग होगा न द्वेष होगा। जो किसी से राग नहीं करता वह सबसे प्रीति करता है। जो किसी से राग नहीं करेगा वह किसी से द्वेष भी नहीं करेगा। जो सबसे प्रीति करता है वह किसी में प्रीति नहीं करता।&lt;br /&gt;दुकानदार मोहवश परिवार से प्रीति करता है तो ग्राहकों का धन खींचता है। जिसको अपने परिवार से मोहजन्य प्रीति नहीं है वह ग्राहकों का धन खींचने में नहीं लगेगा। वह सारे विश्व का प्रेमपात्र बन जाएगा। सारे विश्व का प्रेमपात्र बन जायेगा तो कुटुम्बियों का भी प्रेमपात्र बन जाएगा। उनका भी कल्याण होगा।&lt;br /&gt;लोगों को लगता है कि हम बच्चों से प्रेम करते है, पत्नी से प्रेम करते हैं। वास्तव में हम वासना से प्रेम करते हैं, इन्द्रियों से प्रेम करते है। वासनापूर्ति में जो सहयोग करते हैं उनको अपने खिलौने बनाते हैं। पत्नी पति से प्रेम करती हुई दिखती है लेकिन वह अपनी वासना से प्रेम करती है। जब वासना से प्रेम होता है तब प्रेम के नाम से एक दूसरे का &amp;nbsp;शोषण होता है। वासनारहित जब प्रेम होता है तब वह परमात्मा हो जाता है और उद्धार कर देता है।&lt;br /&gt;जीव को प्रेम करने की तो आदत है, वासना है। इस प्रेम को ऊर्ध्वमुखी बनाना है। देखने की वासना है तो ठाकुरजी को देखो। किसी का होने की वासना है तो भगवान के हो जाओ। 'मैं पत्नी का हूँ.... मैं पति की हूँ...' इसके स्थान पर 'मैं भगवान का हूँ.... भगवान मेरे हैं' यह भाव बना लो। जैसे गाड़ी का स्टीयरिंग व्हील घुमाने से गाड़ी की दिशा बदल जाती है ऐसे ही अपनी अहंता और ममता को, 'मैं' और 'मेरे' पने को बदलने से बहुत सारा बदल जाएगा। 'मैं घनश्याम हूँ..... मैं पत्नी का हूँ.... मैं संसारी हूँ..... मैं गृहस्थी हूँ.......' ऐसा भान रखने से उस प्रकार की वासना और जवाबदारी रहेगी। 'मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं......' यह अहंता बदलने से जीवन बदल जाएगा। हम स्वयं को आत्मा मानेंगे, परमात्मा का अंश मानेंगे तो अपने में आत्मा की अहंता करेंगे, देह की अहंता मिट जाएगी। देह की अहंता मिटते ही जाति की संकीर्णता मिट जाएगी। अपने मन की मान्यताओं की संकीर्णताएँ मिट जाएगी। 'मैं भगवान का हूँ.... भगवान मेरे हैं....।' भगवान सत् चित् आनन्दस्वरूप हैं तो सुख के लिए, आनन्द के लिए हमें इन्द्रियों की गुलामी नहीं करनी पड़ेगी। इन्द्रियों का उपयोग करने की ताकत बढ़ जाएगी। इन्द्रियों की गुलामी के बजाय इन्द्रियों का उपयोग करोगे तो इन्द्रियों में जल्दी से बीमारी भी नहीं आयेगी। शरीर तंदुरूस्त रहेगा, मन-बुद्धि में लाचारी नहीं रहेगी। जब इन्द्रियों का सुख लेते हो तो बकरी बन जाते हो।&lt;br /&gt;सुख आत्मा का लो और उपयोग इन्द्रियों का करो। जीवन सिंह जैसा बन जाएगा, व्यवहार और परमार्थ सब ठीक हो जाएगा।&lt;br /&gt;ये सब बातें सत्संग के बिना समझ में भी नहीं आतीं, इन बातों में रूचि भी नहीं होती और इनके रहस्य हृदय में प्रकट भी नहीं होते। इसीलिए सत्संग की बड़ी महिमा है।&lt;br /&gt;वशिष्ठ जी कहते हैं कि चाहे चण्डाल के घर की भिक्षा ठीकरे में माँगकर खानी पड़े और आत्मा-परमात्मा के ज्ञान का सत्संग मिलता हो तो उस जगह का त्याग नहीं करना चाहिए। राज वैभव-ऐश्वर्य हो लेकिन आत्मज्ञान न मिलता हो तो उस ऐश्वर्य और राज वैभव को लात मार दो। ये भोग शरीर तक ही सुखाभास देंगे, फिर जन्म-मरण के चक्कर में जाना पड़ेगा, नालियों में कीड़ा होकर बहना पड़ेगा। आत्मा-परमात्मा को पाने के लिए राज वैभव का त्याग करना पड़े तो भी कोई खतरा नहीं है। क्योंकि एक दिन मरकर तो सब कुछ छोड़ना ही है। मरकर, लाचार होकर छोड़ें और वासना लेकर भटकें, फिर कहीं न कहीं कैसी भी योनि में जन्म लें इससे तो जीते जी वासना मिटाकर निर्वासनिक आत्मा परमात्मा का सुख पाने का अभ्यास शुरू कर दें यह अच्छा है।&lt;br /&gt;सत्संग समझने के लिए भी तप की जरूरत पड़ती है। एकाग्रता चाहिए, विवेक चाहिए। तप करने के लिए तप में रस आना चाहिए, तब मन तप करेगा। मन को जहाँ रस नहीं आता वह तप नहीं करता। इन्द्रियों से सुख लेने में मन को जल्दी रस आ जाता है, भले वह नकली हो, भ्रांति मात्र हो। मिट्टी के खिलौने का आम बारह महीनों मिलता है। बच्चा उसी में खेलता रहता है। असली आम तो केवल ऋतु में ही मिलता है, पहले कच्चा और खट्टा होता है, फिर खटमीठा होता है, फिर पकता है, पूरा समय होता है तब मीठा बनता है। खिलौने का आम तो पहले से ही पूरा पीला होता है। जगत भी एक खिलौना है। इन्द्रियों के सुख सब पहले से ही तैयार हैं रस देने के लिए लेकिन बाद में सत्यानाश करते हैं। अंगारा चमचम चमकता है। बच्चे को वह दूर से बढ़िया खिलौना लगता है। जब हाथ डालता है तब चिल्लाता है। ऐसे ही संसार के सुख भोगे नहीं तब तक आकर्षक लगते हैं भोगते ही पछताना पड़ता है। एक बार ही नहीं कई बार पछताने के बाद भी हम लोग फिर वहीं जाते हैं क्योंकि सच्चा सुख विवेक नहीं है, सच्चे सुख का ज्ञान नहीं है। सच्चे सुख का थोड़ा बहुत विवेक है, थोड़ा बहुत ज्ञान है लेकिन उस सच्चे सुख का स्वाद लेने की क्षमता नहीं है इसलिए बार-बार हल्के स्वाद में गिर जाते हैं।&lt;br /&gt;अब बात यह रही किः&lt;br /&gt;मिल जाए कोई पीर फकीर।&lt;br /&gt;पहुँचा दे भव पार....।।&lt;br /&gt;ऐसे कोई महापुरूष मिल जाएँ तो उस तत्त्व का स्वाद दिला दें।&lt;br /&gt;मन को अगर अच्छी तरह शिक्षित किया जाय तो वह हमारा बड़ा, भारी में भारी, ऊँचे में ऊँचा मित्र है। सारे विश्व में ऐसा कोई मित्र नहीं हो सकता। इसके विपरीत, मन हमारा भारी में भारी शत्रु भी है। मन जैसा शत्रु सारे विश्व में नहीं हो सकता। मन शत्रु क्यों है ?&lt;br /&gt;मन अगर इन्द्रियों के विकारी सुखों में भटकता रहा तो चौरासी लाख योनियों में युगयुगान्तर तक हमें भटकना पड़ेगा। ऐसा वह खतरनाक शत्रु है।&lt;br /&gt;मन मित्र कैसे है ?&lt;br /&gt;मन अगर तप और परमात्मा के ध्यान की तरफ मुड़ गया तो वह ऐसा मित्र बन जाता है कि करोड़ों-करोड़ों जन्मों के अरबों-अरबों संस्कारों को मिटाकर, इसी जन्म में ज्ञानाग्नि जलाकर, आत्मा-परमात्मा की मुलाकात कराकर मुक्ति का अनुभव करा देता है।&lt;br /&gt;इसलिए शास्त्र कहते हैं किः&lt;br /&gt;मनः एव मनुष्याणां कारणं बन्धनमोक्षयोः।&lt;br /&gt;हमारा मन ही हमारे बन्धन और मोक्ष का कारण बनता है।&lt;br /&gt;भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-&lt;br /&gt;उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानवसादयेत्।&lt;br /&gt;आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।&lt;br /&gt;बन्धुरात्मानस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।&lt;br /&gt;अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।&lt;br /&gt;'अपने द्वारा संसार-समुद्र से अपना उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले, क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है आप ही अपना शत्रु है।'&lt;br /&gt;'जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियाँ जीती हुई हैं, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियाँ नहीं जीती गई हैं, उसके लिए वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बर्तता है।'&lt;br /&gt;(भगवद् गीताः 6.5.6)&lt;br /&gt;जब इन्द्रियाँ और मन अनात्म वस्तुओं में सत्यबुद्धि करके सुख पाने की मजदूरी करते हैं तब वह जीवात्मा अपने आपका शत्रु है। जब मन और इन्द्रियाँ आत्मा-परमात्मा के सुख में अन्तर्मुख होती हैं तब वह जीवात्मा अपने आपका मित्र है। हम जब विकारों का सुख लेते हैं तब हम अपने आपसे शत्रुता करते हैं और जब निर्विकारी सुख की ओर आते हैं तब हम अपने आपके मित्र हैं।&lt;br /&gt;भगवान कहते हैं कि अपने आपको अधोगति की ओर नहीं ले जाना चाहिए। अपने मन, बुद्धि और इन्द्रियों को परमात्मा की ओर ले जाना चाहिए। हम जब परमात्मा के विषय में सुनेंगे, उनकी महिमा और गुण सुनेंगे, उनके नाम का जप, ध्यान आदि करेंगे तब भीतर का सुख मिलेगा। भीतर का सुख मिलेगा तो हम आपके मित्र बन गये।&lt;br /&gt;भीतर का सुख मिल जाता है लेकिन विकारी सुख में गिरने की पुरानी आदत है इसलिए बार-बार उधर चले जाते हैं। इसलिए हमें विवेक जगाना चाहिए, थोड़े नियम, थोड़े व्रत ले लेने चाहिए। व्रत ले लेते हैं तो मन धोखेबाजी कम करता है। सच्चा सुख पाने का आपका संकल्प नहीं होता, उसके लिए व्रत नहीं करते इसलिए मन और इन्द्रियाँ अपने पुराने अभ्यास के मुताबिक बुद्धि को वहीं घसीट ले जाते हैं। ऋतंभरा प्रज्ञावाले महापुरूषों का संग करने से अपनी मति में, बुद्धि में शक्ति बढ़ती है।&lt;br /&gt;भगवान शिवजी पार्वती से कहते हैं-&lt;br /&gt;उमा संत समागम सम और न लाभ कछु आन।&lt;br /&gt;बिनु हरि कृपा उपजै नहीं गावहिं वेद पुरान।।&lt;br /&gt;यह भी हरि की अहैतुकी कृपा है कि हमें ऊँचे में ऊँची चीज, ब्रह्मज्ञान का सत्संग सहज में मिल रहा है। जो हल्की चीज होती है उसके लिए परिश्रम नहीं करना पड़ता है। जो ऊँची चीज होती है उसके लिए परिश्रम करो, सौ रूपये कमाओ फिर दारू खरीद सकते हो। शरीर के लिए दारू बिल्कुल आवश्यक नहीं है। पानी शरीर के लिए बहुत जरूरी है और वह मुफ्त में मिल जाता है।&lt;br /&gt;प्रवास पर जाते हैं तो भोजन का टिफिन घर से ले जाते हैं लेकिन भोजन से भी अधिक आवश्यक पानी घर से &amp;nbsp;नहीं ले जाते। वह स्टेशन पर भी मिल जाता है। पानी के लिए भी बर्तन तो लेना पड़ता है जबकि पानी से भी अधिक आवश्यक हवा के लिए कुछ नहीं लेना पड़ता, कुछ नहीं करना पड़ता। पानी के बिना तो कुछ घण्टे चल सकता है लेकिन हवा के बिना शरीर जी नहीं सकता। ऐसी मूल्यवान हवा सर्वत्र निःशुल्क और प्रचुर मात्रा में सबको प्राप्त है।&lt;br /&gt;ऐसे ही जो अत्यंत जरूरी हैं, महान हैं वे परमात्मा स्वर्ग-नरक में सर्वत्र विद्यमान हैं, केवल मति को उन्हें देखने की कला आ जाय, बस। परमात्मा को देखने की कला आ जाय तो सदा सर्वत्र आनन्द ही आनन्द है।&lt;br /&gt;हररोज खुशी हरदम खुशी हर हाल खुशी&lt;br /&gt;जब आशिक मस्त फकीर हुआ&lt;br /&gt;तो फिर क्या दिलगिरी बाबा ?&lt;br /&gt;जैसे हवा सर्वत्र है ऐसे ही ज्ञानी जहाँ कभी जाएगा वहाँ उसके लिए सत् चित् आनन्दस्वरूप परमात्मा हाजिर हैं। उसके लिए इन्द्रियों और शरीर में रहते हुए मन, इन्द्रियों और शरीर के आकर्षण से जो पार है, अपने परमात्मानन्द में है, ब्रह्मानन्द में है ऐसे महापुरूष की तुलना तुम किससे करोगे ?&lt;br /&gt;तस्य तुलना केन जायते।&lt;br /&gt;ऐसा महापुरूष संसार की किसी भी परिस्थिति से द्वेष नहीं करता क्योंकि उसको किसी के लिए राग नहीं है तो द्वेष भी कहाँ से लायगा ? रागी को द्वेष होता है।&lt;br /&gt;ज्ञानी का राग तो संसार में है नहीं। उसका राग तो परमात्मा में है और परमात्मा सब जगह मिलते हैं, परमात्मा सर्वत्र मौजूद हैं, परमात्मा ज्ञानी का अपना आपा होकर बैठे हैं। इसलिए ज्ञानी को कोई भी सासांरिक परिस्थिति का राग नहीं है। राग नहीं है तो द्वेष भी नहीं है। राग द्वेष नहीं है तो उसका चित्त सदा समाहित है।&lt;br /&gt;सदा समाधि संत की आठों प्रहर आनंद।&lt;br /&gt;अकलमता कोई उपज्या गिने इन्द्र को रंक।।&lt;br /&gt;जिसकी वासनाओं का, अज्ञान का अन्त हो गया है उनको संत बोलते हैं। ऐसे संत इन्द्र के वैभव को भी तुच्छ गिनते हैं। ऐसा वैभव उनको प्राप्त हो गया है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-323297463146308717?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/323297463146308717/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/10/blog-post_20.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/323297463146308717'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/323297463146308717'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/10/blog-post_20.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://3.bp.blogspot.com/-SYU1kli6gA4/TXJ-0PC2mJI/AAAAAAAAAY4/MN_oJ9Hu2-4/s220/IMG0345A.jpg'/></author><media:thumbnail 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"मैं कलेक्टर से लेकर प्रधानमंत्री तक के पद पर रहा लेकिन रमण महर्षि के चरणों में जो सुख-शांति मिली वह किसी पद के भोग में नहीं मिली।"&lt;br /&gt;रमण महर्षि के चित्त में जो अव्यक्त का आनन्द छा जाता था वह एकाग्रता के द्वारा सारी सभा को भी मिल जाता था।&lt;br /&gt;कभी दीये की जलती लौ पर पलकें गिराये बना देखते जाओ। भूत-प्रेत को देखने के लिए भी लोग लौ का उपयोग करते हैं। लेकिन तुम भूत-प्रेत के चक्कर में मत पड़ना। उसमें कोई सार नहीं।&lt;br /&gt;लौ को निहारते जाओ... निहारते जाओ, फिर आँखे बन्द कर दो तो वही लौ ललाट में दिखेगी। थोड़ी देर के बाद वह अदृश्य हो जायेगी। आँखें खोलकर फिर से लौ को निहारो। ऐसे भी एकाग्रता बढ़ती है।&lt;br /&gt;ऊपर नीचे के दाँतों के बीच जिह्वा के अग्र भाग को रोक दो। मुँह ऐसे बन्द करो कि जिह्वा न ऊपर तालू में लगे न नीचे लगे। मुँह के अवकाश में टिक जाये। ऐसा करके जिह्वा को मन से निहारते जाओ... निहारते जाओ। इससे भी एकाग्रता में मदद मिलेगी।&lt;br /&gt;घड़ी का काँटा सेकण्ड-सेकण्ड करके घूम रहा है। इस काँटे को देखते हुए सेकण्डों को गिनते जाओ। इससे भी एकाग्रता की साधना हो सकती है।&lt;br /&gt;मन में &amp;nbsp;विचार चल रहे हैं। एक विचार उठा और गया। दूसरा अभी उठने को है। इसके बीच की जो निर्विचार अवस्था है उसको बढ़ाते जाओ तो तुरन्त साक्षात्कार का स्वाद आने लगेगा। दो विचारों के बीच की जो मध्यावस्था है उसको बढ़ाते जाओ तो चन्द दिनों में ऐसी ऊँचाई को पा लोगे की तुम्हारे आगे इन्द्र का राज्य भी कुछ नहीं लगेगा।&lt;br /&gt;कभी तुम नदी, सरोवर या सागर के तट पर बैठे हो तब पानी को निहारते-निहारते चित्त को एकाग्र करो। कभी घर में ही त्राटक का अभ्यास करो। दीवार पर लगे हुए काले गोलाकार के बीच पीले बिन्दु को निहारते जाओ.... निहारते जाओ। आँखों की पलकें न गिरें। जब तक आँखों से पानी न गिरे तब तक निहारते जाओ। दिनोंदिन अभ्यास बढ़ाते जाओ। कुछ ही दिनों में शक्ति आने लगेगी। सामर्थ्य का एहसास होगा। उस शक्ति या सामर्थ्य को पढ़ाई में खर्च करो, धन्धे में खर्च करो, कहीं भी खर्च करो लेकिन हम तो चाहते हैं कि उस शक्ति को शक्तिदाता परमात्मा के साक्षात्कार के लिए खर्च करके तुम उसको पा लो।&lt;br /&gt;अनेक प्रकार के प्रयोग हैं जिनके अभ्यास से तुम सर्वोच्च तपस्या में सफल हो सकते हो। सारी सृष्टि का जो आधार है वह भी एकाग्रता से प्राप्त हो सकता है। महावीर इतने एकाग्र हो गये कि कानों में कीलें लगाई गईं फिर भी उनके चित्त में क्षोभ न हुआ। यह एकाग्रता का ही प्रभाव है कि क्षत्रिय राजकुमार वर्धमान, भगवान महावीर होकर पूजे जा रहे हैं।&lt;br /&gt;हर व्यक्ति ऊँचा होना चाहता है, हर इन्सान अदभुत होना चाहता है, सबसे निराला होना चाहता है लेकिन जिससे निराला बना जाता है उस पर ध्यान नहीं है।&lt;br /&gt;एकाग्रता साधने के लिए ध्यान की भिन्न-भिन्न रीतियाँ अपनायी जाती हैं। अपने मूलाधार चक्रपर चित्त एकाग्र करने से कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत होती है। काम का केन्द्र राम में बदल सकता है, भय निर्भयता में, घृणा प्रेम में, हिंसा अहिंसा में, स्पर्धा समता में बदल सकती है।&lt;br /&gt;बार-बार किसी रूप को निहारते-निहारते उसी में चित्त को एकाग्र किया जाता है। गुरु, गोबिन्द, भगवान जो भी रूप प्यारा लगे उसको देर तक एकटक निहारते-निहारते आँखें बन्द करके भ्रूमध्य में उसी रूप को देखा जाये। ऐसा अभ्यास करने वाले साधक भी अदभुत सिद्धियाँ और सामर्थ्य पा सकते हैं। किसी रोग को निवृत्त करने के लिए इसी प्रकार एकाग्र होकर बार-बार संकल्प करने से रोग निवृत्त होते हैं। जन्म-मृत्यु का भवरोग निवृत्त करने के लिए एकाग्रता का उपयोग साक्षीभाव में किया जाता है।&lt;br /&gt;भक्तों की भक्ति, जपी का जप, योगी का योग तब फलता है जब एकाग्रता होती है। भोगी को भी सफलता तब मिलती है जब कुछ घड़ियों के लिए, कुछ समय के लिए वह एकाग्र होता है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-9110936738193381379?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/9110936738193381379/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/10/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/9110936738193381379'/><link rel='self' 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type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/-wF5J8cj-VKQ/Tn1dwFsv1zI/AAAAAAAAAk8/4ASnPU2BuR0/s1600/wahji.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="283" src="http://3.bp.blogspot.com/-wF5J8cj-VKQ/Tn1dwFsv1zI/AAAAAAAAAk8/4ASnPU2BuR0/s400/wahji.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: #f6f6f6; font-family: Courier, monospace; font-size: 14px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #990000;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;बाल संस्कार केन्द्र&lt;/span&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: medium;"&gt;पाठ्यक्रम&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&amp;nbsp;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Courier, monospace; font-size: 14px;"&gt;पुस्तक से&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="background-color: #f6f6f6; font-family: Courier, monospace; font-size: 14px;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Courier, monospace; font-size: 14px;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #a64d79;"&gt;मांसाहार छोड़ो... स्वस्थ रहो&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"यदि हृदयरोग, कैन्सर, मधुमेह, रक्तचाप, अस्थमा तथा नपुंसकता जैसी बीमारियों से बचना हो अथवा उनकी असंभावना करनी हो तो आज से ही मांसाहार पूर्णरूप से बंद करके पूर्ण शाकाहारी बन जाइये।"&lt;br /&gt;यह चेतावनी अमेरिका के 'फिजिशियन कमेटी फॉर रिस्पॉन्सिबल मेडिसन' के चेयरमैन डॉ. नील बर्नार्ड ने अमदावाद के 'एन. एच. एल. म्युनिसिप मेडिकल कॉलेज' में दी। जो भारतीय मांसाहार करते हैं उनके प्रति आश्चर्य व्यक्त करते हुए डॉ. बर्नार्ड ने कहाः "संसार के अत्यंत ठंडे देशों की जनता मौसम के अनुकूल होने की दृष्टि से मांसाहार का सेवन करती है परन्तु वह जनता भी अब जागृत होकर सम्पूर्ण रूप से शाकाहारी बन रही है। ऐसे में भारत जैसे गर्म देश की जनता मांसाहार किसलिए करती है, यह समझ में नहीं आता।&lt;br /&gt;मांसाहार से शरीर में चर्बी की परतें जम जाती हैं और धीरे-धीरे रक्त की गाँठें बनने लगती हैं। रक्तसंचरण की क्रिया पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसके फलस्वरूप अनेक बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं। इसके अलावा प्राणियों के मांस में विद्यमान हानिकारक रासायनिक पदार्थ भी कैन्सर की संभावना बढ़ाते हैं। प्राणियों के मांस में कौन-कौन से जहरीले पदार्थ होते हैं, यह एक आम आदमी नहीं जानता। पूर्ण शाकाहारी एवं संतुलित आहार लेनेवाले व्यक्ति की तुलना में मांसाहारी व्यक्ति में हृदयरोग एवं कैन्सर की संभावना कहीं अधिक बढ़ जाती है, यह प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो चुका है।&lt;br /&gt;हृदय रोग का शिकार मांसाहारी मरीज भी यदि शाकाहारी बन जाय तो वह अपने हृदय को पुनः तन्दुरूस्त बना सकता है। प्राणियों की चर्बी और कोलस्टरोल मानव शरीर के लिए अत्यंत हानिकारक है। प्राणियों का मांस वास्तव में शरीर को धीरे-धीरे कब्रिस्तान में बदल देता है। यदि स्त्रियाँ मांसाहार अधिक करती हैं तो उनमें स्तन कैन्सर की संभावना बढ़ जाती है। मांसाहारियों की शाकाहारियों की अपेक्षा 'कोलोना कैन्सर' अधिक होता है।&lt;br /&gt;अण्डे भी इस विषय में इतने ही हानिकारक हैं। प्रोस्टेट कैन्सर में मांसाहार एवं अण्डे कारणरूप साबित हो चुके हैं। अधिक चर्बीयुक्त पदार्थ शरीर में 'एस्ट्रोजन' की मात्रा बढ़ाते हैं। इससे यौन हार्मोन्स में गड़बड़ी होती है तथा स्तन एवं गर्भाशय के कैन्सर और नपुंसकता की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं।&lt;br /&gt;शाकाहारी व्यक्तियों के रक्त में कैन्सर कोषों से लड़ने वाले प्राकृतिक कोषों एवं श्वेत रक्तकणों का उत्तम संयोजन होता है।&lt;br /&gt;यदि पूर्ण मांसाहारी मनुष्य भी मात्र तीन सप्ताह तक के लिए शाकाहारी बन जाय तो उसका कोलेस्टरोल, रक्तचाप, हायपरटेंशन आदि काफी मात्रा में नियंत्रित हो सकता है।&lt;br /&gt;मांसाहारी व्यक्ति के शरीर में कैल्शियम, ऑक्सेलेट एवं युरिक अम्ल अधिक मात्रा में पैदा होते हैं जिससे पथरी होने का खतरा बना रहता है। शरीर में कैल्शियम का होना जरूरी है परन्तु उसके लिए मांसाहार की आवश्यकता नहीं है। विटामिन बी-12 भी कंदमूल से बहुत अधिक मात्रा में मिल जाता है। इस संदर्भ में हजारों वर्ष पहले भारत का शुद्ध-सात्त्विक आहार आदर्श माना जा सकता है।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #a64d79;"&gt;कोलस्टरोल नियंत्रित करने का आयुर्वैदिक उपचार&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक भाषा में जिसे कोलेस्टरोल कहते हैं, उसे नियंत्रित करने का सुगम उपाय यह है कि दालचीनी (तज) का पाउडर बना लें। एक से तीन ग्राम तक पाउडर पानी में उबालें। उबला हुआ पानी कुछ ठंडा होने पर उसमें शहद मिलाकर पीने से कोलेस्टरोल जादुई ढंग से नियंत्रित होने लगता है। एक माह तक यह प्रयोग करें। तज का पाउडर गर्म प्रकृति का होता है। इसका ज्यादा प्रयोग करने से शरीर में अधिक गर्मी उत्पन्न हो जाती है, इस बात का ध्यान रखना चाहिए। सर्दियों में यह प्रयोग बहुत ही लाभदायक है। अतः ठण्डी में इसकी मात्रा बढ़ा सकते हैं किन्तु गर्मी में कम कर देना चाहिए।&lt;br /&gt;तज के पाउडर को दूध में लेना हो तो दूध उबालने के पहले उसमें उसे डाल लें। दूध के साथ शहद विरूद्ध आहार है, अतः हानिकारक है। डायबिटीजवाले उसमें मिश्री मिला सकते हैं अथवा उसे फीका भी पी सकते हैं। इससे धातु भी पुष्ट होती है तथा वीर्यक्षय को रोकने में मदद मिलती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #a64d79;"&gt;मांसाहारः गंभीर बीमारियों को बुलावा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मांसाहार से होने वाले घातक परिणामों के विषय में सभी धर्मग्रन्थों में बताया गया है परन्तु आज के समाज का अधिकांश प्रत्येक पहलू को विज्ञान की दृष्टि से देखना पसन्द करता है। देखा जाय तो प्रायः सभी धर्म ग्रन्थों के प्रेरणास्रोत ऐसे महापुरूष रहे हैं जिन्होंने प्रकृति के रहस्यों को जानने में सफलता प्राप्त की थी तथा प्रकृति से भी आगे की यात्रा की थी। फलतः उनके प्रकृति से भी आगे के रहस्य को जानने वाला आज का विज्ञान भला कैसे झुठला सकता है, अर्थात् विज्ञान ने भी अपनी भाषा में शास्त्रों की उसी बात को दोहराया है।&lt;br /&gt;मांसाहार पर हुए अनेक परीक्षणों के आधार पर वैज्ञानिकों ने कहा है कि मांसाहार का अभिप्राय है गम्भीर बीमारियों को बुलावा देना। मांसाहार से कैन्सर, हृदय रोग, चर्म रोग, कुष्ठरोग, पथरी एवं गुर्दों से सम्बन्धित बीमारियाँ बिना बुलाये ही चली आती हैं।&lt;br /&gt;व्यापारिक लाभ की दृष्टि से पशुओं का वजन बढ़ाने के लिए उन्हें अनेक रासायनिक मिश्रण खिलाये जाते हैं। इन्ही मिश्रणों में से एक का नाम है डेस(डायथिस्टिल-बेस्ट्राल)। इस मिश्रण को खाने वाले पशु के मांस के सेवन से गर्भवती महिला के आनेवाली संतान को कैन्सर हो सकता है। यदि कोई पुरूष इस प्रकार के मांस का भक्षण करता है तो उसमें 'स्त्रैणता' आ जाती है अर्थात् उसमें स्त्री के हारमोन्स अधिक विकसित होने लगते है तथा पुरूषत्व घटता जाता है।&lt;br /&gt;मांस में पौष्टिकता के नाम पर यूरिक अम्ल होता है। ब्रिटेन के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. अलेक्जेण्डर के अनुसार यह अम्ल शरीर में जमा होकर गठिया, मूत्रविकार, रक्त विकार, फेफड़ों की रूग्णता, यक्षमा, अनिद्रा, हिस्टीरिया, एनिमीया, निमोनिया, गर्दन दर्द तथा यकृत की अनेक बीमारियों को जन्म देता है।&lt;br /&gt;मांसाहार से शरीर में कोलेस्ट्रोल की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाती है। यह कोलेस्ट्रोल धमनियों में जमा हो जाता है तथा उनको मोटा कर देता है जिससे रक्त के परिवहन में अवरोध पैदा होता है। धमनियों मे रक्त-परिवहन सुचारू तथा प्राकृतिक रूप से न होने के कारण हृदय पर घातक असर पड़ता है तथा दिल का दौरा, उच्च रक्तचाप आदि की संभावना शत-प्रतिशत बढ़ जाती है।&lt;br /&gt;जापान के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर बेंज के अनुसार, 'बूचड़खानों में मृत्यु के झूले में &amp;nbsp;झूलते तथा यातनायें सहते प्राणी के शरीर में दुःख, भय तथा क्रोध आदि आवेशों से युक्त हारमोन्स तीव्र गति से पैदा होते हैं। ये हारमोन्स कुछ ही क्षणों में रक्त घुल जाते हैं तथा मांस पर भी उनका नियमित प्रभाव पड़ता है। ये ही हारमोन्स जब मांस के माध्यम से मनुष्य के शरीर तथा रक्त में जाते हैं तो उसकी सुप्त तामसिक प्रवृत्तियों को उत्तेजित करने का कार्य बड़ी तेजी से करते हैं।"&lt;br /&gt;डॉ. बेंज ने तो अपने अनेक प्रयोगों के आधार पर यहाँ तक कह दिया है कि, "मनुष्य में क्रोध, उद्दण्डता, आवेग, आवेश, अविवेक, अमानुषिकता, आपराधिक प्रवृत्ति तथा कामुकता जैसे दुष्टकर्मों को भड़काने में मांसाहार का बहुत ही महत्त्वपूर्ण हाथ है।"&lt;br /&gt;मांसाहार में प्रोटीन की व्यापकता की दुहाई देने वालों के लिए वैज्ञानिक कहते हैं कि, "मांसाहार से प्राप्त प्रोटीन समस्या नहीं, अपितु समस्याएँ की कतारें खड़ी कर देता है। इससे कैल्शियम के संचित कोष खाली हो जाते हैं तथा गुर्दों को बेवजह परिश्रम करना पड़ता है जिससे वे क्षतिग्रस्त हो जाते हैं।"&lt;br /&gt;मांसाहार कब्ज का जनक है क्योंकि इसमें रेशे (फाइबर) की अनुपस्थिति होती है जिससे आँतों की सफाई नहीं हो पाती। इसके अतिरिक्त कत्लखाने में कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों से ग्रस्त पशुओं का भी कत्ल हो जाता है। ये रोग मांसाहारी के पेट में मुफ्त में पहुँच जाते हैं। आर्थिक दृष्टि से मांसाहार इतना मंहगा है कि एक मांसाहारी की खुराक में लगे पैसों से कई शाकाहारियों का पेट भरा जा सकता है।&lt;br /&gt;इस प्रकार मांसाहार की हानियों को उजागर करने वाले सैंकड़ों तथ्य हैं। अस्तु मांसाहार कि विरोध तो आर्षदृष्टा ऋषियों ने, सन्तों-कथाकारों ने सत्संग में भी किया, वही विरोध अब विज्ञान के क्षेत्र में भी हुआ है। फिर भी आपको मांसाहार करना है, अपनी आनेवाली पीढ़ी को कैन्सर ग्रस्त करना है, अपने को बीमारियों का शिकार बनाना है तो आपकी मर्जी। अगर आपको अशान्त-खिन्न-तामसी होकर जल्दी मरना है, तो करिये मांसाहार, नहीं तो त्यागिये मांसाहार। गुटखा, पान-मसाला, शराब को त्यागिये भैया ! हिम्मत कीजिये.... अपनी सोई हुई सज्जनता जगाइये.... अपनी महानता में जागिये.....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #a64d79;"&gt;मांसाहारी मांस खाता है परंतु मांस उसकी हड्डियों को ही खा जाता है !&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सेन फ्रांसिका स्थित कैलिफौर्निया विश्वविद्यालय के मेडिकल सेन्टर, माउण्ट जीओन में डॉ. सेलमायर द्वारा किये गये एक नवीन शोध के अनुसारः "पशुओं की चर्बी से मिलने वाले प्रोटीन का अस्थिक्षय एवं हड्डियाँ टूटने के रोगों से घनिष्ट संबंध है।"&lt;br /&gt;अम्ल को क्षार में रूपान्तरित करने वाला रसायन (बेज़) सिर्फ फल एवं शाकाहार से ही प्राप्त होता है। मांसाहार से शरीर में अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है। उसे क्षार में रूपान्तरित करने के लिए हड्डियों की मज्जा में स्थित बेज़ को काम में लाना पड़ता है, क्योंकि हड्डियाँ मज्जा एवं कैल्शियम से बनी होती हैं अतः मज्जा के क्षय होने से हड्डियाँ धीरे-धीरे गलने लगती हैं। इससे अस्थिक्षय की बीमारी उत्पन्न होती है अथवा छोटी-सी चोट लगने पर भी व्यक्ति की हड्डियाँ टूटने की समस्या पैदा हो जाती है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-8568007563578211285?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/8568007563578211285/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/09/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/8568007563578211285'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/8568007563578211285'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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वाले, समाज को एक नयी दिशा प्रदान करने वाले हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरुजनों के तथा राजा के आगे उनसे ऊँचे आसन पर या पैर के ऊपर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिए और उनके वाक्यों का तर्क द्वारा खण्डन नहीं करना चाहिए। दान, मान और सेवा से अत्यंतत पूज्यों की सदा पूजा करें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी प्रकार से सूर्य की ओर देर तक न देखें। सिर पर बहुत भारी बोझ लेकर न चलें। इसी प्रकार अत्यंत सूक्ष्म, अत्यंत चमकीली, अपवित्र और अप्रिय वस्तुओं को देर तक नहीं देखना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मल-मूत्रादि वेगों को रोके हुए किसी कार्य को करने में प्रवृत्त न हो और उक्त वेगों को बलपूर्वक न रोके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परस्पर बातचीत करते हुए दो व्यक्तियों के बीच में से नहीं निकलना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरुजन, बलवान, रोगी, शव, राजा, माननीय व्यक्ति, व्रतशील और यान (सवारी) पर जाने वाले के लिए स्वयं हटकर मार्ग दे देना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परस्त्री की कामना करने वाले बहुत से मनुष्य संसार में नष्ट हो गये, जिनमें इन्द्र, दण्डक्य, नहुष, रावण आदि के उदाहरण प्रसिद्ध हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महान ऐश्वर्य प्राप्त करके भी पुत्र को पिता की आज्ञा के अनुसार ही चलना चाहिए क्योंकि पुत्र के लिए पिता की आज्ञा का पालन करना परम भूषण है। (शुक्रनीतिः 2.37.38)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य को सदा दूर का सोचने वाला, समयानुसार सूझबूझवाला तथा साहसी बनना चाहिए, आलसी और दीर्घसूत्री नहीं होना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चाहे वह कुबेर ही क्यों न हो, किसी का भी संचित धन नित्य धनागमन के बिना इच्छानुसार व्यय करने के लिए पर्याप्त नहीं होता अर्थात् एक दिन समाप्त हो जाता है, अतः आय के अनुसार ही व्यय करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्वदा विश्वासपात्र किसी व्यक्ति का यहाँ तक कि पुत्र, भाई, स्त्री, अमात्य (मंत्री) या अधिकारी पुरुष का भी अत्यन्त विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि व्यक्ति को धन, स्त्री तथा राज्य का लोभ अधिक रूप से होता है। अतः प्रामाणिक, सुपरिचित एवं हितैषी लोगों का सर्वत्र विश्वास करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छिपकर विश्वासपात्र के कार्यों की परीक्षा करें और परीक्षा करने के बाद विश्वासपात्र निकले तो उसके वचनों को निःसंदेह सर्वताभावेन मान लें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य अपने आपत्काल में किसी बलवान मनुष्य की बुरी सत्य बात भी कहने के लिए मूक (गूँगा) बन जाये, किसी के दोष देखने के लिए अंधा, बुराई सुनने के लिए बहरा र बुराई प्रकट करने के लिए भागदौड़ में लँगड़ा बन जाय। इससे विपरीत आचरण करने पर मनुष्य दुःख उठाता है और व्यवहार से गिर जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस समय जो कार्य करना उचित हो, उसे शंकारहित होकर तुरंत कर डाले क्योंकि समय पर हुई वृष्टि धान्य आदि की अत्यन्त पुष्टि और समृद्धि का कारण बनती है तथा असमय की वृष्टि धान्य आदि का महानाश कर देती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वजनों के साथ विरोध, बलवान के साथ स्पर्धा तथा स्त्री, बालक, वृद्ध और मूर्खों के साथ विवाद नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुद्धिमान पुरुष अपमान को आगे और सम्मान को पीछे रखकर अपने कार्य को सिद्ध करे क्योंकि कार्य का बिगड़ जाना ही मूर्खता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक साथ अनेक कार्यों का आरम्भ करना कभी भी सुखदायक नहीं होता। आरम्भ किये हुए कार्य को समाप्त किये बिना दूसरे कार्य को आरम्भ नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आरम्भ किये हुए कार्य को समाप्त किये बिना दूसरा कार्य आरम्भ करने से पहला कार्य संपन्न नहीं हो पाता और दूसरा कार्य भी पड़ा रह जाता है, अतः बुद्धिमान मनुष्य उसी कार्य को आरम्भ करे जो सुखपूर्वक समाप्त हो जाये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अत्यधिक भ्रमण, बहुत अधिक उपवास, अत्यधिक मैथुन और अत्यंत परिश्रम – ये चारों बातें सभी मनुष्यों के लिए बहुत शीघ्र बुढ़ापा लाने वाली होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसको जिस कार्य पर नियुक्त किया गया हो, वह उसी कार्य को करने में तत्पर रहे, किसी दूसरे के अधिकार को छीनने की इच्छा न करे और किसी के साथ ईर्ष्या न करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो मनुष्य मधुर वचन बोलते हैं और अपने प्रिय का सत्कार करना चाहते हैं, ऐसे प्रशंसनीय चरित्रवाले श्रीमान लोग मनुष्यरूप में देवता ही है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-1347177751361735466?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/1347177751361735466/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/08/2.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/1347177751361735466'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/1347177751361735466'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/08/2.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://3.bp.blogspot.com/-SYU1kli6gA4/TXJ-0PC2mJI/AAAAAAAAAY4/MN_oJ9Hu2-4/s220/IMG0345A.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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/&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #7f6000; font-size: large;"&gt;श्रीकृष्ण दर्शन &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;पुस्तक से&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #e69138;"&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #e69138;"&gt;&lt;b&gt;अदभुत प्राणोपासना&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण में श्री वशिष्ठजी महाराज कहते हैं-&lt;br /&gt;"जो अपने आत्मदेव में स्फुरण पैदा होता है वह क्षणमात्र में योजनपर्यंत जाता है। उस स्फुरण के आधार को जानकर हे रामजी ! तुम स्थिर हो जाओ।"&lt;br /&gt;बहुत ऊँची बात है। हम होते यहाँ &amp;nbsp; हैं और मीलों दूर हमारा मन जाता है। .....वापस आता है.... दूसरी जगह जाता है.... वापस आता है....तीसरी जगह जाता है। अभी मन में कुछ विचार चल रहे हैं, दस मिनट के बाद कौन-से विचार आयेंगे कोई पता नहीं। इस प्रकार असंख्य विचार मन से बहते रहते हैं... असंख्य। जैसे सरोवर या सागर के जल में तरंग उठते हैं वैसे ही हमारे शुद्ध आत्मदेव की सत्ता लेकर मन में असंख्य विचार-तरंग उठते हैं जिसे मन का स्फुरण कहा जाता है। जहाँ से यह स्फुरण उठता है उस आत्मदेव को सिर्फ तीन मिनट के लिए भी अगर कोई जान लेता है तो वह धर्म के फल को प्राप्त कर लेता है। वह योगी हो तो उसका योग सिद्ध हो जाता है, तपस्वी हो तो उसका तप सफल हो जाता है, जपी हो तो उसका जपानुष्ठान सार्थक हो जाता है, वह त्यागी हो तो उसका त्याग पूर्णत्व को पा लेता है। ऐसा ऊँचा अनुभव होता है।&lt;br /&gt;ऐसी बात पढ़ जाते हैं, सुन लेते हैं लेकिन सूक्ष्मता से यह बात अगर पकड़ में आ जाय तो निहाल हो जायें, बेड़ा पार हो जाय।&lt;br /&gt;ऐसी बातें सूक्ष्मता से पकड़ नहीं पाते इसका क्या कारण है ? कारण यह है कि अपने चित्त में बिनजरूरी कचरा खूब भर लेते हैं। इसलिए सूक्ष्म सत्त्व, सूक्ष्म तत्त्व में हमारा चित्त प्रवेश नहीं कर पाता। वह सत्त्व उपासकों का ईश्वर होकर दिखता है, भक्तों का भगवान होकर दिखता है। शक्ति के उपासक उसको शक्ति मानते हैं, जगदम्बा के आराधक उसे माँ मानते हैं, गुरूभक्त उसे गुरू मानते हैं। है वही एक ही सत्त्व।&lt;br /&gt;शुद्ध चैतन्य में से जो स्पन्दन पैदा होते हैं वे स्पन्दन बेमाप होते हैं। अगर चैतन्य की स्पन्दनरहित अवस्था में पहुँच जायें तो बेड़ा पार हो जाय। नहीं जा पाते, इसका कारण यह है कि उसके लिए तत्परता नहीं है। वहाँ ले जानेवाले महापुरूषों का समागम जल्दी से हो नहीं पाता। महापुरूष भी मिल गये और थोड़ी बहुत तत्परता भी है लेकिन चित्त में बिनजरूरी कचरा भरने की आदत पुरानी है।&lt;br /&gt;आधुनिक युग के चाणक्य नीतिवाले, मानो आधुनिक चाणक्य सरदार वल्लभाई पटेल किशोरावस्था में नड़ियाद की स्कूल में पढ़ते थे तब की घटना है। एक दिन स्कूल में मास्टर कुछ बोले जा रहे थे। वल्लभ को लगा कि सब व्यर्थ प्रलाप हो रहा है। वे सुना-अनसुना करके मीठी नींद लेने लगे। मास्टर को लगा कि मैं छात्रों को पढ़ा रहा हूँ, बोले जा रहा हूँ और उद्दण्ड लड़का सो रहा है बेपरवाह होकर ? जगाकर धमकायाः&lt;br /&gt;"ऐ लड़के ! क्या कर रहा है ? मैं इतना सिखा रहा हूँ और तू खर्राटे भर रहा है, बदतमीज !"&lt;br /&gt;विवेकी और अपने मस्तिष्क में व्यर्थ बातें नहीं भरने वाले वल्लभ ने बढ़िया जवाब दियाः&lt;br /&gt;"मास्टर जी ! बुरा न मानना। आप जो बोलते हैं वह सब अपने दिमाग में भरता रहूँ तो आप जो नहीं जानते हैं वह भरने के लिए जगह कहाँ से लाऊँ ? इसलिए जानबूझकर दिमाग को विश्रांति दे रहा हूँ।"&lt;br /&gt;ऐसे लोगों में आत्मविश्वास होता है। व्यर्थ बातें अपनी खोपड़ी में नहीं भरो। सामने वाला जो जानता है वह सब अपनी खोपड़ी में भरना है ? हलवाई की दुकान पर जाकर सब मिठाई लेने की है ? किराने की दुकान पर जाओ तो सारी चीजें ले लोगे ?&lt;br /&gt;तुम कहीं भी जाते हो, वहाँ जो कुछ मिलता है, अपने चित्त में भरते रहते हो। बस में बैठे तो सभी विज्ञापनों के चित्रों को देखने लग गये। इधर यह देखा, उधर वह देखा, यह सुना, वह सुना। सब दिमाग में भरते गये। बाहर निकालकर खाली हो जाने की तो बात ही नहीं।&lt;br /&gt;....तो फिर जगत के लोग जो ज्ञान नहीं जानते उसको तो अपने चित्त में प्रवेश ही नहीं मिलेगा - No Entry. तत्त्वज्ञान की बात के लिए अपने दिमाग में No Entry है। दिमाग पूरा भरा हुआ है संसार के कचरे से। इसीलिए तत्त्वज्ञान की सूक्ष्म बातें ग्रहण नहीं कर पाते। चित्त शांत- स्थिर नहीं हो पाता।&lt;br /&gt;भगवान बुद्ध के पास कोई सेठ गया। कहने लगाः&lt;br /&gt;"भन्ते ! अब मुझे पचास वर्ष पूरे हुए हैं। अब वन में जाने का प्रारम्भ हुआ है, एकावन.... बावन.... आदि। कृपा करके आप मुझे अपने जीवन का अनुभव बताएँ। दो वचन सुनाएँ जिससे मेरा उद्धार हो।" तब तक तो सेठ ने इधर नजर घुमाई, उधर दृष्टि की। अपनी अँगूठी की ओर देखा। कुछ-की-कुछ प्रवृत्तियाँ कर डाली।&lt;br /&gt;बुद्ध समझ गये कि चित्त में बहुत कचरा उभरा हुआ है। अभी सिर्फ दवाई देने से रोग मिटेगा नहीं, ऑपरेशन करना पड़ेगा। वे बोलेः&lt;br /&gt;"भाई ! हमने इतनी सारी मेहनत की, वर्षों तक भूख, प्यास और कष्ट सहे और जो अनुभव पाया वह यों ही मुफ्त में तुम्हें दे दें ? बिना सेवा के ज्ञान पचेगा कैसे ? सेवा करो सेवा।"&lt;br /&gt;सेठ: "भन्ते ! आज्ञा कीजिए।"&lt;br /&gt;बुद्ध: "आज्ञा क्या करें ? साधू-संतों को भोजन कराओ।"&lt;br /&gt;सेठ: "आप हमारे घर भोजन लेंगे ?"&lt;br /&gt;बुद्ध: "क्यों नहीं ? तुमने निमंत्रण तो दिया नहीं। सेवा तो किया नहीं, केवल लूटने को आये हो। हम ऐसे पागल थोड़े ही हैं कि लूटे जाएँ ?"&lt;br /&gt;बुद्ध यह सब उस व्यक्ति को देखकर कहते हैं। स्वयं को खाने की कोई इच्छा नहीं, कुछ लेने की इच्छा नहीं। लेकिन उसको कुछ अनुभव कराना है।&lt;br /&gt;"आप मेरे घर भिक्षा ग्रहण करने आयेंगे ! बड़ी खुशी की बात है।" सेठ खुश हो गये। सारा इन्तजाम करने लगे। रसोइयों को बुलाया, मित्रों से बात की। 'भगवान बुद्ध भिक्षा ग्रहण करने आनेवाले हैं ! राजकुमार में से साधू बने थे, कोई साधारण साधू तो थे नहीं। खूब तैयारियाँ की, खीर बनायी, पूड़ी बनायी, मालपूआ बनाया, क्या-क्या पकवान बनाये, व्यंजन बनाये। 'हमारे द्वार पर संत आने वाले हैं.....!'&lt;br /&gt;भिक्षा का समय हुआ और बुद्ध भिक्षापात्र उठाकर चल दिये। रास्ते में कुछ सामान ढूँढते चले। उनकी नजर में पड़ गया किसी गाय का गोबर। उसे उठाकर अपना भिक्षापात्र भर लिया। सेठ के द्वार पर पहुँचे तो सेठ ले आया सब भोजन सामग्री।&lt;br /&gt;"महाराज ! लो।"&lt;br /&gt;गोबर से भरा हुआ भिक्षापात्र आगे बढ़ाते हुए बुद्ध बोलेः&lt;br /&gt;"डाल दो इसमें।"&lt;br /&gt;सेठ: "भन्ते ! यह तो गोबर से भरा है।"&lt;br /&gt;बुद्ध: "भरा है तो भरा है, तुम अपनी खीर उसमें डाल दो।"&lt;br /&gt;सेठ: "स्वामी ! खीर आपको काम नहीं लगेगी और मेरी खीर खराब होगी।"&lt;br /&gt;बुद्ध: "भिक्षा लेने बुलाया है तो भिक्षा दो न !"&lt;br /&gt;सेठ: "दूँ तो सही लेकिन अपना भिक्षापात्र मुझे दो। गोबर निकाल कर फिर ठीक से धो लूँ, बाद में भिक्षा दूँ।"&lt;br /&gt;"तुम चार पैसे की खीर डालने से पहले बर्तन साफ करते हो तो मैं अपना ब्रह्मरस तुम्हारे अन्तःकरण में भरने से पहले तुम्हारा अन्तःकरण साफ करूँ कि नहीं ?"&lt;br /&gt;प्रारम्भ में जो योगवाशिष्ठ की बात आयी थी वह बहुत सूक्ष्म थी लेकिन अपने कानों से टकराकर चली गई, अपनी नहीं रही। क्यों ? क्योंकि जगत का गोबर अपने अन्तःकरण में भरा हुआ है न !&lt;br /&gt;सूक्ष्म बुद्धि के आदमी को इशारे से कह दो, वह काम बढ़िया कर देता है लेकिन मोटी बुद्धि के आदमी को बार-बार कहो तो भी समझ में नहीं आता।&lt;br /&gt;कबीरजी की पत्नी बड़ी सूक्ष्म बुद्धि की थी। कबीर जी ने कहाः&lt;br /&gt;"लोई ! एक बात सुन। मैं एक प्रज्ञाचक्षु (अंध) व्यक्ति को भोजन का निमंत्रण दे आया हूँ। अपना भोजन बने, साथ-साथ उस व्यक्ति का भोजन भी बना देना।"&lt;br /&gt;लोई ने भोजन बनाया। प्रज्ञाचक्षु व्यक्ति आये उसके पहले दो थालियाँ भोजन परोसकर तैयार कर दिया। पहले अतिथि भोजन कर लें बाद में घरवाले सब। कबीरजी ने दो थालियाँ देखकर पूछाः&lt;br /&gt;"दो थालियाँ क्यों ? एक ही व्यक्ति आने वाला है तो अधिक भोजन क्यों बनाया ?"&lt;br /&gt;लोई: "एक ही व्यक्ति आने वाले थे और आपने कहा कि प्रज्ञाचक्षु (अंध) हैं तो अकेले तो आयेंगे नहीं, किसी को साथ में लेकर आयेंगे इसलिए दो थालियाँ परोसी हैं।"&lt;br /&gt;कबीरजी बड़े प्रसन्न हुए की आखिर तो लोई कबीर की पत्नी है।&lt;br /&gt;व्यवहार में आदमी अनुमान लगाकर किसी विषय में पूर्व तैयारी कर लेता है ऐसे ही आयुष्य पूरा होगा तो तन और मन कहीं चले जायें उसकी अपेक्षा पहले से ही तैयारी रखें।&lt;br /&gt;फुरने जहाँ से उत्पन्न होते हैं, संकल्प और विकल्प जहाँ से उठते हैं और योजनों तक चले जाते हैं, वापस आते है, बार-बार आते जाते हैं, उसको जो देखता है उस अधिष्ठान को जानने के लिए जो यत्न करता है...... अहाहा....! उसकी सारी पूजाएँ सफल हो गयी। उसको फिर आकाश से भगवान को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मरकर भगवान के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वह स्वयं भगवन्मय हो जायेगा, साक्षात् नारायण का स्वरूप हो जायेगा।&lt;br /&gt;जहाँ से फुरना उठता है और मीलों तक चला जाता है उसमें थोड़ी विश्रांति मिल जाय। इस विश्रांति में आलस्य नहीं, प्रमाद नहीं, मनोराज्य नहीं, निद्रा नहीं। इसमें थोड़ी सूक्ष्मता, तत्परता और गुरूकृपा। यह मौका अगर मिल जाय तो घोड़े के रकाब में पैर डालते-डालते आत्म-साक्षात्कार हो जाता है, ईश्वर की प्राप्ति हो जाती है। अन्यथा, वर्षों तक करता रहे फिर भी पूर्ण नहीं होता। वर्षों तक करके भी बुद्धि सूक्ष्म बनाकर फिर यहीं आना है। संसार के सब व्यवहार करके भी इसी जन्म में या हजारों जन्म के बाद भी यहाँ तो आना ही पड़ेगा।&lt;br /&gt;आपका संकल्प, फुरना उठकर चलता है, क्षणभर में मीलों तक जाता है, फिर दूसरा उठता है... तीसरा उठता है....। तो फुरना या सकल्प जहाँ से उठता है उसमें जरा टिक जायें, बस। एक विचार उठा.... दूसरा अभी उठने को है, दोनों के मध्य में रूक जायें, बेड़ा पार हो जाय। यह रूकना इतना जरूरी है जितना नवजात शिशु को माँ का दूध जरूरी है या हमारे शरीर को प्राण जरूरी है। मुक्ति के लिए फुरनों के अधिष्ठान में रूकना, वहाँ विश्रांति पाना अनिवार्य है। बिना प्राण का शरीर व्यर्थ है ऐसे ही बिना विश्रांति के, बाकी की सारी उपलब्धियाँ व्यर्थ हैं। इसीलिए नरसिंह मेहता ने ठीक कहाः&lt;br /&gt;ज्यां लगी आत्मातत्त्व चीन्यो नहीं, त्यां लगी साधना सर्व जूठी।&lt;br /&gt;अर्थात् तब तक किसी साधन में रूक न जाएँ, चलते ही जाएँ, ऊपर उठते ही जाएँ, आगे बढ़ते ही जाएँ। अगर इस साधन में गति हो गई तो दूसरे सब साधन सफल हो गये ।&lt;br /&gt;मन को, बुद्धि को भागने की, दौड़ने की आदत पुरानी है और आप उनसे जुड़ जाते हो यही भी आदत पुरानी है। इसीलिए बहुत कठिन भी लगता है।&lt;br /&gt;अगर डटकर बैठ जायें और यही करें तो उत्तम जिज्ञासु को ज्यादा समय नहीं लगता। सत्पात्र हो, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता हो, सदाचारी हो, गुरूआज्ञा शिरोधार्य करता हो, संसार की लोलुपता न हो उस साधक के लिए ईश्वर तो अपने घर की चीज है।&lt;br /&gt;दिले तस्वीर है यार।&lt;br /&gt;जबकि गरदन झुका ली, मुलाकात कर ली।।&lt;br /&gt;उसके लिए यह चीज है। जैसे सुन्दरी को अपना मुख देखने में कितनी देर ? अरे, झट पर्स से आयना निकाला, मुख देख लिया।&lt;br /&gt;जैसे व्यक्ति आईने में अपना मुख देखने में देर नहीं करता ऐसे ही जिसके पास दिल का आइना है वह दिलबर को जब चाहे, जितनी बार चाहे, देख सकता है। किसी वेदान्तिक संत ने ठीक ही कहा हैः&lt;br /&gt;ऐ तालिबे मंजिले तू मंजिल किधर देखता है।&lt;br /&gt;दिल ही तेरी मंजिल है तू अपने दिल की ओर देख।।&lt;br /&gt;एक विचार उठा.... दूसरा उठने को है..... उसके बीच की अवस्था को देख। अपने भीतर उठते हुए संकल्पों को सूक्ष्मता से देख।&lt;br /&gt;कई लोगों ने तप किया, जप किया, कई घर छोड़कर हिमालय गये, कोई कहीं गया कोई कहीं गया, इस देव को रिझाया, उस देव को रिझाया। अंत में जिस किसीको भी ईश्वर-प्राप्ति हुई तो अपने हृदय में ही हुई। चाहे राम जी के उपासक हो चाहें कृष्णजी के हों चाहे शिवजी के हों चाहे कालीजी के हों चाहे गुरूजी के हों अथवा और किसी के हों लेकिन ईश्वर जब मिला है तब दिल में ही मिला है।&lt;br /&gt;अंतर्यामी देव को छोड़कर जो बाहर के देव को पूजता फिरता है वह तो कर्मलेढ़ी कहा जाता है। जैसे, हाथ में मक्खन का पिण्ड आये उसको गिराकर छाछ चाटने लग जाय, ऐसे ही अंतरतम चैतन्य आत्मदेव का रस, सुख और आनन्द छोड़कर बाहर किसी वस्तु या व्यक्ति को रिझाने में लग जाय उसको क्या कहेंगे ? 'यह मिले तो सुखी हो जाऊँ, वह मिले तो सुखी हो जाऊँ, यह देव आवे तो वरदान दे, वह देव आवे तो सहाय करे....' वह देव भी इस आत्मदेव में मन लगेगा तब खिंचकर आयेगा, नहीं तो सबके पास क्यों नहीं जाता ? बुलाते तो कई हैं ! काली आ जाय, श्रीकृष्ण आ जायें, शिवजी आ जायें, रामजी आ जायें, रहेमान आ जाय.... लेकिन जितन तुम भीतर के देव से वफादार होगे उतने ही बाहर के देव सहज में प्रकट होंगे।&lt;br /&gt;अहमद शाह नाम का एक सूफी फकीर हो गया। वह कृष्णभक्ति में बड़ा मस्त रहता था। श्रीकृष्ण से बड़ा प्यार था उसको। कोई पुजारी की तरह वह प्यार नहीं करता था। उसके पास कोई आरती नहीं थी, टकोरी नहीं थी, श्रीकृष्ण की प्रतिमा भी नहीं थी। कर्षति आकर्षति इति कृष्णः। जो आकर्षित कर ले, आनंदित कर दे वह कृष्ण। वह अहमद शाह ऐसे श्रीकृष्ण को खूब स्नेह करता था। सदा उसके ध्यान में तल्लीन रहता था।&lt;br /&gt;अहमद शाह श्रीकृष्ण का ऐसा बढ़िया भक्त था कि श्रीकृष्ण भी उससे दिल्लगी करने प्रकट हो जाते। जैसे नामदेव के आगे भगवान बावन बार प्रकट हुए ऐसे ही अहमद शाह के आगे श्रीकृष्ण कई बार प्रकट हुए।&lt;br /&gt;सर्दियों के दिन थे। अहमद शाह तापणा ताप रहा था। श्रीकृष्ण की इच्छा विनोद करने की हुई। वे युवक ब्राह्मण का रूप लेकर आये। उस वक्त अहमद शाह ने सिर पर तीलियों का टोपा पहना हुआ था। श्रीकृष्ण आकर बोलेः&lt;br /&gt;"अहमद !"&lt;br /&gt;अहमद शाह ने सोचा कि यह ब्राह्मण का बच्चा मेरा नाम ऐसे ही लेता है मानो कोई पुराना पहचान वाला है ! बोलाः&lt;br /&gt;"क्या है ?"&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण: "इतना लम्बा-चौड़ा टोपा पहना है। बोलो, टोपा बेचोगे ?"&lt;br /&gt;अहमद पहचान गया कि श्रीकृष्ण के सिवा दूसरे की हिम्मत नहीं है। उसने कह दियाः&lt;br /&gt;"अहमद का टोपा खरीदनेवाला कोई पैदा ही नहीं हुआ।"&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण: "मैं खरीदता हूँ अहमद !"&lt;br /&gt;अहमद: "तुम क्या खरीदोगे ? तुम्हारे पास है क्या ?"&lt;br /&gt;तब ब्राह्मण वेशधारी नटखट नागर ने कहाः "मेरे पास क्या नहीं है ? जो मूल्य माँगो, मैं चुका सकता हूँ।"&lt;br /&gt;अहमद: "तुम्हारे पास है क्या, मैं जानता हूँ। बहुत-बहुत तो यह लोक और परलोक। इन दो लोकों में अहमद का टोपा नहीं बिकता है। और कोई मिल्कियत हो तो बात करो।"&lt;br /&gt;प्रेम में नेम (नियम) नहीं होता। अहमद का शुद्ध प्रेम था।&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण बोलेः "अहमद ! तुम तो अपने को इतना बड़ा मानते हो ? बड़े अभिमानी हो गये हो ?"&lt;br /&gt;अहमद: "बड़े अभिमानी हो गये, छोटे अभिमानी हो गये, कुछ भी हो लेकिन अहमद का टोपा खरीदना कोई बच्चों का खेल है ?"&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण: "अहमद ! मैं लोगों को कह दूँगा कि अहमद पक्के फकीर नहीं हैं, बड़े अभिमानी हैं। ये पक्के संत नहीं हैं। यह जानकर लोग तुम्हारे को पूछेंगे भी नहीं।"&lt;br /&gt;"जाओ जी जाओ, किसको दम भरते हो, किसको डांटी देते हो ? तुम्हारी दमदाटी में हम आने वाले नहीं हैं। किसको भय दिखाते हो ? जाओ-जाओ सब लोगों को कह दो। लेकिन आप भी सावधान रहना। आपके बारे में मेरे पास भी कुछ कहने को है। मैं भी लोगों को कह दूँगा कि, 'कन्हैया सिर्फ मठ-मंदिरों में ही नहीं है। &amp;nbsp;उसके लिये घंटियाँ बजा-बजाकर, आरतियाँ उतार-उतारकर मक्खन हाथ में धरके चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। भीतर गोता मारो। भीतर एक वृत्ति उठे, दूसरी अभी उठने को है उसके बीच जो उनका अधिष्ठान है, जो सबको आकर्षित करता है वह कृष्ण है। उसकी उपासना करो।' फिर आपके पूजा-उत्सवों का सब झमेला ठण्डा हो जायेगा।"&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण कहते हैं: "सबकी गति वहाँ नहीं हो पायेगी। अहमद ! ऐसा मत करना।"&lt;br /&gt;अहमद: "ऐसा मत करना... तो आप भी ऐसा मत करना।"&lt;br /&gt;श्रीकृष्ण: "अच्छा, मिलाओ हाथ।"&lt;br /&gt;दोनों ने हाथ मिलाया, आलिंगन किया। समझौता हो गया।&lt;br /&gt;आपको श्रीकृष्ण से मिलना है तब भी यह योगयुक्ति बहुत बढ़िया है, शिवजी से मिलना है तभी, विष्णुजी से मिलना है तभी, जगदम्बा से मिलना है तभी, ब्रह्मवेत्ता सदगुरू से मिलना है तभी और किसी मित्र से मिलना है तभी यह योगकला काम में आ सकती है। अंतर्यामी चैतन्य विश्वव्यापक है। अरे, विश्व तो इसके एक कोने में है। ब्रह्मचैतन्य के एक कोने में माया है और माया के एक कोने में जगत है।&lt;br /&gt;इतना विश्वंभर तत्त्व तुम्हारा चैतन्य चिदाकाश है। उससे एक स्पन्दन उठता है। जैसे आपका श्वास अन्दर जाता है, उच्छवास बाहर आता है। अन्दर श्वास जाता है वह ठण्डा होता है जो बाहर आता है वह गर्म होता है। यह तुम्हारा अनुभव होगा।&lt;br /&gt;तुम जानते हो कि स्टोव, पेट्रोमेक्स या सायकल, स्कूटर आदि के टायर में एकाध पंक्चर हो जाय, छोटा-सा सुराख हो जाय तो कंपनी का मालिक आकर हाथ जोड़े, फिर भी स्टोव नहीं जलेगा, सायकल-स्कूटर नहीं चलेंगे।&lt;br /&gt;हमारे शरीर में कितने-कितने छेद हैं ? श्वास आता है, जाता है, श्वास का तो पसारा है। देहरूपी पुतली चल रही है श्वास पर। इस श्वास को खींचने की और छोड़ने की जहाँ से प्रक्रिया होती है उस प्रक्रिया के मूल में काम चैतन्य का होता है। इससे फेफड़े स्पन्दित होते हैं। ऐसा नहीं कि तुम्हारी रोटियों से वे स्पन्दित होते हों। नहीं, वह चिदाकाश चैतन्य है।&lt;br /&gt;शांति से बैठ जाओ। आप देखो कि श्वास चल रहा है। कुछ दिन श्वास को देखते जाओ। अथवा गिनते जाओ, अथवा अजपा गायत्री करते जाओ। आपको धीरे-धीरे श्वास की गतिविधि का पता चलेगा। जिसके हाथ में श्वास की गति की युक्ति आ गयी उसको समर्थ होने में देर नहीं लगेगी। उसको निर्विकार होने में तकलीफ नहीं पड़ेगी।&lt;br /&gt;कुछ न करो केवल श्वास को देखते रहो। इसको श्वास की माला बोलते हैं। लेकिन आलस्य नहीं होना चाहिए, दिमाग में कचरा भरने की आदत मिटाते रहना चाहिए। इस साधना में केवल तत्पर होने की कोशिश करे तभी भी आदमी सफल हो सकता है।&lt;br /&gt;अपनी-अपनी जगह पर सब साधनाएँ ठीक हैं लेकिन यह आत्म-विचार का मार्ग तो अनूठा ही है। जिनका प्राणोत्थान होता है, क्रियाएँ होती हैं उनको तो ठीक है, नाड़ीशुद्धी होती है, आगे बढ़ते हैं। लेकिन कभी-कभी मौका मिले तो श्वास को देखो।&lt;br /&gt;सारे जगत का आधार है प्राणशक्ति। पक्षियों की किलोल प्राणशक्ति पर आधारित, मनुष्य का चलना-फिरना भी प्राणशक्ति पर आधारित, वृक्षों का बढ़ना, फूलों का खिलना और फलों का बनना, इसमें भी प्राणशक्ति काम करती है।&lt;br /&gt;अमावस्या और पूर्णिमा के दिन सागर में ज्वार आती है। एकम से लेकर क्रमशः हररोज पौना घण्टा ज्वार लेट होती चली जाती है। जो लोग सागरतट पर रहते हैं उनको पता होगा।&lt;br /&gt;जिस समय समुद्र में ज्वार आती है उस समय काटे गये वृक्षों के अंगरस में जलतत्त्व अधिक जाने से उस लकड़ी में कीड़े जल्दी लगने की सम्भावना होती है। वृक्ष की डाली काटो तो डाली रूग्ण हो जाती है। भाटा के समय काटो तो रुग्ण नहीं होती।&lt;br /&gt;चाँद आकाश में है और उसका प्रभाव समुद्र पर पड़ता है। पूर्णिमा और अमावस्या का प्रभाव समुद्र पर पड़ता है। सातम्, आठम, दूज या एकादशी का प्रभाव समुद्र पर पड़ता है। यह प्रभाव जैसे समुद्र पर पड़ता है वैसे हवाओं पर भी प्रभाव पड़ता है और वनस्पति पर भी पड़ता है। वृक्षों पर प्रभाव पड़ता है तो मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।&lt;br /&gt;दयालु ऋषियों ने खूब सूक्ष्म अध्ययन किया है। इसीलिए उन्होंने खोजा कि एकादशी का व्रत रखना चाहिए, पूनम का व्रत रखना चाहिए क्योंकि उन दिनों में चन्द्रमा विकसित होता है। सूर्य की किरणें सीधी चन्द्रमा पर पड़ती है इसलिए प्राणशक्ति कुछ कमजोर होती है। उन दिनों में व्यक्ति की जठराग्नि थोड़ी सी मंद रहती है। अष्टमी के बाद चाँद बढ़ता जाता है तो जठराग्नि मन्द होती चली जाती है। इसीलिए एकादशी से लेकर अमावस्या या पूनम तक व्रत करने से अजीर्ण की तकलीफ होगी तो ठीक हो जायगी। आप व्रत रखेंगे तो जठराग्नि तेज रहेगी, आपकी तंदुरूस्ती की रक्षा होगी। इसमें फिर भगवद्भाव और जागरण से आपके मन और प्राण ऊपर को उठेंगे, शायद आपकी आध्यात्मिक उन्नति सफल भी हो जाय।&lt;br /&gt;लोक-व्यवहार में आपने देखा होगा कि बूढ़ा आदमी अगर बीमार पड़ गया, उसकी स्थिति चिन्ताजनक है तो पुराने लोग कहेंगे कि आज कौन-सी तिथि है ? तेरश है। अगर पूनम गुजार दे तो काका बच जायेगा। अमावस्या गुजार दे तो बच जायेगा।&lt;br /&gt;प्रायः तुम देखोगे कि जिनकी जीवन-शक्ति क्षीण हो गयी है, जो बूढ़े हो गये हैं वे इन दिनों में रवाना होते हैं।&lt;br /&gt;दूसरी बातः एकादशी से पूनम तक के दिनों में तुम कोई दवाई चालू करो तो इतना प्रभाव जल्दी नहीं होता लेकिन तीज से लेकर अष्टमी, नवमी तक के दिनों में दवाई चालू करो तो दवाई का अच्छा प्रभाव पड़ता है।&lt;br /&gt;जो ज्यादा बीमार पड़ते है वे निरीक्षण करें तो पता चल सकता है कि प्रायः एकादशी से अमावस्या, पूनम, एकम, दूज के दिनों में ही ज्यादा दुर्बलता महसूस करते हैं। बाद में प्राणशक्ति बढ़ती है। प्रायः ऐसा होता है। कोई-कोई &amp;nbsp;लोग अपवाद भी हो सकते हैं।&lt;br /&gt;कहने का तात्पर्य यह है कि आपके शरीर के संचालन की डोरी प्राणशक्ति के हाथ में है। प्राणशक्ति का सीधा सम्बन्ध उस चिदघन चैतन्य से है।&lt;br /&gt;संसार का सार शरीर है। शरीर का सार इन्द्रियाँ हैं। इन्द्रियों का सार मन है। मन का सार प्राण है। प्राण निकल गये तो मन कहाँ रहेगा ? प्राण निकल गये तो आँखें होते हुए भी कुछ काम की नहीं। शरीर होते हुए भी किसी काम का नहीं।&lt;br /&gt;आप जो श्वास लेते हैं वह प्राण नहीं है। वह तो बहुत स्थूल है। यह तो हवा ले रहे है। श्वासोच्छ्वास से जीवन जीने की शक्ति पाते हैं।&lt;br /&gt;अगर आपकी श्वास-क्रिया में तालबद्धता हो जाय, तो आप जब चाहें, विकारों को बुला सकते हैं, जब चाहें, विकारों को भगा सकते हैं। चाहें तब मन को शांत कर सकते हैं, चाहें तब व्यवहार में लगा सकते हैं। आपके सामने प्रकृति रहस्य खोलने लग जायेगी, योग की कुंजियाँ हाथ लग जायेगी।&lt;br /&gt;इसी कारण से योगी अपने भक्तों की रक्षा कर लेते हैं, दूर-दूर स्थानों में स्थित भक्तों को सहाय पहुँचा सकते हैं।&lt;br /&gt;कोई पुरूष किसीका रोग दूर कर सकता है या चमत्कार करता है तो इसके पीछे भी प्राणशक्ति काम करती है। सामने कोई व्यक्ति आया, उसमें आदर भाव जगा, योगी ने उसके साथ बातचीत करते हुए अपनी प्राणशक्ति की किरण उसमें फेंकी और उसकी सुषुप्त प्राणशक्ति जगी, रोग-प्रतिकारक &amp;nbsp;शक्ति बढ़ी, कुछ दवा से कुछ दुआ से काम हो गया।&lt;br /&gt;प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, प्रसिद्ध या छुपे हुए, जगत में जो उन्नत पुरूष हैं उनके प्राण सूक्ष्म हैं इसलिए उन्नत हैं। फिर चाहे वे किसी भी धर्म के हों, किसी भी मजहब के हों, किसी भी सम्प्रदाय के हों। वे इस रहस्य को जानते हों या नहीं जानते हों, अनजाने में ही उनके प्राण सूक्ष्म हुए तभी वे उन्नत पुरूष माने गये।&lt;br /&gt;जिनके प्राण सूक्ष्म हैं उनकी वाणी हजारों लोगों को प्रभावित करने में सफल हो जाती है फिर चाहे नेता के मंच से बोलते हैं चाहे धर्म के मंच से बोलते हैं। व्यक्ति में जितनी सच्चाई होती है उतने प्राण रिधम से चलते हैं। बेईमान आदमी की धड़कनें बढ़ जाती हैं। आप झूठ बोलते हैं तो आपके प्राण का ताल टूट जाता है। आप सत्य पर होते हैं तो प्राण का ताल बराबर जोर करता है, आप विजेता हो जाते हैं। आप चाहे मान लें कि अम्बाजी ने कहा, फलाना देव ने प्रेरणा की, लेकिन वास्तव में इसके मूल में योग विज्ञान के रहस्य छुपे हैं।&lt;br /&gt;प्राणोपासना बड़ी रहस्यमय उपासना है।&lt;br /&gt;मनुष्य अगर भगवान को भजना चाहे तो वह उत्तम मनुष्य के रूप में ही भगवान की कल्पना कर सकता है। अगर कोई भैंसा भगवान को भजना चाहे तो अपने से कोई मोटे-ताजे भैंसे के रूप में ही भगवान की कल्पना कर सकता है। आप जिस देह में रहते हैं उसके अनुरूप ही आप भगवान को भज सकते हैं या देख सकते हैं। अगर दूसरा देखेंगे, सोचेंगे तो आपकी कोरी कल्पना ही होगी। बड़े-बड़े भाषण करने वाले जो बोल देते हैं कि, 'भगवान निर्गुण है, भगवान निराकार है, भगवान ऐसा है, भगवान वैसा है.....' उनके पास सूचनाओं के सिवाय, माथापच्ची के सिवाय और कुछ नहीं। जब-जब जिनको-जिनको भगवान मिला है उनको मनुष्यरूपी भगवान के द्वारा ही मिला है। भगवान ने कहा कि, 'आचार्य मैं हूँ।' भगवान जब भी प्रकट हुए तब मनुष्य के तन में ही प्रकट हुए। मनुष्य भगवान ने ही दूसरों को भगवान के दीदार करवाये हैं। फिर चाहे जगदगुरू शंकराचार्य का रूप लेकर भगवान प्रकट हुए चाहे वल्लभाचार्य का चाहे रमण महर्षि का चाहे श्रीकृष्ण का चाहे और कोई अवतार।&lt;br /&gt;जिन पुरूषों में भगवत्तत्त्व ज्यों का त्यों प्रकाशित हुआ है उन जीवित पुरूषों में जो लोग श्रद्धा-भक्ति रखते हैं वे लोग बहुत तेजी से आगे बढ़ते हैं। जिनका भगवान कुछ और कल्पा हुआ है, किसी देश में, किसी मंदिर में, किसी मस्जिद में, किसी और जगह पर, उनकी अपेक्षा वे लोग ज्यादा फायदे में हैं जिनको किसी जीवित ब्रह्मवेत्ता महापुरूष का सान्निध्य मिल गया।&lt;br /&gt;गोरखनाथ किसी जगह पर गये तो वहाँ लोग किसी देवी-देवता को मना रहे थे, नारियल फोड़ रहे थे। गोरखनाथ हँसे।&lt;br /&gt;एक भूला दूजा भूला भूला सब संसार।&lt;br /&gt;वण भूल्या इक गोरखा जिसको गुरू का आधार।।&lt;br /&gt;अखा भगत ने कहाः&lt;br /&gt;सजीवाए निर्जिवाने घड्यो पछी कहे मने कंई दे।&lt;br /&gt;अखो तमने इ पूछे के तमारी एक फूटी के बे ?&lt;br /&gt;सजीव मनुष्य निर्जीव मूर्ति को बनाता है, फिर उसे भगवान की जगह पर बैठाता है, प्राणप्रतिष्ठा करता है, पूजता है। फिर अपने बनाये हुए उस भगवान से ही माँगता है। अखाजी ऐसे मनुष्य की बेवकूफी देखकर कहते है कि अरे मानव ! तेरी दोनों आँखें फूट गई हैं क्या ? अर्थात् तू ज्ञानरूपी दृष्टि से क्यों वंचित हो गया है ?&lt;br /&gt;जब भी तुम मूर्ति के आगे प्रार्थना करते हो तब जाने-अनजाने में तुम्हारे प्राण की रिधम तालबद्ध होती है, तुम्हारे संकल्प-विकल्प की भीड़ कम होती है तब तुम्हारे इष्ट को, गुरू को तुम्हारी प्रार्थना पहुँचती है। फिर कभी उनका संकल्प, कभी तुम्हारी तीव्र प्रार्थना प्रकृति में व्यवस्था कर देती है।&lt;br /&gt;श्वास के द्वारा आप जो प्राण लेते हैं वे समष्टि से जुड़े हुए हैं।&lt;br /&gt;दिल्ली में आकाशवाणी केन्द्र में या दूरदर्शन केन्द्र में जो कुछ 'ब्रोडकास्ट' होता है वह आप यहाँ बैठे सुन लेते हैं, देख लेते हैं। यह सन्देश यंत्रों के द्वारा भेजा जाता है पकड़ा जाता है। यंत्र से भी मन का संकल्प अत्यंत तेजी से चलता है। अमेरिका जाने के लिए अत्यंत गतिवाले विमान में बैठो चाहे रोकेट में ही बैठ जाओ फिर भी कुछ घण्टे लग ही जायेंगे लेकिन मन से जाओ तो कितनी देर लगेगी ? सोचा कि बस, पहुँच गये। इसी संकल्प की गति से 'टेलिपैथी' का कार्य किया जाता है। इसी के जरिये दूर-दूर के स्थान में स्थित भक्त को या मित्र को सहयोग दिया जा सकता है, अगर प्राण पर नियंत्रण कर लिया है तो।&lt;br /&gt;स्वर्ग के पितरों को तृप्त करना है तब भी तुम्हारी प्राणशक्ति काम करती है और यहाँ के मित्रों को तृप्त करना है तब भी तुम्हारी प्राणशक्ति काम करती है। अपने आपको तृप्त करना है तब भी प्राणशक्ति काम करती है।&lt;br /&gt;यही कारण है कि जिनकी प्राणशक्ति उन्नत है वे पुरूष मुर्दे को जिन्दा कर सकते हैं और जिन्दों को आज्ञा में चला सकते हैं। ऐसे जीवित महापुरूष कण्ठी देने वाले गुरूओं से बहुत-बहुत उन्नत हैं। जो धर्म का रास्ता दिखाते हैं, नीति-नियम बताते हैं वे गुरू धन्यवाद के पात्र हैं लेकिन वे महापुरूष पूजनीय हैं जो अपने संकल्पमात्र से दूसरों के हृदय में प्राण संचारित कर दें, दूसरों के मन के भाव को बदलकर ईश्वर में लगा दें। जो संकल्प मात्र से, दृष्टि मात्र से असाधु को साधु बना दें, दुराचारी को सदाचारी बना दें, अभक्त को भक्त बना दें वे तो साक्षात् ईश्वर-स्वरूप हैं, ईश्वर ही हैं। प्राण का संचालक तत्त्व ईश्वर है और ईश्वर में जो टिके हैं वे ईश्वररूप हो गये हैं।&lt;br /&gt;ऐसे जो नर भगवान हैं उनके संपर्क में आने वाला साधक जल्दी नारायणमय हो सकता है। वशिष्ठ जी महाराज नर भगवान हैं इसीलिए नरलीला करते हुए रामजी भी उनके चरणों में आ बैठे। श्रीकृष्ण ७० से ८३ साल की उम्र तक एकान्तवास में अज्ञातवास में रहे। घोर आंगिरस ऋषि के पास उपनिषदों का अध्ययन किया था। तत्त्वज्ञान में परिनिष्ठित हुए। वही उपनिषद का ज्ञान महाभारत के युद्ध में अर्जुन को दिया। श्रीकृष्ण के पास प्राणशक्ति थी। सुदर्शन चक्र था। संकल्प सामर्थ्य से अदभुत कार्य कर लिया करते थे।&lt;br /&gt;अभी भी तुम्हारे हवाई जहाज आदि जो चलते हैं उसमें क्या है ? वायु ही तो उसमें काम करता है, और क्या काम करता है ?&lt;br /&gt;बच्चे को माँ कहने लगीः "देख बेटा ! मैं पड़ोस में जा रही हूँ। यह दीया जल रहा है। हवा आ रही है। कुछ भी करके दीये को बुझने नहीं देना।"&lt;br /&gt;बच्चे ने देखा कि हवा आ रही है, अब क्या करूँ ? उसने छोटे-से दीये के ऊपर काँच की बरणी ढँक दी। दीया तूफान से तो बचा लेकिन ताजी हवा नहीं मिली तो बुझने से नहीं बचा। ऑक्सीजन नहीं मिला तो दीया बुझ गया।&lt;br /&gt;प्राणशक्ति दीपक का भी आधार है, अग्नि का भी आधार है, पुष्पों और पत्तों का भी आधार है, वृक्षों और जड़ों का भी आधार है, पक्षियों का भी आधार है और पशुओं का भी आधार है, ग्रह और नक्षत्रों का भी आधार है। मेघ की वृष्टि का भी आधार वही प्राणशक्ति है।&lt;br /&gt;जिसने अपने नजदीक के प्राण पर नियंत्रण पा लिया वह समष्टि के प्राण में उथल-पुथल कर सकता है। इसी कारण बरसात लाना, रोक देना, ट्रेन रोक देना आदि जो चमत्कार योगियों के जीवन में सुने जाते हैं वे कल्पित कहानियाँ नहीं हैं। किसी के पीछे ऐसे ही बातें जुड़ गयी हों तो वह बात अलग है लेकिन ये नितान्त झूठी नहीं हैं। उन्नत योग-अभ्यासियों के लिए तो ऐसे कार्य कर लेना खेल मात्र है। आप भी प्राणोपासना करो तो जान सकते हो।&lt;br /&gt;हाँ, मैं यह राय नहीं दूँगा कि आप ये शक्तियाँ ही प्राप्त करो। मैं तो यह कहूँगा कि सारी शक्तियाँ जिस परमात्मा से स्पंदित होकर लीन हो जाती हैं उस आत्मा-परमात्मा में विश्रांति पाने की कला पा लो और यही वशिष्ठजी बता रहे हैं कि एक क्षण में मन मीलों दूर जाकर वापस आ जाता है तो जहाँ से गया और आया उस चिदघन चैतन्य में विश्रांति पाओ।&lt;br /&gt;यह सूक्ष्म है इसलिए कठिन लग रहा है लेकिन पराया नहीं है, असंभव नहीं है, कालांतर में मिले ऐसा नहीं है। इसके लिए सदाचार चाहिए, गुरूआज्ञा शिरोधार्य करने की तत्परता चाहिए। अन्यथा थोड़ी शक्ति आते ही आदमी उलझ जायगा।&lt;br /&gt;मैं तो आप लोगों के संकल्पों की बड़ी शक्ति महसूस करता हूँ। कई बार मुझे कुटिया से बाहर आने का कोई विचार नहीं होता, संकल्प नहीं होता। कुछ लोग ऐसे आ जाते हैं कि जिनका हृदय, श्रद्धा-भक्ति से भरा है। मुझे एकदम होता है, मैं बाहर जाऊँ। बाहर आकर उन लोगों को मुलाकात देनी पड़ती है।&lt;br /&gt;कभी-कभी आप लोगों के मन में कुछ प्रश्न होते हैं, मुझे पता ही नहीं होता और उसका उत्तर अपने आप आ जाता है। ऐसा भी आप लोगों को अनुभव होगा।&lt;br /&gt;मानना पड़ेगा कि हम सबके शरीर अलग दिखते हैं, सब शरीरों में अलग-अलग मन दिखते हैं लेकिन संचालक बल एक है। सब मनों का उदगम स्थान एक ही वह चिदाकाश है। लाखों घड़ों के घटाकाश का आधार महाकाश है, लाखों तरंगों के जल का आधार सागर है ऐसे ही लाखों मन के स्पन्दनों का आधार निस्पन्द चैतन्य है। जितने अंश में आप उस चैतन्य में अनजाने में ही टिक जाते हैं उतने ही आपके संकल्प फलित हो जाते हैं। इसलिए साधन में तत्परता चाहिए। मन को, प्राण को सूक्ष्म करने में तत्परता चाहिए। सदाचार चाहिए। झूठ, कपट और दुराचार से प्राण क्षीण हो जाते हैं, कमजोर हो जाते हैं। आदमी और कोई साधना न करे, बारह साल केवल सत्य ही बोले तो फिर वह जो बोलेगा वह होने लगेगा। क्योंकि उसके प्राण में कोई विक्षेप नहीं हुआ।&lt;br /&gt;छः महीना अगर कोई प्राणोपासना ठीक से करे तो उसके प्राण तालबद्ध होने लगेंगे। प्राण तालबद्ध हुए कि उसके पास योग की कुंजियाँ अपने-आप प्रकट होने लगेंगी। उसके आगे प्रकृति रहस्य खोलने लगेगी। भवितव्य का पता चलने लगेगा। दूसरों के मन को पढ़ सकने की योग्यता आने लगेगी। दूसरों के मन को वह मोड़ सकता है। बहुत कुछ होता है, अगर प्राण सूक्ष्म हो जायें तो। मैं छः महीना इसलिए कहता हूँ कि तत्परतावाला भी तब तक सफल हो सकता है, बाकी तीव्र तत्परतावाला दो महीने में भी काम बना सकता है।&lt;br /&gt;जीवन जीने का मजा तो बाद में आयेगा। अभी तो तुमने सुख देखा ही नहीं। बहुत कुछ 'टेन्शन' देखे हैं और थोड़ा सा हर्ष देखा है, असली मजा तो देखा ही नहीं। प्राण जब तालबद्ध होंगे उस दिन आपको जो सुख महसूस होगा और आपका जो व्यवहार होगा तब आपको लगेगा कि जीवन अभी शुरू हो रहा है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-1453568057414100401?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/1453568057414100401/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/08/blog-post_16.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/1453568057414100401'/><link 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type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-tiuC2zNvU38/Tjg4hKJcLGI/AAAAAAAAAkA/V9xfwiacsCE/s1600/280284_133027196782053_100002243197207_232603_6510829_o.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="400" src="http://2.bp.blogspot.com/-tiuC2zNvU38/Tjg4hKJcLGI/AAAAAAAAAkA/V9xfwiacsCE/s400/280284_133027196782053_100002243197207_232603_6510829_o.jpg" width="268" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #a64d79; font-size: large;"&gt;महापुरुषों के प्रेरक प्रसंग&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Courier, monospace; font-size: 14px;"&gt;पुस्तक से&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #674ea7;"&gt;प्राणिमात्र की आशाओं के राम&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीरामचरित मानस में आता हैः&lt;br /&gt;संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।।&lt;br /&gt;निज परिताप द्रवड़ नवनीता। पर दुःख द्रवहिं संत सुपुनीता।।&lt;br /&gt;'संतों का हृदय मक्खन के समान होता है, ऐसा कवियों ने कहा है। परंतु उन्होंने असली बात कहना नहीं जाना क्योंकि मक्खन तो अपने को ताप मिलने से पिघलता है जबकि परम पवित्र संत दूसरों के दुःख से पिघल जाते हैं।" (उत्तर कां. 124.4)&lt;br /&gt;संतों का हृदय बड़ा दयालु होता है। जाने अनजाने कोई भी जीव उनके सम्पर्क में आ जाता है तो उसका कल्याण हुए बिना नहीं रहता। एक उपनिषद में उल्लेख आता हैः&lt;br /&gt;यद् यद् स्पृश्यति पाणिभ्यां यद् यद् पश्यति चक्षुषा।&lt;br /&gt;स्थावरणापि मुच्यन्ते किं पुनः प्राकृताः जनाः।।&lt;br /&gt;'ब्रह्मज्ञानी महापुरुष ब्रह्मभाव से स्वयं के हाथों द्वारा जिनको स्पर्श करते हैं, आँखों द्वारा जिनको देखते हैं वे जड़ पदार्थ भी कालांतर में जीवत्व पाकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं तो फिर उनकी दृष्टि में आये हुए व्यक्तियों के देर-सवेर होने वाले मोक्ष के बारे में शंका ही कैसी !'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आसारामजी बापू का पावन जीवन तो ऐसी अनेक घटनाओं से परिपूर्ण है, जिनमें उनकी करूणा-उदारता एवं परदुःखकातरता सहज में ही परिलक्षित होती है। आज से 30 वर्ष पहले की बात हैः&lt;br /&gt;एक बार पूज्य श्री डीसा में बनास नदी के किनारे संध्या के समय ध्यान-भजन के लिए बैठे हुए थे। नदी में घुटने तक पानी बह रहा था। उसी समय जख्मी पैरवाला एक व्यक्ति नदी किनारे चिंतित-सा दिखायी दिया। वह नदी पार अपने गाँव जाना चाहता था। घुटने भर पानी वाली नदी, पैर में भारी जख्म, नदी पार कैसे करे ! इसी चिंता में डूबा सा दिखा। पूज्य श्री उसकी चिंता का कारण समझ गये और उसे अपने कंधे पर बैठाकर नदी पार करा दी। घाव से पीड़ित पैरवाला वह गरीब मजदूर दंग रह गया। साँईं की सहज करूणा-कृपा व दयाभरे व्यवहार से प्रभावित होकर डामर रोड बनाने वाले उस मजदूर ने अपना दुखड़ा सुनाते हुए पूज्य बापू जी से कहाः&lt;br /&gt;"पैर पर जख्म होने से ठेकेदार ने काम पर आने से मना कर दिया है। कल से मजदूरी नहीं मिलेगी।"&lt;br /&gt;पूज्य बापू जी ने कहाः "मजदूरी न करना, मुकादमी करना। जा मुकादमी हो जा।"&lt;br /&gt;दूसरे दिन ठेकेदार के पास जाते ही उस मजदूर को उसने ज्यादा तनख्वाहवाली, हाजिरी भरने की आरामदायक मुकादमी की नौकरी दी। किसकी प्रेरणा से दी, किसके संकल्प से दी यह मजदूर से छिपा न रह सका। कंधे पर बैठाकर नदी पार कराने वाले ने रोजी-रोटी की चिंता से भी पार कर दिया तो मालगढ़ का वह मजदूर प्रभु का भक्त बन गया और गदगद कंठ से डीसावासियों को अपना अनुभव सुनाने लगा।&lt;br /&gt;ऐसे अनगणित प्रसंग हैं जब बापू जी ने निरोह, निःसहाय, जीवों को अथवा सभी ओर से हारे हुए, दुःखी, पीड़ित व्यक्तियों को कष्टों से उबारकर उनमें आनन्द, उत्साह भरा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हारे रुपये पैसे, फूल-फल की मुझे आवश्यकता नहीं, लेकिन तुम्हारा और तुम्हारे द्वारा किसी का कल्याण होता है तो बस, मुझे दक्षिणा मिल जाती है, मेरा स्वागत हो जाता है। मैं रोने वालों का रूदन भक्ति में बदलने के लिए, निराशों के जीवन में आशा के दीप जगाने के लिए, लीलाशाहजी की लीला का प्रसाद बाँटने के लिए आया हूँ और बाँटते-बाँटते कइयों को भगवदरस में छका हुआ देखने को आया हूँ। प्रभु प्रेम के गीत गुँजाकर आप भी तृप्त रहेंगे, औरों को भी तृप्ति के आचमन दिया करेंगे, ऐसा आज से आप व्रत ले लें, यही आसाराम की आशा है। ॐ गुरु...... ॐ गुरु..... ॐ गुरु.....ॐ....&lt;br /&gt;चिंतन करो कि 'ऐसे दिन कब आयेंगे कि मैं अपने राम-स्वभाव में जगूँगा, सुख-दुःख में सम रहूँगा...? मेरे ऐसे दिन कब आयेंगे कि मुझे संसार स्वप्न जैसा लगेगा...? ऐसे दिन कब आयेंगे कि मैं अपनी देह में रहते हुए भी विदेही आत्मा में जगूँगा....?' ऐसा चिंतन करने से निम्न इच्छाएँ शांत होती जायेंगी और बाद में उन्नत इच्छाएँ भी शांत हो जायेंगी। फिर तुम इच्छाओं के दास नहीं, आशाओं के दास नहीं, आशाओं के राम हो जाओगे।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-7636294680706421929?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/7636294680706421929/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/08/blog-post.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/7636294680706421929'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/7636294680706421929'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://3.bp.blogspot.com/-SYU1kli6gA4/TXJ-0PC2mJI/AAAAAAAAAY4/MN_oJ9Hu2-4/s220/IMG0345A.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-tiuC2zNvU38/Tjg4hKJcLGI/AAAAAAAAAkA/V9xfwiacsCE/s72-c/280284_133027196782053_100002243197207_232603_6510829_o.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5113688638599628772.post-496917147335907582</id><published>2011-07-20T23:39:00.002+05:30</published><updated>2011-07-20T23:45:16.109+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/-EpOP5rVAP2I/TicYepMAi8I/AAAAAAAAAjo/xR969ni2OdM/s1600/266736_133027950115311_100002243197207_232624_791217_o.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://2.bp.blogspot.com/-EpOP5rVAP2I/TicYepMAi8I/AAAAAAAAAjo/xR969ni2OdM/s320/266736_133027950115311_100002243197207_232624_791217_o.jpg" width="246" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: 'Times New Roman', serif;"&gt;&lt;span lang="HI" style="color: #002060; font-family: Mangal, serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;आरोग्यनिधि – 2 &amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Courier, monospace;"&gt;पुस्तक से&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;h2 style="font-family: Cambria, serif; margin-bottom: 3pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 12pt; page-break-after: avoid; text-align: left;"&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/post-edit.g?blogID=5113688638599628772&amp;amp;postID=496917147335907582" name="भोजनविधि"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif; font-weight: normal;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: purple; font-size: large;"&gt;भोजन विधि&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;i style="font-size: 14pt; font-weight: bold;"&gt;&lt;/i&gt;&lt;span style="color: #002060; font-size: 14pt; font-style: italic; font-weight: bold;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/h2&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अधिकांश लोग भोजन की सही विधि नहीं जानते। गलत विधि से गलत मात्रा में अर्थात् आवश्यकता से अधिक या बहुत कम भोजन करने से या अहितकर भोजन करने से जठराग्नि मंद पड़ जाती है, जिससे कब्ज रहने लगता है। तब आँतों में रूका हुआ मल सड़कर दूषित रस बनाने लगता है। यह दूषित रस ही सारे शरीर में फैलकर विविध प्रकार के रोग उत्पन्न करता है। उपनिषदों में भी कहा गया हैः&amp;nbsp;&lt;b&gt;आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः।&amp;nbsp;&lt;/b&gt;शुद्ध आहार से मन शुद्ध रहता है। साधारणतः सभी व्यक्तियों के लिए आहार के कुछ नियमों को जानना अत्यंत आवश्यक है। जैसे-&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;आलस तथा बेचैनी न रहें, मल, मूत्र तथा वायु का निकास य़ोग्य ढंग से होता रहे, शरीर में उत्साह उत्पन्न हो एवं हलकापन महसूस हो, भोजन के प्रति रूचि हो तब समझना चाहिए की भोजन पच गया है। बिना भूख के खाना रोगों को आमंत्रित करता है। कोई कितना भी आग्रह करे या आतिथ्यवश खिलाना चाहे पर आप सावधान रहें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;सही भूख को पहचानने वाले मानव बहुत कम हैं। इससे भूख न लगी हो फिर भी भोजन करने से रोगों की संख्या बढ़ती जाती है। एक बार किया हुआ भोजन जब तक पूरी तरह पच न जाय एवं खुलकर भूख न लगे तब तक दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए। अतः एक बार आहार ग्रहण करने के बाद दूसरी बार आहार ग्रहण करने के बीच कम-से-कम छः घंटों का अंतर अवश्य रखना चाहिए क्योंकि इस छः घंटों की अवधि में आहार की पाचन-क्रिया सम्पन्न होती है। यदि दूसरा आहार इसी बीच ग्रहण करें तो पूर्वकृत आहार का कच्चा रस(आम) इसके साथ मिलकर दोष उत्पन्न कर देगा। दोनों समय के भोजनों के बीच में बार-बार चाय पीने, नाश्ता, तामस पदार्थों का सेवन आदि करने से पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है, ऐसा व्यवहार में मालूम पड़ता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;रात्रि में आहार के पाचन के समय अधिक लगता है इसीलिए रात्रि के समय प्रथम पहर में ही भोजन कर लेना चाहिए। शीत ऋतु में रातें लम्बी होने के कारण सुबह जल्दी भोजन कर लेना चाहिए और गर्मियों में दिन लम्बे होने के कारण सायंकाल का भोजन जल्दी कर लेना उचित है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अपनी प्रकृति के अनुसार उचित मात्रा में भोजन करना चाहिए। आहार की मात्रा व्यक्ति की पाचकाग्नि और शारीरिक बल के अनुसार निर्धारित होती है। स्वभाव से हलके पदार्थ जैसे कि चचावल, मूँग, दूध अधिक मात्रा में ग्रहण करने सम्भव हैं परन्तु उड़द, चना तथा पिट्ठी से बने पदार्थ स्वभावतः भारी होते हैं, जिन्हें कम मात्रा में लेना ही उपयुक्त रहता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भोजन के पहले अदरक और सेंधा नमक का सेवन सदा हितकारी होता है। यह जठराग्नि को प्रदीप्त करता है, भोजन के प्रति रूचि पैदा करता है तथा जीभ एवं कण्ठ की शुद्धि भी करता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भोजन गरम और स्निग्ध होना चाहिए। गरम भोजन स्वादिष्ट लगता है, पाचकाग्नि को तेज करता है और शीघ्र पच जाता है। ऐसा भोजन अतिरिक्त वायु और कफ को निकाल देता है। ठंडा या सूखा भोजन देर से पचता है। अत्यंत गरम अन्न बल का ह्रास करता है। स्निग्ध भोजन शरीर को मजबूत बनाता है, उसका बल बढ़ाता है और वर्ण में भी निखार लाता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;चलते हुए, बोलते हुए अथवा हँसते हुए भोजन नहीं करना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;दूध के झाग बहुत लाभदायक होते हैं। इसलिए दूध खूब उलट-पुलटकर, बिलोकर, झाग पैदा करके ही पियें। झागों का स्वाद लेकर चूसें। दूध में जितने ज्यादा झाग होंगे, उतना ही वह लाभदायक होगा।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;चाय या कॉफी प्रातः खाली पेट कभी न पियें, दुश्मन को भी न पिलायें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;एक सप्ताह से अधिक पुराने आटे का उपयोग स्वास्थ्य के लिए लाभदायक नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भोजन कम से कम 20-25 मिनट तक खूब चबा-चबाकर एवं उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके करें। अच्छी तरह चबाये बिना जल्दी-जल्दी भोजन करने वाले चिड़चिड़े व क्रोधी स्वभाव के हो जाते हैं। भोजन अत्यन्त धीमी गति से भी नहीं करना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भोजन सात्त्विक हो और पकने के बाद 3-4 घंटे के अंदर ही कर लेना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;स्वादिष्ट अन्न मन को प्रसन्न करता है, बल व उत्साह बढ़ाता है तथा आयुष्य की वृद्धि करता है, जबकि स्वादहीन अन्न इसके विपरीत असर करता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;सुबह-सुबह भरपेट भोजन न करके हलका-फुलका नाश्ता ही करें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भोजन करते समय भोजन पर माता, पिता, मित्र, वैद्य, रसोइये, हंस, मोर, सारस या चकोर पक्षी की दृष्टि पड़ना उत्तम माना जाता है। किंतु भूखे, पापी, पाखंडी या रोगी मनुष्य, मुर्गे और कुत्ते की नज़र पड़ना अच्छा नहीं माना जाता।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भोजन करते समय चित्त को एकाग्र रखकर सबसे पहले मधुर, बीच में खट्टे और नमकीन तथा अंत में तीखे, कड़वे और कसैले पदार्थ खाने चाहिए। अनार आदि फल तथा गन्ना भी पहले लेना चाहिए। भोजन के बाद आटे के भारी पदार्थ, नये चावल या चिवड़ा नहीं खाना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;पहले घी के साथ कठिन पदार्थ, फिर कोमल व्यंजन और अंत में प्रवाही पदार्थ खाने चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;माप से अधिक खाने से पेट फूलता है और पेट में से आवाज आती है। आलस आता है, शरीर भारी होता है। माप से कम अन्न खाने से शरीर दुबला होता है और शक्ति का क्षय होता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;बिना समय के भोजन करने से शक्ति का क्षय होता है, शरीर अशक्त बनता है। सिरदर्द और अजीर्ण के भिन्न-भिन्न रोग होते हैं। समय बीत जाने पर भोजन करने से वायु से अग्नि कमजोर हो जाती है। जिससे खाया हुआ अन्न शायद ही पचता है और दुबारा भोजन करने की इच्छा नहीं होती।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;जितनी भूख हो उससे आधा भाग अन्न से, पाव भाग जल से भरना चाहिए और पाव भाग वायु के आने जाने के लिए खाली रखना चाहिए। भोजन से पूर्व पानी पीने से पाचनशक्ति कमजोर होती है, शरीर दुर्बल होता है। भोजन के बाद तुरंत पानी पीने से आलस्य बढ़ता है और भोजन नहीं पचता। बीच में थोड़ा-थोड़ा पानी पीना हितकर है। भोजन के बाद छाछ पीना आरोग्यदायी है। इससे मनुष्य कभी बलहीन और रोगी नहीं होता।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;प्यासे व्यक्ति को भोजन नहीं करना चाहिए। प्यासा व्यक्ति अगर भोजन करता है तो उसे आँतों के भिन्न-भिन्न रोग होते हैं। भूखे व्यक्ति को पानी नहीं पीना चाहिए। अन्नसेवन से ही भूख को शांत करना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भोजन के बाद गीले हाथों से आँखों का स्पर्श करना चाहिए। हथेली में पानी भरकर बारी-बारी से दोनों आँखों को उसमें डुबोने से आँखों की शक्ति बढ़ती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भोजन के बाद पेशाब करने से आयुष्य की वृद्धि होती है। खाया हुआ पचाने के लिए भोजन के बाद पद्धतिपूर्वक वज्रासन करना तथा 10-15 मिनट बायीं करवट लेटना चाहिए(सोयें नहीं), क्योंकि जीवों की नाभि के ऊपर बायीं ओर अग्नितत्त्व रहता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भोजन के बाद बैठे रहने वाले के शरीर में आलस्य भर जाता है। बायीं करवट लेकर लेटने से शरीर पुष्ट होता है। सौ कदम चलने वाले की उम्र बढ़ती है तथा दौड़ने वाले की मृत्यु उसके पीछे ही दौड़ती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;रात्रि को भोजन के तुरंत बाद शयन न करें, 2 घंटे के बाद ही शयन करें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;किसी भी प्रकार के रोग में मौन रहना लाभदायक है। इससे स्वास्थ्य के सुधार में मदद मिलती है। औषधि सेवन के साथ मौन का अवलम्बन हितकारी है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: purple; font-size: large;"&gt;कुछ उपयोगी बातें-&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #002060; font-size: 12pt; font-weight: bold;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;घी, दूध, मूँग, गेहूँ, लाल साठी चावल, आँवले, हरड़े, शुद्ध शहद, अनार, अंगूर, परवल – ये सभी के लिए हितकर हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अजीर्ण एवं बुखार में उपवास हितकर है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;दही, पनीर, खटाई, अचार, कटहल, कुन्द, मावे की मिठाइयाँ – से सभी के लिए हानिकारक हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अजीर्ण में भोजन एवं नये बुखार में दूध विषतुल्य है। उत्तर भारत में अदरक के साथ गुड़ खाना अच्छा है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;मालवा प्रदेश में सूरन(जमिकंद) को उबालकर काली मिर्च के साथ खाना लाभदायक है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अत्यंत सूखे प्रदेश जैसे की कच्छ, सौराष्ट्र आदि में भोजन के बाद पतली छाछ पीना हितकर है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;मुंबई, गुजरात में अदरक, नींबू एवं सेंधा नमक का सेवन हितकर है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;दक्षिण गुजरात वाले पुनर्नवा(विषखपरा) की सब्जी का सेवन करें अथवा उसका रस पियें तो अच्छा है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;दही की लस्सी पूर्णतया हानिकारक है। दहीं एवं मावे की मिठाई खाने की आदतवाले पुनर्नवा का सेवन करें एवं नमक की जगह सेंधा नमक का उपयोग करें तो लाभप्रद हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;शराब पीने की आदवाले अंगूर एवं अनार खायें तो हितकर है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;आँव होने पर सोंठ का सेवन, लंघन (उपवास) अथवा पतली खिचड़ी और पतली छाछ का सेवन लाभप्रद है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अत्यंत पतले दस्त में सोंठ एवं अनार का रस लाभदायक है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;आँख के रोगी के लिए घी, दूध, मूँग एवं अंगूर का आहार लाभकारी है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;व्यायाम तथा अति परिश्रम करने वाले के लिए घी और इलायची के साथ केला खाना अच्छा है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;सूजन के रोगी के लिए नमक, खटाई, दही, फल, गरिष्ठ आहार, मिठाई अहितकर है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;यकृत (लीवर) के रोगी के लिए दूध अमृत के समान है एवं नमक, खटाई, दही एवं गरिष्ठ आहार विष के समान हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;वात के रोगी के लिए गरम जल, अदरक का रस, लहसुन का सेवन हितकर है। लेकिन आलू, मूँग के सिवाय की दालें एवं वरिष्ठ आहार विषवत् हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;कफ के रोगी के लिए सोंठ एवं गुड़ हितकर हैं परंतु दही, फल, मिठाई विषवत् हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;पित्त के रोगी के लिए दूध, घी, मिश्री हितकर हैं परंतु मिर्च-मसालेवाले तथा तले हुए पदार्थ एवं खटाई विषवत् हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अन्न, जल और हवा से हमारा शरीर जीवनशक्ति बनाता है। स्वादिष्ट अन्न व स्वादिष्ट व्यंजनों की अपेक्षा साधारण भोजन स्वास्थ्यप्रद होता है। खूब चबा-चबाकर खाने से यह अधिक पुष्टि देता है, व्यक्ति निरोगी व दीर्घजीवी होता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि प्राकृतिक पानी में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के सिवाय जीवनशक्ति भी है। एक प्रयोग के अनुसार हाइड्रोजन व ऑक्सीजन से कृत्रिम पानी बनाया गया जिसमें खास स्वाद न था तथा मछली व जलीय प्राणी उसमें जीवित न रह सके।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;बोतलों में रखे हुए पानी की जीवनशक्ति क्षीण हो जाती है। अगर उसे उपयोग में लाना हो तो 8-10 बार एक बर्तन से दूसरे बर्तन में उड़ेलना (फेटना) चाहिए। इससे उसमें स्वाद और जीवनशक्ति दोनों आ जाते हैं। बोतलों में या फ्रिज में रखा हुआ पानी स्वास्थ्य का शत्रु है। पानी जल्दी-जल्दी नहीं पीना चाहिए। चुसकी लेते हुए एक-एक घूँट करके पीना चाहिए जिससे पोषक तत्त्व मिलें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;वायु में भी जीवनशक्ति है। रोज सुबह-शाम खाली पेट, शुद्ध हवा में खड़े होकर या बैठकर लम्बे श्वास लेने चाहिए। श्वास को करीब आधा मिनट रोकें, फिर धीरे-धीरे छोड़ें। कुछ देर बाहर रोकें, फिर लें। इस प्रकार तीन प्राणायाम से शुरुआत करके धीरे-धीरे पंद्रह तक पहुँचे। इससे जीवनशक्ति बढ़ेगी, स्वास्थ्य-लाभ होगा, प्रसन्नता बढ़ेगी।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;पूज्य बापू जी सार बात बताते हैं, विस्तार नहीं करते। 93 वर्ष तक स्वस्थ जीवन जीने वाले स्वयं उनके गुरुदेव तथा ऋषि-मुनियों के अनुभवसिद्ध ये प्रयोग अवश्य करने चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: purple; font-size: large;"&gt;स्वास्थ्य और शुद्धिः&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #002060; font-size: 12pt; font-weight: bold;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;उदय, अस्त, ग्रहण और मध्याह्न के समय सूर्य की ओर कभी न देखें, जल में भी उसकी परछाई न देखें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;दृष्टि की शुद्धि के लिए सूर्य का दर्शन करें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;उदय और अस्त होते चन्द्र की ओर न देखें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;संध्या के समय जप, ध्यान, प्राणायाम के सिवाय कुछ भी न करें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;साधारण शुद्धि के लिए जल से तीन आचमन करें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अपवित्र अवस्था में और जूठे मुँह स्वाध्याय, जप न करें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;सूर्य, चन्द्र की ओर मुख करके कुल्ला, पेशाब आदि न करें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;मनुष्य जब तक मल-मूत्र के वेगों को रोक कर रखता है तब तक अशुद्ध रहता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;सिर पर तेल लगाने के बाद हाथ धो लें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;रजस्वला स्त्री के सामने न देखें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;ध्यानयोगी ठंडे जल से स्नान न करे।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center" class="MsoNormal" style="font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: left; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;a href="http://www.blogger.com/post-edit.g?blogID=5113688638599628772&amp;amp;postID=496917147335907582" name="भोजनपात्र"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: purple; font-size: large;"&gt;भोजन-पात्र&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/a&gt;&lt;b style="font-size: 12pt;"&gt;&lt;span style="color: #002060;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भोजन को शुद्ध, पौष्टिक, हितकर व सात्त्विक बनाने के लिए हम जितना ध्यान देते हैं उतना ही ध्यान हमें भोजन बनाने के बर्तनों पर देना भी आवश्यक है। भोजन जिन बर्तनों में पकाया जाता है उन बर्तनों के गुण अथवा दोष भी उसमें समाविष्ट हो जाते हैं। अतः भोजन किस प्रकार के बर्तनों में बनाना चाहिए अथवा किस प्रकार के बर्तनों में भोजन करना चाहिए, इसके लिए भी शास्त्रों ने निर्देश दिये हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भोजन करने का पात्र सुवर्ण का हो तो आयुष्य को टिकाये रखता है, आँखों का तेज बढ़ता है। चाँदी के बर्तन में भोजन करने से आँखों की शक्ति बढ़ती है, पित्त, वायु तथा कफ नियंत्रित रहते हैं। काँसे के बर्तन में भोजन करने से बुद्धि बढ़ती है, रक्त शुद्ध होता है। पत्थर या मिट्टी के बर्तनों में भोजन करने से लक्ष्मी का क्षय होता है। लकड़ी के बर्तन में भोजन करने से भोजन के प्रति रूचि बढ़ती है तथा कफ का नाश होता है। पत्तों से बनी पत्तल में किया हुआ भोजन, भोजन में रूचि उत्पन्न करता है, जठराग्नि को प्रज्जवलित करता है, जहर तथा पाप का नाश करता है। पानी पीने के लिए ताम्र पात्र उत्तम है। यह उपलब्ध न हों तो मिट्टी का पात्र भी हितकारी है। पेय पदार्थ चाँदी के बर्तन में लेना हितकारी है लेकिन लस्सी आदि खट्टे पदार्थ न लें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;लोहे के बर्तन में भोजन पकाने से शरीर में सूजन तथा पीलापन नहीं रहता, शक्ति बढ़ती है और पीलिया के रोग में फायदा होता है। लोहे की कढ़ाई में सब्जी बनाना तथा लोहे के तवे पर रोटी सेंकना हितकारी है परंतु लोहे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए इससे बुद्धि का नाश होता है। स्टेनलेस स्टील के बर्तन में बुद्धिनाश का दोष नहीं माना जाता है। सुवर्ण, काँसा, कलई किया हुआ पीतल का बर्तन हितकारी है। एल्यूमीनियम के बर्तनों का उपयोग कदापि&amp;nbsp;&amp;nbsp;न करें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;केला, पलाश, तथा बड़ के पत्र रूचि उद्दीपक, विषदोषनाशक तथा अग्निप्रदीपक होते हैं। अतः इनका उपयोग भी हितावह है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;पानी पीने के पात्र के विषय में&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;भावप्रकाश ग्रंथ&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI"&gt;'&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;में लिखा है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center" class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: center; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम्।&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center" class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: center; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्।&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center" class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: center; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;काचेन रचितं तद्वत् वैङूर्यसम्भवम्।&lt;/span&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="right" class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: right; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;(भावप्रकाश, पूर्वखंडः4)&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #002060;"&gt;&lt;o:p&gt;&lt;/o:p&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अर्थात् पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। सम्भव हो तो वैङूर्यरत्नजड़ित पात्र का उपयोग करें। इनके अभाव में मिट्टी के जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="center" class="MsoNormal" style="font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-align: center;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="color: purple; font-family: Mangal, serif; font-size: large;"&gt;तिथि अनुसार आहार-विहार एवं आचार संहिता&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;प्रतिपदा को कूष्मांड (कुम्हड़ा, पेठा) न खायें, क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;द्विताया को बृहती (छोटा बैंगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;तृतिया को परवल खाने से शत्रुओं की वृद्धि होती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;चतुर्थी को मूली खाने से धन का नाश होता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;पंचमी को बेल खाने से कलंक लगता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;षष्ठी को नीम की पत्ती, फल या दातुन मुँह में डालने से नीच योनियों की प्राप्ति होती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;सप्तमी को ताड़ का फल खाने से रोग होते हैं तथा शरीर का नाश होता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;नवमी को लौकी गोमांस के समान त्याज्य है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;एकादशी को शिम्बी(सेम) खाने से, द्वादशी को पूतिका(पोई) खाने से अथवा त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति, चतुर्दशी और अष्टमी तिथि, रविवार, श्राद्ध और व्रत के दिन स्त्री-सहवास तथा तिल का तेल, लाल रंग का साग व काँसे के पात्र में भोजन करना निषिद्ध है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;रविवार के दिन अदरक भी नहीं खाना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;कार्तिक मास में बैंगन और माघ मास में मूली का त्याग कर देना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;सूर्यास्त के बाद कोई भी तिलयुक्त पदार्थ नहीं खाना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;लक्ष्मी की इच्छा रखने वाले को रात में दही और सत्तू नहीं खाना चाहिए। यह नरक की प्राप्ति कराने वाला है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;बायें हाथ से लाया गया अथवा परोसा गया अन्न, बासी भात, शराब मिला हुआ, जूठा और घरवालों को न देकर अपने लिए बचाया हुआ अन्न खाने योग्य नहीं है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;जो लड़ाई-झगड़ा करते हुए तैयार किया गया हो, जिसको किसी ने लाँघ दिया हो, जिस पर रजस्वला स्त्री की दृष्टि पड़ गयी हो, जिसमें बाल या कीड़े पड़ गये हों, जिस पर कुत्ते की दृष्टि पड़ गयी हो तथा जो रोकर तिरस्कारपूर्वक दिया गया हो, वह अन्न राक्षसों का भाग है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;गाय, भैंस और बकरी के दूध के सिवाय अन्य पशुओं के दूध का त्याग करना चाहिए। इनके भी बयाने के बाद दस दिन तक का दूध काम में नहीं लेना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;ब्राह्मणों को भैंस का दूध, घी और मक्खन नहीं खाना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;लक्ष्मी चाहने वाला मनुष्य भोजन और दूध को बिना ढके नहीं छोड़े।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;जूठे हाथ से मस्तक का स्पर्श न करे क्योंकि समस्त प्राण मस्तक के अधीन हैं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;बैठना, भोजन करना, सोना, गुरुजनों का अभिवादन करना और (अन्य श्रेष्ठ पुरुषों को) प्रणाम करना – ये सब कार्य जूते पहन कर न करें।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;जो मैले वस्त्र धारण करता है, दाँतों को स्वच्छ नहीं रखता, अधिक भोजन करता है, कठोर वचन बोलता है और सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सोता है, वह यदि साक्षात् भगवान विष्णु भी हो उसे भी लक्ष्मी छोड़ देती है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;उगते हुए सूर्य की किरणें, चिता का धुआँ, वृद्धा स्त्री, झाडू की धूल और पूरी तरह न जमा हुआ दही – इनका सेवन व कटे हुए आसन का उपयोग दीर्घायु चाहने वाले पुरुष को नहीं करना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;अग्निशाला, गौशाला, देवता और ब्राह्मण के समीप तथा जप, स्वाध्याय और भोजन व जल ग्रहण करते समय जूते उतार देने चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;सोना, जागना, लेटना, बैठना, खड़े रहना, घूमना, दौड़ना, कूदना, लाँघना, तैरना, विवाद करना, हँसना, बोलना, मैथुन और व्यायाम – इन्हें अधिक मात्रा में नहीं करना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;दोनों संध्या, जप, भोजन, दंतधावन, पितृकार्य, देवकार्य, मल-मूत्र का त्याग, गुरु के समीप, दान तथा यज्ञ – इन अवसरों पर जो मौन रहता है, वह स्वर्ग में जाता है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="font-family: 'Times New Roman', serif; font-size: 12pt; margin-bottom: 0.0001pt; margin-left: 0in; margin-right: 0in; margin-top: 0in; text-indent: 0.5in;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal, serif;"&gt;गर्भहत्या करने वाले के देखे हुए, रजस्वला स्त्री से छुए हुए, पक्षी से खाये हुए और कुत्ते से छुए हुए अन्न को नहीं खाना चाहिए।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-496917147335907582?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/496917147335907582/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/07/20-25-3-4-10-15-2-8-10-93-4.html#comment-form' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/496917147335907582'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/496917147335907582'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/07/20-25-3-4-10-15-2-8-10-93-4.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://3.bp.blogspot.com/-SYU1kli6gA4/TXJ-0PC2mJI/AAAAAAAAAY4/MN_oJ9Hu2-4/s220/IMG0345A.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/-EpOP5rVAP2I/TicYepMAi8I/AAAAAAAAAjo/xR969ni2OdM/s72-c/266736_133027950115311_100002243197207_232624_791217_o.jpg' height='72' 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से&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #bf9000;"&gt;&lt;b&gt;साध्य को पाये बिना.......?&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो खिलाड़ी खेल को कठिन मानता है वह खिलाड़ी नहीं अनाड़ी है। जो कारीगर कहता है कि यह काम कठिन है, वह कारीगर नहीं अनाड़ी है। जो कहता है कि आत्मज्ञान पाना कठिन है, आत्म विश्रान्ति पाना कठिन है, आत्मा में आराम पाना कठिन है, परमात्मा का ध्यान करना कठिन है, प्रभु का अमृत पीना कठिन है, वह प्रभु के मार्ग में अनाड़ी है।&lt;br /&gt;राजा खटवांग ने एक मुहूर्त में प्रभु का साक्षात्कार कर लिया। राजा जनक ने घोड़े की रकाब में पैर डालते डालते प्रभु का अनुभव कर लिया। शुकदेवजी महाराज ने इक्कीस दिन में आत्म-साक्षात्कार कर लिया। राजा परीक्षित को कथा-श्रवण करते-करते पाँच दिन हुए, शुकदेव जी की नूरानी निगाह पड़ी तो परीक्षित को तसल्ली मिल गयी। सातवें दिन पूर्णता प्राप्त हो गई।&lt;br /&gt;अधिकारी जीव को पाँच, सात, दस दिन में, महीने दो महीने में, साल दो साल में, दस साल में भी, अरे पचास साल तो क्या पचास जिन्दगियाँ दाँव पर लगाने के बाद भी अनन्त ब्रह्मण्ड के नायक प्रभु का अनुभव होता है तो सौदा सस्ता है।&lt;br /&gt;तू लगा रह। थक मत। लगा रह.... लगा रह.....। माप-तौल मत कर। पीछे कितना अन्तर काट कर आया इसकी चिन्ता मत कर। आगे कितना बाकी है यह देख ले। जितना चल लिया वह तेरा हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वशिष्ठजी कहते हैं- "हे रामजी ! सन्ध्या का समय हुआ है।"&lt;br /&gt;सभा में सब परस्पर नमस्कार करके उठने लगते हैं तो रामजी कहते हैं- "भगवन् ! तुम्हारे शब्द कानों के भूषण हैं। सुनते-सुनते कान अघाते नहीं। हालाँकि ये बाते मैं पहले सुन चुका हूँ लेकिन फिर से आप कहते हैं...... बड़ी प्यारी लगती हैं ये बातें।"&lt;br /&gt;तुलसीदास &amp;nbsp;जी कहते हैं-&lt;br /&gt;श्रवण जाँ के समुद्र समाना।&lt;br /&gt;हरिकथा सुनहिं नाना......।।&lt;br /&gt;जिसके कान समुद्र के समान हैं…।&lt;br /&gt;सब नदियाँ जाकर समुद्र में गिरती हैं लेकिन समुद्र इन्कार नहीं करता। ऐसे ही जो श्रोता हरिरस की चर्चा सुनते सुनते थकता नही, ऊबता नहीं तो समझ लो उसके श्रवण समुद्र के समान हैं।&lt;br /&gt;यदि सत्संग नहीं सुनेगा तो कुसंग में पड़ेगा। यदि सत्कृत्य नहीं करेगा तो दुष्कृत्य करेगा। बन्दगी में, तपस्या में समय नहीं जायेगा तो ऐसे ही हाहा.... हूहू... में समय जायेगा। सत्संग में पाँच घण्टे बिताये तो ये पाँच घण्टे तपस्या में गिने जायेंगे। ज्ञान मिला वह मुनाफे में, भक्ति मिली वह मुनाफे में। नहीं तो पाँच घण्टे वैसे ही बीत जाते।&lt;br /&gt;कबीरा दर्शन संत के साहिब आवे याद।&lt;br /&gt;लेखे में वो ही घड़ी बाकी के दिन बाद।।&lt;br /&gt;जो घड़ियाँ हरिचर्चा में, हरिध्यान में बीतीं वे सार्थक हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई भी कार्य उत्साह से किया जाय तो समय व शक्ति उसमें कम लगने पर भी वह कार्य बढ़िया सुन्दर बन जाता है। यदि कार्य करने में उत्साह नहीं है तो समय भी ज्यादा लगता है और वह इतना फलित भी नहीं होता है।&lt;br /&gt;बड़े में बड़ा कार्य है भगवत्प्राप्ति। जिसने भगवत्प्राप्ति नहीं की उसने व्यर्थ जीवन गँवा दिया। भगवत्प्राप्ति करने में उत्साह चाहिए। उत्साह होने पर साधना में नियमितता आने लगती है। साधना में नियमितता आने के कारण साधना में रस पैदा होता है। वह रस साध्य तक पहुँचा देता है। अगर साधन-भजन में रस नहीं है, आहार व्यवहार में नियमितता नहीं है तो अच्छे से अच्छा साधक भी गिर जाता है।&lt;br /&gt;सदगुरू का एक शिष्य उपदेश सुनकर एकान्त में गया। थोड़ा साधन-भजन किया। उसकी धारणाशक्ति सिद्ध हो गई। एकाग्रता हुई। एकाग्रता के बल से आत्म-साक्षात्कार करना चाहिए वह तो किया नहीं। एकाग्रता से छोटा-मोटा कुछ प्रभाव आया तो वह अपने को परमहंस मानने लग गया।&lt;br /&gt;ब्रह्मवेत्ता महापुरूष ने जब तक अनुभव नहीं करवाया तब तक अपने मन से ही प्रमाणपत्र लेकर बैठ जाना यह आपको धोखा देना है। आखिरी मुहर तो ब्रह्मवेत्ता महापुरूषों की होती है।&lt;br /&gt;जब तक साक्षात्कार नहीं होता है तब तक उच्च कोटि के महात्मा नहीं कहेंगे कि तुझको साक्षात्कार हो गया है। साक्षात्कार का मतलब है राग, द्वेष और अभिनिवेश निवृत्त हो जाना। ऐसा नहीं कि ललाट में बिन्दी देखी, प्रकाश देखा और चित्त में काम, क्रोध, लोभादि शत्रु मौजूद हैं, राग-द्वेष मौजूद हैं। जरा से प्रकाश की बिन्दी देखी और साक्षात्कार हो गया ? बिन्दी देखना यह दृश्य है। उसी को प्रभुदर्शन या साक्षात्कार मानने वाले लोग अपने आपको ठगते हैं।&lt;br /&gt;पूरा संसार और मृत्यु का भय भी सत्य न दिखे। सारा संसार स्वप्न की नाँई भासे। स्वप्न में सुख देखा हो या दुःख देखा हो, जाग्रत में उसका कोई मूल्य नहीं। स्वप्न में तुमने लाखों रूपयों का दान किया तो जाग्रत में उस दान का अहंकार नहीं होता। स्वप्न में तुम्हारी जेब कट गई या करोड़ों की संपत्ति नष्ट हो गयी तो आँख खुलने पर उसका शोक नहीं होता।&lt;br /&gt;ऐसे ही यह संसार स्वप्न होता है। बोध हो जायगा तो हर्ष शोक के प्रसंग में सुख-दुःख भीतर से हिलायेंगे नहीं। जब तक ऐसा बोध हुआ नहीं, सौ प्रतिशत यात्रा नहीं हुई तब तक साधना में शिथिलत कर दे या अपने को ज्ञानी मान ले यह बड़ी भूल है। बिन्दी दृश्य होता है भैया ! रूप प्रत्याहार , दिखती है। योगमार्ग में यह बहुत छोटी बात है। आत्म-साक्षात्कार का इसके साथ कोई सम्बन्ध नहीं है।&lt;br /&gt;कोई कहता है पृथ्वी बड़ी है, कोई कहता है आकाश बड़ा है, कोई कहता है स्त्री और पुरूष बड़े हैं लेकिन गोरखनाथ कहते हैं कि भूल बड़ी है जो आदमी को चौरासी लाख योनियों में भटकाती है। अपने स्वरूप के बारे में जो भूल है वह बड़े में बड़ी है। वही सब भ्रम दिखाती है।&lt;br /&gt;साधना में थोड़ा अनुभव हो जाय उसी में तुष्ट हो जाना यह भी भूल है। इस तुष्टि के कारण वह साधक बेचारा उलझ गया। उलझ गया तो वह अपने को सिद्ध मानने लग गया। थोड़ी सेवा आदि की थी, थोड़ा भजन-वजन किया था। थोड़े पुण्य जमा हुए तो वह कपड़े लत्ते निकाल कर परमहंस का वेश बनाकर बैठ गया। लोग बापजी बापजी करने लगे। लोग खिलावें तो खावे, नहीं तो पड़ा रहे। कीर्ति फैल गई।&lt;br /&gt;किसी राजा ने देखा कि ज्ञानी है, परमहंस है। बड़े आदर से महल में ले आये। सेवा की। पहले छोटी मोटी कौपीन पहनते थे फिर रेशमी चद्दरें पहनने लगे। कीर्ति में फँसे। राज्य का अन्न खाने लगे। राजा के यहाँ रहने लगे। राजसी अन्न.... बकरे कटते हैं उसमें से टैक्स आता है, गौ कटती है उसमें से टैक्स आता है, श्मशान का भी टैक्स आता है। सब राज्य का अन्न ! बुद्धि रजोगुणी हो गई, साधना नष्ट हो गई।&lt;br /&gt;राजा को एक ही लड़की थी। और कोई संतति नहीं थी। राजा ने सेवा पूजा की। राजा के कुछ पुण्य रहे होंगे, उसको बेटा हुआ। राजा इस साधक को भगवान मानने लगा। राजा के निवास में रहते-रहते बुद्धि एकदम नीची हो गई। राजा की रानी भी सेवा करे, राजा की बेटी भी सेवा करे। उस युवती को देखते-देखते मन में विकार पैदा हुआ। एक दिन राजा को बुलाया और कहाः&lt;br /&gt;"देख, यह लड़का तो पैदा हुआ मेरी कृपा से, लेकिन उसके ग्रह ऐसे हैं कि तुम्हारी लड़की जीवित रहेगी तो यह लड़का मर जायेगा।"&lt;br /&gt;"बाप जी कोई उपाय बताओ।"&lt;br /&gt;"उपाय यह है कि लड़की को सन्दूक में डालकर कृष्णार्पण कर दें तो लड़का जियेगा, नहीं तो मर जायेगा।"&lt;br /&gt;राजा आ गया उसके षडयंत्र में। उसने लड़की को सन्दूक में डालने की बात वजीर से कहीं। वजीर कुछ सयाना था। सोचा कि राजमहल में रहते-रहते साधक की भावना चट हो गई है। तत्त्वज्ञान स्थित नहीं है। राजा उससे भरमा गया है।&lt;br /&gt;वजीर ने सन्दूक मँगाया। लड़की को जाकर ठीक जगह रख दिया और जंगल से एक शेर पकड़वाकर सन्दूक में बन्द कर दिया। बजाते गाते सन्दूक को बाप &amp;nbsp;के कहे अनुसार नदी में प्रवाहित कर दिया। साधक ने यह देखा और मन ही मन कहाः अपना काम बन गया। जंगल जाने के बहाने वह भागा, सोलह सिंगार की हुई युवती को सन्दूक में सुलाया था उसे लेने के लिए। दौड़ते दौड़ते दो मील का चक्कर काटकर आगे जाकर देखा तो सन्दूक आ रहा है। अपना मनोरथ पूरा होगा। सन्दूक पकड़कर खोला तो निकला शेर। फिर क्या हुआ होगा यह कहने की आवश्यकता नहीं।&lt;br /&gt;निगुरे का हाल भी निगुरा होता है। मनमुख कहाँ धोखा खा लेता है उसको पता नहीं चलता।&lt;br /&gt;इस प्रकार की प्राचीन घटनाएँ हम लोगों को सावधान करती हैं कि जब तक पूरा तत्त्वज्ञान हजम नहीं हो जाय तब तक साधना से रूचि न हटायी जाय। इतनी कृपा करें। साधना में रूचि बनी रहेगी तो साधना में रस आयेगा। साधना का रस चालू रहेगा तो बाहर का रस आकर्षित नहीं करेगा। साधना का रस छोड़ दिया तो बाहर का रस फँसा देगा।&lt;br /&gt;इसलिए साधना में नियमितता लानी चाहिए। यदि किसी कारणवश नियमितता न ला सकें तो भी साधना में प्रीति बनी रहनी चाहिए। साधना में प्रीति होगी तो साधना में रस आयेगा। साधना में रस आयेगा तो साध्य तक पहुँचा देगा।&lt;br /&gt;हम जितना मूल्य संसार को देते हैं इतना मूल्य अगर ईश्वर को दें तो सचमुच फिर देर नहीं है, आप ईश्वर हैं ही। लेकिन जितना मूल्य ईश्वर को, परमात्मा को देना चाहिए उसका आधा मूल्य भी दे दें न, तो भी दुःख, कलह, परेशानी, जन्म-मृत्यु दूर हो जाय। हम मुक्त हो जायें। लेकिन हम परमात्मा के मूल्य को जानते नहीं। जगत का मूल्य, संसार का आकर्षण दिमाग में इतना भरा है कि दिन-रात उसी को सुनते हैं, उसी को देखते हैं, उसी की चर्चा करते हैं। हमारे हृदय में नाम रूप की सत्यता घुस गई है। नाम रूप की सत्यता ने लोगों के दिल की इतनी खाना खराबी कर दी है कि दिल में दिलबर छुपा है वह दिखता नहीं और जो मिथ्या है, स्वप्न जैसा है, बदलने वाला है, जिसमें कुछ सार नहीं फिर भी उससे दिल दिमाग को भर रखा है।&lt;br /&gt;आपने डिप्टी कलेक्टर की कथा सुनी, शंकराचार्यजी की कथा सुनी, कालचक्र की बात सुनी। इस प्रकार आपको भी कोई बात लग जाय तो गाँठ बाँध लो। क्योंकि जीवन बड़ा मूल्यवान है। एक-एक दिन आयुष्य का नाश हो रहा है। एक-एक घण्टा आयुष्य का कम हो रहा है। एक एक मिनट आयुष्य की क्षीण हो रही है। उसमें सुख देखा तो स्वप्न हो गया, दुःख देखा तो भी स्वप्न हो गया, दुश्मन देखे तो भी स्वप्न हो गया।&lt;br /&gt;ऐसे स्वप्न जैसे जीवन में लोग बेकार का तनाव खिंचाव करके अपनी शक्ति बरबाद कर देते हैं। जब दुःख आ जाय तो याद रखोः वह खबर देता है कि संसार का यही हाल है। जब सुख आ जाय तब समझना कि टिकने वाला नहीं। यह पक्का समझ लिया तो सुख जाते समय दुःख नहीं देगा। सूरज रोज ढलता है यह पता है इसलिए शाम को सूर्य ढल जाता है तो दुःख नहीं होत। लेकिन घर में लाइट का फ्यूज उड़ जाता है तो हाय हाय ! आकाश में सब फयूजों का बाप ऐसा सूर्य डूब जाता है तो हाय हाय नहीं होती। कभी सूरज ढला तो दुःख होता है कि हाय हाय ! अन्धेरा हो गया ? नहीं, यह तो रोज होता है अन्धेरा। घर का छोटा-सा दीया बुझ जाता है तो दुःख होता है। क्योंकि यह मेरा दीया है इसकी ममता है।&lt;br /&gt;कभी पति का दीया बुझ जायेगा कभी पत्नी का दीया बुझ जायगा, कभी पुत्र का दीया बुझ जायगा। दीये का तेल देखकर अन्दाज लगा सकते हैं कि दीया कब तक जलता रहेगा लेकिन अपने जीवनरूपी दीये का कोई भरोसा नहीं। अतः अभी से सावधान !&lt;br /&gt;गाफिल क्यूँ सोचत नहीं वृथा जीवन विलाय।&lt;br /&gt;तेल घटा बाती बुझी अन्त बहुत पछताय।।&lt;br /&gt;जैसे कोई खिलाड़ी समझता है कि खेल खेलना कठिन है वह खिलाड़ी नहीं अनाड़ी है। ऐसे ही जो साधक समझता है कि आत्मज्ञान पाना कठिन है, मुक्त होना कठिन है वह साधक नहीं अनाड़ी है। उसमें सत्त्वगुण नहीं आया, गुरू के ज्ञान में दृढ़ता नहीं आयी। परमात्मा में प्रीति नहीं हुई। तड़प नहीं आयी, छटपटाहट नहीं आयी इसीलिए उसको कठिन लगता है।&lt;br /&gt;चातक मीन पतंग जब पिया बिन नहीं रह पाय।&lt;br /&gt;साध्य को पाय बिना साधक क्यों रह जाय।।&lt;br /&gt;मौत सिर पर खड़ी है और तू चद्दर ताने सोया है ! कब तक वह सोने देगी ? यह तो बहती सरिता है। जिसने पानी पी लिया सो पी लिया, नहा लिया सो नहा लिया। गंगा का बहता जल हमारा इन्तजार थोड़े ही करेगा ? समय हमारा इन्तजार थोड़े ही करेगा ? जितना पा लिया, जितना कर लिया, जितने संस्कार मजबूत हो गये परमात्मभाव के, उतनी ही तुम्हारी पूँजी है। और कोई पूँजी तुम्हारी नहीं है। ब्रह्मभाव के जो संस्कार हैं वे आपके हैं। आत्मविश्रान्ति के संस्कार आपके हैं, और कुछ आपका नहीं है।&lt;br /&gt;जब भी मौका मिले, अकेले हो जाओ। शान्त हो जाओ। मौन का मजा लो। सत्संग की बात सुनकर मौन हो जाओ। आपस में ये बातें एक दूसरे से करो, संतों की प्रशंसा करो यह ठीक है लेकिन होकर सत्संग के विचारों में डूबे रहना, आत्म-चिन्तन में मस्त रहना अधिक अच्छा है। चित्त को शान्त करते जाओ, आत्म-शान्ति में खोते जाओ। सोना नहीं है, शान्त होना है। जितना जितना शान्ति का रस बढ़ेगा, जितनी जितनी निर्विचारिता बढ़ेगी उतने उतने आप महान् होते जाओगे। क्या पता दुबारा ऐसा शरीर मिले न मिले, दुबारा ऐसी बुद्धि मिले न मिले, दुबारा ऐसे प्यार से ऊपर उठाने वाले संतों की मुलाकात हो न हो !&lt;br /&gt;देने वाला दिल खोल कर दे रहा है, तू अपना दामन क्यों सिकोड़ रहा है ? अपना दामन फैलाय जा.... फैलाय जा.... लेता जा। इन्कार क्यों करता है ?&lt;br /&gt;साधन में रूचि रहे।&lt;br /&gt;"रूचि नहीं रहती तो क्या करें ?"&lt;br /&gt;साधन में नियमितता नहीं रख सकें तो क्या करें ?"&lt;br /&gt;"भोजन में नियमितता है ?"&lt;br /&gt;"नहीं।"&lt;br /&gt;"नींद में नियमितता है ?"&lt;br /&gt;"बाबा जी नहीं है।"&lt;br /&gt;अच्छा ! भोजन करने में, नींद में नियमितता नहीं है फिर भी भोजन कर लेते हो। सो भी लेते हो। ऐसे ही अपना साधन भजन भी कर लो।&lt;br /&gt;जो बहिर्मुख लोग हैं, जो रजो-तमोगुण के संस्कार के हैं उन लोगों का अन्न अनिवार्य हो तो ही खाओ, नहीं तो उससे बचो।&lt;br /&gt;आहारशुद्धो सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।&lt;br /&gt;जीवन में ऐसी कोई आपत्तियों की घड़ियाँ आ जाये तो तुरन्त स्मृति आ जाय ज्ञान की। मानो यकायक सामने मौत आ जाय तो भीतर से तुम्हारी स्मृति होनी चाहिए कि मेरी मौत कभी नहीं होती।&lt;br /&gt;वास्तव में तुम्हारा ऐसा स्वभाव है। तुम वास्तव में ऐसे हो। तुम्हारी मौत कभी नहीं होती नहीं लेकिन गलती ने तुम्हें ऐसा पकड़ रखा है कि बस मर.... गये। पानी नहीं मिला तो मर गये, छाछ नहीं मिली तो मर गये। हजार हजार बार 'मर गये.... मर गये....' कहते कहते भी जी रहे हो न ? ऐसे ही ये हजार हजार शरीर मरें लेकिन तुम तो सबके जीवनदाता हो। तुमको यह पता नहीं। सूर्य में तुम्हारा प्रकाश है, तारों में तुम्हारी टिमटिमाहट है, चाँद में तुम्हारी चमक है, योगियों के हृदय में तुम्हारी धड़कन है। लेकिन तुम्हें अपनी महिमा का पता नहीं।&lt;br /&gt;अपनी महिमा को जानो। अपनी महिमा को पाओ। वाडा, पंथ, संप्रदाय ठीक है, सब अपनी अपनी जगह पर है लेकिन आखिरी सत्य और सार यह नहीं है। जो ब्रह्मवेत्ता हों, ज्ञानवान हों, वेद वेदान्त के तत्त्व-मत से वाकिफ हों और जिनको अपना आत्मा हस्तामलकवत् भासता हो, ऐसे महापुरूषों के अनुभव के वचन पकड़कर साधना में डट जाओ। फिर जब व्यवहार करो तब व्यवहार को भी देखो कि आखिर यह सब कब तक ?&lt;br /&gt;बचपन खेल हो गया, जवानी खेल हो गई। सब स्वप्न.....। आखिर पति कब तक ? पत्नी कब तक ? रूपये कब तक ? सत्ता कब तक? फूलों की शय्या कब तक और पलंग का आराम कब तक ?&lt;br /&gt;जिसमें पुरूषार्थ करना है वह ईश्वर प्राप्ति की बात रख दी प्रारब्ध पर और जो प्रारब्ध के आधीन है उसमें पुरूषार्थ करने लग गये हैं। आँख की दवा पेट में और पेट की दवा आँख में।&lt;br /&gt;एक बीमार आदमी था। उसकी आँखों में कुछ जलन थी। वह वैद्यराज के पास गया। वैद्यराज ने आँखों के लिए लोशन आदि दिया और पेट के लिए पुड़िया दी। उस बीमार ने क्या किया कि आँख की दवा पी गया और पेट की दवा आँख में डाल दी। आँख हो गई टमाटर जैसी लाल और पेट फूल कर हो गया तरबूज।&lt;br /&gt;यह उस मरीज की कहानी नहीं है, हम लोगों की है। चारों तरफ देखो तो यही हाल है। ज्ञान की आँख भी ठीक से काम नहीं देती है और जीवन के सुख-दुःख को पचाने की जठराग्नि भी नष्ट हो गई है। यह हम लोगों की ही तो घटना है।&lt;br /&gt;अब कृपानाथ ! कृपा करो अपने ऊपर। जो आँख में डालने की दवा है उसको आँख में डालो और जो खाने की दवा है उसको खाओ। जिस निगाह से संसार को देखना चाहिए, उस निगाह से संसार को देखो और जिस निगाह से, जिस भाव से प्रभु प्राप्ति करनी है उस निगाह को प्रभु के तरफ लगाओ। बस, तुम्हारा बेड़ा पार हो जायगा। तुम्हारा गुरूपूर्णिमा का पर्व पूर्ण रूपेण फल जायगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरूपूर्णिमा का उद्देश्य यह होता था कि सालभर में एक बार बिखरे हुए गुरूभाई एकत्र हों। कुछ नया मार्गदर्शन, कुछ नया उत्साह लेकर अपने लक्ष्य की ओर तीव्रता से गति करें। चतुर्मास का प्रारंभ करके आध्यात्मिक खजाना कमाने लगें। कुछ नियम, कुछ संकेत, गुरूओं की कुछ दुआ पायें और कुछ अपनी कृतज्ञता व्यक्त करें। इसीलिए गुरूपूर्णिमा के पर्व का आयोजन किया गया है। कान में फूँक मारकर दक्षिणा ले लेने का यह पर्व नहीं है। लेकिन शोक, ताप, संताप से तप्त जीवों की तपन लेकर उनके हृदय में परमात्मा की पवित्र शीतलता भरकर जीव को जगाने का यह पर्व है।&lt;br /&gt;शिष्य सोचता है कि जिन ऋषियों, महापुरूषों के द्वारा ऐसा मिलता है तो उनके लिए हम क्या करें ? हम कृतघ्न न बनें, गुणचोर न बनें इसलिए कुछ न कुछ सेवा करें। शिष्य कुछ सेवा खोजते हैं और गुरू सोचते हैं कि शिष्यों का तन, मन, धन, जीवन सार्थक हो जाये।&lt;br /&gt;गंगा में नहाते हुए गुरूजी ने दूर खड़े शिष्य से पानी माँगा। शिष्य लोटा लाया, माँजा और गंगा जी में वहाँ आया और वहीं से भरकर गुरू जी को दिया। साथ में नहाते दूसरे संतों ने प्रश्न कियाः "गंगाजल ही पीना था तो आप गंगाजी में ही खड़े थे। उस शिष्य से क्यों परिश्रम कराया।" बाबाजी ने कहाः "इसी बहाने उसको सेवा मिली। कृतज्ञता भरा व्यवहार करके अपना अन्तःकरण पवित्र बनाने का मैंने उसे मौका दिया।"&lt;br /&gt;जो सत्शिष्य हैं वे गुरूओं के आदेशों का, उद्देश्यों का पालन करते हैं और सेवा का मौका ढूँढते हैं। जो स्वार्थी हैं वे नश्वर संसार की सेवा करने में रूचि रखते हैं लेकिन शाश्वत परमात्मा की दिशा में ले जाने वाले रास्ते पर चलने की रूचि कम रहती है। इसका अर्थ यह है कि उन्होंने ईश्वर को कम मूल्य दिया है। परमात्मा को जो मूल्य देना चाहिए वह मूल्य उन्होंने जगत को दिया है। जगत का जो मूल्य है वह रख दिया परमात्मा के लिए। वे हैं भगत। जगत और परमात्मा, दोनों का मूल्य जिन्होंने जगत में लगा दिया वे हैं मूढ़। दोनों दृष्टियाँ जिन्होंने जगत में खर्च कर दी वे हैं पामर।&lt;br /&gt;जो लोग संतों के पास आते हैं वे मूढ़ तो नहीं हैं, पामर तो नहीं हैं लेकिन संत जिन उच्च कोटि के जिज्ञासु की तलाश में हैं वे जल्दी मिलते नहीं। संत अपना खजाना बाँटते रहते हैं, वह खजाना खूटता नहीं लेकिन पूरे का पूरा खजाना लेनेवाला कोई मिल जाय ऐसी ताक में रहते हैं। ऐसा उत्कट जिज्ञासु, पूरा सत्शिष्य जल्दी मिलता नहीं। कवि काग अपनी व्यथा प्रगट करते हुए कहते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमे नीसरणी बनीने दुनियामां ऊभा,&lt;br /&gt;पण चड़नारा कोई न मळया रे जी।&lt;br /&gt;अमे दादरो बनीने खीला खाधा,&lt;br /&gt;पण तपस्यानां फल ना फळयां रे जी।&lt;br /&gt;अंगड़ां कपाव्यां अमे, आग्युमां ओराणा,&lt;br /&gt;अमे जन जननी थाळीए पीरसाणा,&lt;br /&gt;पण जमनारा कोई ना मळया री जी।&lt;br /&gt;माथड़ां कपाव्यां अमे, पाणीमां बफाणा&lt;br /&gt;अमे अत्तर थईने, रूने पूमड़े नखाणा&lt;br /&gt;पण सूंघनारा कोई ना मळया रे जी।&lt;br /&gt;'काग' सरगापुरी छोड़ी अमे पतीतोने काजे&lt;br /&gt;अमे हेमांळथी देहने पड़ता मेल्या&lt;br /&gt;पण झीलनारा कोई न मळया रे जी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा क्यों होता है ? संतों के पास सत्संग सुनने वाले तो हजारों की संख्या में लोग आते हैं लेकिन तत्त्वज्ञान की, आत्म-साक्षात्कार की, परमात्मा की आखिरी यात्रा सब लोग नहीं कर पाते। क्यों ? क्योंकि उनको ज्ञानवानों का संग कम है और संसार में उलझे हुए व्यक्तियों का संग ज्यादा है। खानपान की खबरदारी नहीं। जन्मजात ज्ञान के संस्कार नहीं। इसीलिए देरी होती है। अन्यथा परमात्मप्राप्ति में कुछ देरी नहीं है, कोई तकलीफ नहीं है। जो खिलाड़ी है उसके लिए खेल आसान है। जो अनाड़ी है उसके लिए खेल कठिन है।&lt;br /&gt;जो कहते हैं कि परमात्मा-प्राप्ति कठिन है, आत्मज्ञान पाना कठिन है, अपने दिल में छुपे दिलबर का दीदार करना कठिन है, अपने आपकी मुलाकात करना कठिन हैं, आत्मदेव की मुलाकात करना कठिन है, वे खिलाड़ी नहीं अनाड़ी हैं। लेकिन जो कहते हैं आसान है, सरल है, परमात्मा तुमको मिल सकते हैं, ऐसे महापुरूषों का मिलना कठिन है।&lt;br /&gt;ईश्वर मिलना कठिन नहीं है लेकिन हमारे हृदय में ईश्वर की सहजता, सरलता, आनन्द प्रगट करने वाले, हमारे दिल में ईश्वर प्राप्ति के लिए जिज्ञासा का तूफान भरने वाले, परमात्म-प्राप्ति कराने के लिए उत्सुक ऐसे महापुरूषों का मिलना कठिन है। जो कहते हैं कठिन नहीं है ऐसे संत महापुरूषों का मिलना कठिन है।&lt;br /&gt;तुम लोग दूर से आये होगे..... थके होगे। अब प्रसाद पाओ, आराम करो....। लेकिन याद रखना, तुम कभी थकते नहीं। तुम्हारा शरीर थकता है। तुम थकान को भी देखते हो और थकान उतरने को भी देखते हो। मौत के समय भी अगर यह स्मृति आ जाय तो निहाल हो जाओगे। विद्यार्थी नहीं पढ़ता है, तो उसका कसूर है फिर भी मास्टर तो चाहता है कि वह पास हो जाय तो अच्छा है। किसी तुक्के से निकल जाये तो अच्छा है। ॐ......ॐ.......ॐ.....&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-5907766126382592293?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/5907766126382592293/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/07/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/5907766126382592293'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/5907766126382592293'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://3.bp.blogspot.com/-SYU1kli6gA4/TXJ-0PC2mJI/AAAAAAAAAY4/MN_oJ9Hu2-4/s220/IMG0345A.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-LbXa_chj8VY/Ths6jcq4bPI/AAAAAAAAAhc/s3b3QpPcf4c/s72-c/mere+bapu.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5113688638599628772.post-7862742316219643534</id><published>2011-06-29T23:31:00.000+05:30</published><updated>2011-06-29T23:31:45.721+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-6NpyPQzWqR4/TgtnNNitw2I/AAAAAAAAAg0/nbT_I4pM_6A/s1600/wah.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="300" src="http://4.bp.blogspot.com/-6NpyPQzWqR4/TgtnNNitw2I/AAAAAAAAAg0/nbT_I4pM_6A/s400/wah.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-size: large;"&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #cc0000;"&gt;जीवन सौरभ&lt;/span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Courier, monospace; font-size: 14px;"&gt;पुस्तक से&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span class="Apple-style-span" style="color: #bf9000; font-size: large;"&gt;सेवा-यज्ञ&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी भी देश की सच्ची संपत्ति संतजन ही होते हैं। वे जिस समय प्रगट होते हैं उस समय के जन-समुदाय के लिए उनका जीवन ही सच्चा मार्गदर्शक होता है। जिस समय जिस धर्म की आवश्यकता होती है उसका आदर्श प्रस्तुत करने के लिए स्वयं भगवान ही तत्कालीन संतों के रूप में नित्य अवतार लेकर आविर्भूत होते हैं- ऐसा कहने में जरा भी अतिशयोक्ति नहीं है। वे भय एवं शोक, ईर्ष्या एवं उद्वेग की आग से तपे हुए समाज को सुख और शांति, स्नेह एवं सहानुभूति, सदाचार एवं संयम, साहस एवं उत्साह, शौर्य एवं क्षमा जैसे दिव्य गुण देकर, हृदय के अज्ञान-अंधकार को मिटाकर जीव को शिवस्वरूप बना देते हैं। उत्तर भारत में तपस्यामय जीवन बिताकर पूज्य श्री लीलाशाहजी बापू नयी शक्ति, नयी ज्योति एवं अंतर की दिव्य प्रेरणा प्राप्त कर, लोगों को सच्चा मार्ग बताने, गरीब एवं दुःखी लोगों को ऊँचा उठाने तथा सतशिष्यों एवं जिज्ञासुओं को ज्ञानामृत पिलाने के लिए कई वर्षों के बाद सिंध देश में आये।&lt;br /&gt;सुखमनी के इस वेद-वचन में उन्हें पूर्ण श्रद्धा थीः&lt;br /&gt;ब्रहम महि जनु जन महि पार ब्रहमु।&lt;br /&gt;एकहि आपि नही कछु भरमु।।&lt;br /&gt;'जिन्होंने परब्रह्म का अनुभव कर लिया है ऐसे संत परब्रह्म में और परब्रह्म ऐसे संत में समा जाते हैं। दोनों एकरूप हो जाते हैं। दोनों में कोई भेद नहीं रहता।'&lt;br /&gt;वे स्वयं भी कहते कि, जहाँ द्वैत नहीं है वहाँ दूसरों की भलाई करना यह स्वयं की ही भलाई करने जैसा है। वे वेद एवं उपनिषदों के वचनों के अनुसार पूरे विश्व को ही अपना मानते हैं।&lt;br /&gt;अष्टादशपुराणेषु व्यासास्यं वचनद्वयम्।&lt;br /&gt;परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।।&lt;br /&gt;'अठारह पुराणों में वेदव्यासजी के दो ही वचन हैं कि परोपकार ही पुण्य हैं एवं दूसरों को पीड़ा देना पाप।'&lt;br /&gt;पूज्य संत श्री लीलाशाहजी बापू ने व्यासजी के इन वचनों को अपना लिया कि परोपकार ही परम धर्म है। इसके लिए उन्होंने अपना सारा जीवन दाँव पर लगा दिया। धार्मिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक हर क्षेत्र में उन्होंने कार्य शुरू किया। वे मानो स्वयं एक चलती-फिरती संस्था थे, जिनके द्वारा अनेक कार्य होते थे।&lt;br /&gt;सर्व प्रथम तलहार में जाकर उन्होंने संत रतन भगत के आश्रम में एक कुआँ खुदवाया। वहाँ दूसरे साधकों के साथ वे स्वयं भी एक मजदूर की भाँति कार्य करते थे। धन्य ! संत की लीला कितनी अनुपम होती है !&lt;br /&gt;वहीं उन्होंने एक गुफा बनवायी थी। लंबे समय तक वे उसी गुफा में रहते। प्रातःकाल गुफा में से निकलकर शुद्ध हवा लेने जंगल की ओर घूमने जाते। रोज श्रद्धालु, प्रेमी भक्तों को सत्संग देते। दिन में एक ही बार भोजन लेते। मौज आ जाती तो अलग-अलग गाँवों एवं शहरों में जाकर भी लोकसेवा करते एवं सुबह-शाम सत्संग देते। गर्मी के दिनों में आबू, हरिद्वार, हृषिकेश अथवा उत्तरकाशी में जाकर रहते।&lt;br /&gt;जिन्होंने अपने सगे बेटे की तरह उनका लालन-पालन किया था उन चाची को उन्होंने वचन दिया था कि उनकी अंतिम क्रिया वे स्वयं आकर करेंगे। अतः कभी-कभार वे अपनी चाची के पास भी हो आते थे।&lt;br /&gt;तलहार में एक बार अपनी चाची की गंभीर बीमारी के समाचार सुनकर वे घर पधारे किंतु घर जाते ही पता चला कि वे समाचार झूठे थे। उन्होंने चाची को समझायाः&lt;br /&gt;"आपके पास जो सोना पड़ा है, वह साँप है। मरते समय उसमें मोह रह जायेगा तो जीव की अवगति होगी। अतः सभी आभूषणों को बेच डालो और जो पैसे आयें उसे दान कर दो।"&lt;br /&gt;चाची ने सभी आभूषण पूज्य श्री लीलाशाहजी बापू को दे दिये। पूज्य बापू ने उन्हें बेच दिया। थोड़े पैसे चाची के खर्च के लिए रखकर बाकी के सब पैसे गरीब-गुरबों में दान कर दिये।&lt;br /&gt;चाची माँ को खर्च के पैसे देकर जाने लगे और बोलेः&lt;br /&gt;"मैं अंत समय पर जरूर वापस आऊँगा।"&lt;br /&gt;उसके एक वर्ष के बाद चाची की उम्र 100 वर्ष की होते ही वे खूब बीमार पड़ गयीं। केवल एक ही इच्छा थी कि अंत समय 'बेटे' के दर्शन हो। उस वक्त पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज हरिद्वार में थे। इस ओर चाची के शरीर में खिंचाव होने लगा... पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज भी ठीक समय पर आ पहुँचे।&lt;br /&gt;दूसरे दिन चाचीमाँ ने प्राण त्याग दिये। पूज्य श्री लीलाशाह जी बापू ने 12 दिन रहकर उनकी सभी अंतिम क्रियाओं को स्वयं करके अपना वचन निभाया।&lt;br /&gt;पूज्य श्री लीलाशाहजी बापू अब कौटुम्बिक जवाबदारियों से मुक्त हो गये। अब उनका पूरा समय जनसेवा के कार्यों में बीतने लगा। उन महान् ज्ञानी के जीवन में कर्मयोग के साथ देशभक्ति भी झलक उठती थी। उनका रहन-सहन एकदम सादा था। किसी भी जगह पर जाते तो शहर के बाहर एकांत स्थल ही रहने के लिए पसंद करते। प्यारा-प्यारा 'भाई' शब्द तो उनके द्वारा सदैव बोला जाता। उनका दिल भी अत्यंत कोमल एवं धीरजवाला था। वाणी पर खूब संयम था। सँभल-सँभलकर धीरे-धीरे बोलते थे। वे सादगी, सदाचार, संयम एवं सत्य के सच्चे प्रेमी थे।&lt;br /&gt;सिंध के दक्षिणी भाग लाड़ में उन्होंने देखा कि वहाँ के लोग व्यावहारिक तौर पर काफी पीछे हैं। वहाँ उन्होंने छोटे-बड़े सभी को स्वास्थ्य सुधारने के लिए योगासन एवं व्यायाम करने के लिए प्रोत्साहित किया। इसके अलावा सत्संग देकर लोगों को परमात्म-मार्ग पर ढालने के लिए भी प्रोत्साहित किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह कई नौजवान उनके पास आते, तब वे उन्हें योगासन सिखाकर उसके फायदे बताते, साथ-ही-साथ ब्रह्मचर्यपालन एवं वीर्यरक्षा की महिमा भी खूब अच्छे ढंग से बताते। योगासन एवं कसरत कराने के बाद नवयुवकों को दूध पिलाकर जंगल की ओर खुली हवा में घूमने के लिए ले जाते।&lt;br /&gt;उन्होंने विद्यार्थियों, नवयुवकों एवं बड़ों में राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार पर खूब जोर दिया। बहनों एवं माताओं को भी हिन्दी सीखने के लिए उत्साहित किया। उनकी प्रेरणा से सिंध में टंडोमुहमदखान, संजोरी, मातली, तलहार, बदीन, शाहपुर वगैरह गाँवों में कन्या विद्यालय खुल गये, जिनमें मुख्य भाषा हिन्दी थी।&lt;br /&gt;पूज्य श्री लीलाशाहजी बापू जहाँ-जहाँ जाते वहाँ-वहाँ खादी एवं स्वदेशी चीजों का उपयोग करने का आग्रह करते। महात्मा गाँधी ने तो अभी खादी पहनने का आंदोलन शुरू भी नहीं किया था, उसके पहले ही पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज ने स्वयं जुलाहे के हाथ से बनाये गये खादी के कपड़ों को पहनना शुरू कर दिया था। लोगों को फैशन से दूर रहने की एवं सादा जीवन जीने की सलाह दी। लाड़ में शराब एवं कबाब खाने का जो रिवाज पड़ गया था, उसे बंद करने के लिए उन्होंने खूब मेहनत की। इसके अलावा बालविवाह की प्रथा भी बंद करवायी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लाड़ में हरिजनों की स्थिति खूब दयाजनक थी। उसे सुधारने एवं विकसित करने के लिए यहाँ स्वामी हंस निर्वाण संस्था प्रयास कर रही थी। पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज ने उस कार्य को साकार कर दिखाया था। वे खुद हरिजन लोगों की बस्ती में जाकर उन्हें स्वास्थ्य का महत्त्व बताते। सफाई से रहना सिखाते, बच्चों को स्कूल में पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते। लोगों को समझाते कि 'तुम हिन्दू हो। अंडे, मांस एवं शराब का उपयोग बन्द कर दो।'&lt;br /&gt;उन्होंने हरिजन बच्चों को पढ़ाने के लिए एक बहन को भी रखा था जो उन लोगों की बस्ती में जाकर बच्चों की पढ़ाती थीं। पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज खुद ही बच्चों को किताबें, कापियाँ वगैरह देते। अपनी कुटिया के कुएँ में से हरिजनों को पानी भरने देते। दूसरों को भी सलाह देते कि ऊँच-नीच के भेद को छोड़कर हरिजनों को किसी भी कुएँ से पानी भरने दो।&lt;br /&gt;हरिजनों के घर में भी सूत काँतना सिखाकर उन्हें स्वावलंबी बनने के लिए प्रेरित करते। उनके मार्गदर्शन से हरिजन पवित्रता एवं स्वच्छता से रहने लगे। पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज छूत-अछूत के भेद को दूर करने के लिए कभी-कभी पवित्रता बनाये गये हरिजनों के भोजन को भी ग्रहण करते।&lt;br /&gt;पूरे सिंध देश में जहाँ-जहाँ भक्तजन पुकारते वहाँ-वहाँ प्रेम के प्रत्युत्तर के रूप में स्वयं जाकर सत्संग द्वारा जनता में संगठन एवं देशप्रेम की भावना जागृत करते। स्त्रियों, हरिजनों एवं समाज के उत्थान के लिए, बालविवाह प्रथा को बंद करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करते। यौगिक क्रियाओं एवं कसरतों द्वारा तन को तंदुरुस्त एवं मन को प्रसन्न रखकर सुखी जीवन जीने की कुंजी बताते।&lt;br /&gt;देश में जब भी कोई दैवी प्रकोप जैसे कि अकाल, भूकंप, संक्रामक रोग, अतिवृष्टि या अनावृष्टि होती तब अनाथ, पीड़ित लोगों को मदद करने के लिए उनका हृदय एकदम तत्पर हो जाता। एक बार बिहार में अकाल पड़ा तब पूज्य श्री ने श्रद्धालु भक्तों के पास से पैसे इकट्ठे करके अनाज एवं जीवनोपयोगी वस्तुओं को हैदराबाद से भेजने की व्यवस्था की। उस वक्त मुसलमानों के रोजे के दिन चल रहे थे। मुसलमानों ने कहाः&lt;br /&gt;"आज 29वाँ रोजा है। रात्रि को चंद्रदर्शन करके, रोजा (उपवास) छोड़कर, कल ईद मनाकर फिर नावें ले जायेंगे।"&lt;br /&gt;उस वक्त पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज ने 17-18 दिनों से शपथ ले रखी थी कि 'जब तक अकाल-पीड़ितों के लिए नौकाएँ रवाना नहीं हो जायेंगी तब तक मैं उपवास नहीं तोड़ूँगा।' इधर नाविक लोग नावों को न ले जाने के लिए हठ ले बैठे थे। तब पूज्य श्री के श्रीमुख से निकल पड़ाः&lt;br /&gt;''आज तुम्हें चंद्र नहीं दिखेगा एवं कल तुम ईद भी नहीं मनाओगे।"&lt;br /&gt;हुआ भी ऐसा ही। चंद्र दिखा ही नहीं। अंत में परेशान होकर नाविक लोग नावें लेकर हैदराबाद पहुँचे। सामान पहुँचने की पक्की खबरें प्राप्त करने के बाद ही पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज ने अपना उपवास छोड़ा।&lt;br /&gt;इसी प्रकार जब बंगाल में सन् 1949 में भीषण अकाल पड़ा तब फिर से पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज ने दस हजार मन अनाज एकत्रित करवाया। टंडोमहमदखान, तलहार एवं बदीन में स्वयं खड़े रहकर सारा अनाज नौकाओं पर चढ़वाया। जब तक कराची से बंगाल जाने के लिए अनाज रवाना नहीं हुआ तब तक उपवास जारी रखा।&lt;br /&gt;पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज जब हरिद्वार में रहते थे तब बारिश के दिनों में अत्यधिक बरसात होने की वजह से गंगा के जोरदार बहाव को पार करके आने-जाने में गाँव के लोगों को काफी परेशानी उठानी पड़ती। पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज के करूणामय हृदय से यह कष्ट नहीं देखा गया।&lt;br /&gt;वे पुनः सिंध गये। वहाँ से आवश्यक धनराशि एवं एक रिटायर्ड इन्जीनियर को साथ लेकर हरिद्वार आये। हरिद्वार तथा उत्तरकाशी में तीन पुल बनवाये। तब वहाँ के लोगों ने खुश होकर पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज का बहुत आभार माना।&lt;br /&gt;यह काम वास्तव में तो गढ़वाल के राजा को करना चाहिए था किन्तु राजा ने उस तरफ ध्यान तक नहीं दिया था। जब उसे पता चला कि यह काम किसी महात्मा द्वारा हो रहा है तब पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज के दर्शन के लिए आकर वह प्रार्थना करने लगा किः&lt;br /&gt;"अब आपके खान-पान की पूरी व्यवस्था राजदरबार की ओर से की जायेगी।" किन्तु पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया। तब राजा ने कहाः&lt;br /&gt;"आप सचमुच में गुरू नानक की तरह शाहों के शाह हैं।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-7862742316219643534?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/7862742316219643534/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/06/100.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/7862742316219643534'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/7862742316219643534'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/06/100.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://3.bp.blogspot.com/-SYU1kli6gA4/TXJ-0PC2mJI/AAAAAAAAAY4/MN_oJ9Hu2-4/s220/IMG0345A.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-6NpyPQzWqR4/TgtnNNitw2I/AAAAAAAAAg0/nbT_I4pM_6A/s72-c/wah.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5113688638599628772.post-2535385051828656479</id><published>2011-06-13T15:17:00.000+05:30</published><updated>2011-06-13T15:17:13.629+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/-29RzSd1hmhs/TfXbfUBz_RI/AAAAAAAAAgk/WNNJ9K9vd3s/s1600/251310_136704789737025_100001925140865_239603_1094509_n.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="265" src="http://4.bp.blogspot.com/-29RzSd1hmhs/TfXbfUBz_RI/AAAAAAAAAgk/WNNJ9K9vd3s/s400/251310_136704789737025_100001925140865_239603_1094509_n.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="color: #274e13; font-size: large;"&gt;&lt;b&gt;दैवी संपदा&lt;/b&gt;&lt;/span&gt; &lt;span class="Apple-style-span" style="font-family: Courier, monospace; font-size: 14px;"&gt;पुस्तक से&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: #674ea7;"&gt;जीवन-विकास और प्राणोपासना&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य के जीवन में विकास का क्रम होता है। विकास उसको बोलते हैं जो स्वतन्त्रता दे। विनाश उसको बोलते हैं जो पराधीनता की ओर ले जाय।&lt;br /&gt;'स्व' के तंत्र होना विकास है। 'स्व' आत्मा है, परमात्मा है। अपने परमात्म-स्वभाव में आना, टिकना, आत्म-साक्षात्कार के मार्ग पर चलना यह विकास है और इस मार्ग से दूर रहना यह विनाश है।&lt;br /&gt;विकास में तीन सोपान हैं। एक होता है कर्म का सोपान। अंतःकरण अशुद्ध होता है, मलिन होता है तो आदमी पापकर्म की ओर जाता है, भोग, आलस्य, तंद्रा आदि की ओर जाता है। ऐसे लोग तमोगुण प्रधान होने से मृत्यु के बाद वृक्ष, भूंड, शूकर, कूकर आदि अधम योनियों में जाते हैं.... विनाश की ओर जाते हैं।&lt;br /&gt;रजोगुण की प्रधानता हो तो चित्त में विक्षेप होता है। विक्षेप से आदमी छोटी-छोटी बातों में दुःखी हो जाता है।&lt;br /&gt;दुनियावाले ने दुनिया ऐसी बनायी है।&lt;br /&gt;हजारों खुशियाँ होते हुए आख्रिर रूलाई है।।&lt;br /&gt;कितनी भी खुशियाँ भोगो लेकिन आखिर क्या? खुशी मन को होती है। जब तक तन और मन से पार नहीं गये तब तक खुशी और गम पीछा नहीं छोड़ेंगे।&lt;br /&gt;अंतःकरण की मलिनता मिटाने के लिए निष्काम कर्म है। निष्काम कर्म से अंतःकरण शुद्ध होता है। उपासना से चित्त का विक्षेप दूर होता है। ज्ञान से अज्ञान दूर होता है। फिर आदमी विकास की पराकाष्ठा पर पहुँचता है।&lt;br /&gt;हमारा शरीर जब भारी होता है तब वात और कफ का प्रभाव होता है। हम जब उपासना आदि करते हैं तब शरीर में भारीपन कम होने लगता है। आलस्य, प्रमाद, विक्षेप आदि कम होने लगते हैं।&lt;br /&gt;पित्त की प्रधानता से तन में स्फूर्ति आती है। मन, प्राण और शरीर इन तीनों की आपस में एकतानता है। प्राण चंचल होता है तो मन चंचल बनता है। मन चंचल होता है तो तन भी चंचल रहता है। तन चंचल बनने से मन और प्राण भी चंचल हो जाते हैं। इन तीनों में से एक भी गड़बड़ होती है तो तीनों में गड़बड़ हो जाती है।&lt;br /&gt;बच्चे के प्राण 'रिधम' से चलते हैं। उसमें कोई आकांक्षा, वासना, कोई प्रोब्लेम, कोई टेन्शन नहीं है। इसलिए बच्चा खुशहाल रहता है। जब बड़ा होता है, इच्छा वासना पनपती है तो अशांत-सा हो जाता है।&lt;br /&gt;अब हमें करना क्या है? प्राणायाम आदि से अथवा प्राण को निहारने के अभ्यास आदि साधनों से अपने शरीर में विद्युत तत्त्व बढ़ाना है ताकि शरीर निरोग रहे। प्राणों को तालबद्ध करने से मन एकाग्र बनता है। एकाग्र मन समाधि का प्रसाद पाता है। पुराने जमाने में अस्सी अस्सी हजार वर्ष तक समाधि में रहने वाले लोग थे ऐसा बयान शास्त्रों में पाया जाता है। लेकिन 80 हजार वर्ष कोई नींद में नहीं सो सकता। बहुत-बहुत तो कुंभकर्ण जैसा कोई पामर हो, तपश्चर्या करके नींद का वरदान ले तो भी छः महीना ही सो सकता है। अस्सी हजार साल तो क्या 80 साल तक भी कोई सो नहीं सकता।&lt;br /&gt;नींद तमोगुण है। समाधि सत्त्वगुण की प्रधानता है।&lt;br /&gt;सरोवर के ऊपरी सतह पर कोई बिना हाथ पैर हिलाये ठीक अवस्था में लेट जाय तो घण्टों भर तैर सकता है। लेकिन पानी के तले घण्टों भर रहना आसान नहीं है। अर्थात् नीचे रहना आसान नहीं है और ऊपर रहना सहज है। समाधि में और सुख में आदमी वर्षों भर रह सकता है। लेकिन विक्षेप और दुःख में आदमी घड़ी भर भी रहना चाहता नहीं। अतः मानना पड़ेगा कि दुःख, मुसीबत और विक्षेप तुम्हारे अनुकूल नहीं है, तुम्हारे स्वभाव में नहीं है।&lt;br /&gt;मुँह में दाँत होना स्वाभाविक है। लेकिन रोटी सब्जी खाते-खाते कोई तिनका दाँतों में फँस जाता है तो बार बार जिह्वा वहाँ जाती है। जब तक वह निकल नहीं जाता तब तक वह चैन नहीं लेती क्योंकि तिनका मुँह में रहना स्वाभाविक नहीं है। उसको निकालने के लिए लकड़ी की, प्लास्टिक की, पित्तल की, ताँबे की, चाँदी की, न जाने कितनी कितनी सलाइयाँ बनाई जाती हैं। मुँह में इतने पत्थर (दाँत) पड़े हैं उसकी कोई शिकायत नहीं होती जबकि एक छोटा सा तिनका भी असह्य बन जाता है। ....तो मुँह में दाँत होना स्वाभाविक है जबकि तिनका आदि होना अस्वाभाविक है।&lt;br /&gt;ऐसे ही सुख हमारा स्वभाव है। विक्षेप और दुःख हमारा स्वभाव नहीं है। इसलिए कोई दुःख नहीं चाहता, कोई विक्षेप नहीं चाहता। फिर भी दुनियावाले ने दुनिया ऐसी बनायी है कि तुम्हें दुःख और विक्षेप निकालने का तरीका मिल जाय और तुम स्वतंत्र हो जाओ। 'स्व' के 'तंत्र'। 'स्व' केवल एक आत्मा है।&lt;br /&gt;अस्सी हजार वर्ष की समाधि लग सकती है लेकिन नींद उतनी नहीं आ सकती। मन और प्राण को थोड़ा नियंत्रित करें तो हम समाधि के जगत में प्रवेश कर सकते हैं।&lt;br /&gt;जिन लोगों को विचार समाधि प्राप्त हुई है, ज्ञानमार्ग में प्रवेश मिला है उन लोगों का मन सहज में आत्मविचार में रहता है तो जो आनन्द मिलता है, प्रसन्नता मिलती है उससे नींद की मात्रा थोड़ी कम हो जाय तो उनको परवाह नहीं होती। डेढ़ दो घण्टा भी सो लें तो शरीर के आराम की आवश्यकता पूरी हो जाती है। समाधि का, ध्यान का, आत्मविचार का जो सुख है वह नींद की कमी पूरी कर देता है। कोई अगर आठ घण्टे समाधि में बैठने का अभ्यास कर ले तो वह सोलह घण्टे जाग्रत रह सकता है। उसको नींद की बिल्कुल जरूरत नहीं पड़ेगी।&lt;br /&gt;हम जो खाते पीते हैं वह कौन खाता पीता है? गलती से हम मान लेते हैं कि हम खाते पीते हैं। जुड़ गये प्राण से, मन से, शरीर से। वास्तव में भूख और प्यास प्राणों को लगती है। सुख-दुःख मन को होता है। राग-द्वेष बुद्धि को होता है। प्राण, मन, बुद्धि शरीर आदि सब साधन हैं। हमें ज्ञान नहीं है इसलिए साधन को ‘मैं’ मानते हैं और अपने साध्य तत्त्व से पिछड़े रहते हैं।&lt;br /&gt;बिछड़े हैं जो प्यार से दर-ब-दर भटकते फिरते हैं।&lt;br /&gt;कभी किसी की कूख में तो कभी किसी की कूख में। कभी किसी पिता की इन्द्रिय से पटके जाते हैं तो कभी किसी माता से गर्भ में लटक जाते हैं। वह माता चाहे चार पैरवाली, पाँच पच्चीस पैर वाली हो, सौ पैर वाली हो या दो पैर वाली हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हर योनि में मुसीबत तो सहनी ही पड़ती है।&lt;br /&gt;तन धरिया कोई न सुखिया देखा।&lt;br /&gt;जो देखा सो दुखिया रे....।।&lt;br /&gt;इस प्रकार विचार करके जो साधक अपना सहज स्वातंत्र्य पाना चाहते हैं, 'स्व' के तंत्र होना चाहते हैं उन लोगों के लिए आध्यात्मिक मार्ग सर्वस्व है।&lt;br /&gt;हमारा प्राण नियंत्रित होगा तो शरीर में विद्युतशक्ति बनी रहेगी। शरीर निरोग रहेगा, मन एकाग्र बनेगा, बुद्धि का विकास होगा। अगर मन को एकाग्र करोगे तो प्राण नियंत्रित रहेंगे।&lt;br /&gt;समाधि में आंतरिक सुख से मन का समाधान हो जाय तो बाहर के सुख की याचना नहीं रहती। आकर्षण भी नहीं रहता। दुःख तभी होता है जब बाहर के सुख की आंकाक्षा होती है। जिसको आंकाक्षा नही होती उसको उन चीजों के न मिलने पर दुःख नहीं होता और मिलने पर कोई बन्धन नहीं होता। दुःख का मूल है वासना और वासना होती है सुख पाने के लिए। वास्तव में सुख हमारा स्वभाव है। दुःख हमारा स्वभाव नहीं है। मुँह&amp;nbsp; में दाँत रहना स्वभाव है, तिनका रहना स्वभाव नहीं है। सरोवर की सतह पर घण्टों भर तैरना संभव है लेकिन सरोवर के तले में दीर्घकाल तक रहना सहज संभव नहीं है। ऐसे ही दुःख नीचाई है। हम कभी उसे पसन्द नहीं करते लेकिन वासना के कारण गिरते हैं, दुःख पाते हैं।&lt;br /&gt;अब हमें क्या करना चाहिए? प्राणों को, मन को और शरीर को एकतान रखना चाहिए।&lt;br /&gt;जब तुम जप करो तब कोई एक आसन पसन्द कर लो सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन आदि। किसी एक आसन में बैठकर ही जप करो। जितना हो सके, जप करते समय इधर उधर झाँके नहीं। दृष्टि नासाग्र रखें, श्वास पर रखें या गुरु गोविन्द के चित्र पर रखें। तन एकाग्र होगा तो मन भी एकाग्र होगा। मन एकाग्र होगा तो स्थूल प्राण को सूक्ष्म करने के लिए कुण्डलिनी शक्ति जागृत होगी। फिर शरीर रिधम से हिलेगा। शरीर में कहीं वात-पित्त-कफ के दोष होंगे तो उन्हें शुद्ध करने के लिए भीतर से धक्का लगेगा प्राणों को तो अपने आप यथा योग्य आसन होने लगेंगे, तेजी से प्राणायाम होने लगेगा। प्रारम्भ में प्रतिदिन आठ-दस प्राणायाम करने का नियम तो ले लें किन्तु जब प्राणोत्थान होगा तो प्राणायाम और विभिन्न आसन अपने आप होने लगेंगे। समर्थ सदगुरु जब संप्रेक्षण शक्ति से मंत्रदीक्षा देते हैं तब साथ ही साथ, संकल्प के द्वारा साधक के चित्त में बीज बो देते हैं। साधक अहोभाव से साधन-भजन में लगा रहता है तो वह बीज शीघ्र ही पनप उठता है। साधक तीव्र गति से साधना में आगे बढ़ने लगता है। महामाया कुण्डलिनी शक्ति उसकी साधना की डोर सँभाल लेती है।&lt;br /&gt;प्रारंभ में इस बात का पता नहीं चलता कि कितना बढ़िया बीज हमारे चित्त में बोया गया है। जैसे, किसान खेत में बोआई करता है तब देखनेवाला जान नहीं सकता कि जमीन में बीज पड़े हैं कि नहीं। लेकिन किसान जानता है। जब खेत की सिंचाई होती है और बीज अंकुरित होकर पनप उठते हैं, छोटी-छोटी पत्तियाँ निकल आती हैं, सारा खेत लहलहा उठता है तब राहदाही भी जान सकते हैं कि किसान ने बीज बोये थे।&lt;br /&gt;ऐसे ही मंत्रदीक्षा के समय साधक को जो मिलता है वह सबको ज्ञान नहीं होता। जब साधक साधना में लगा रहता है तो समय पाकर वह बीज कहो, गुरुदेव का संकल्प कहो, आशीर्वाद कहो, शक्तिपात कहो, चाहे जो कुछ कहो, वह पनपता है।&lt;br /&gt;माँ के उदर में जब गर्भाधान होता है, बच्चा आ जाता है उस समय नहीं दिखता। कुछ महीने के बाद माँ को महसूस होता है और उसके बाद दूर के लोगों को भी महसूस होता है कि यह महिला माँ होने वाली है।&lt;br /&gt;साधक को जब दीक्षा मिलती है तब उसका नवजन्म होता है।&lt;br /&gt;दीक्षा का मतलब इस प्रकार हैः दी = दीयते, जो दिया जाय। क्षा = जो पचाया जाय।&lt;br /&gt;देने योग्य तो सचमुच केवल आध्यात्मिक प्रसाद है। बाकी की कोई भी चीज दी जाय, वह कब तक रहेगी?&lt;br /&gt;जो ईश्वरीय प्रसाद देने की योग्यता रखते हैं वे गुरु हैं। जो पचाने की योग्यता रखता है वह साधक है, शिष्य है। देने वाले का अनुग्रह और पचाने वाले की श्रद्धा, इन दोनों का जब मेल होता है तब 'दीक्षा' की घटना घटती है।&lt;br /&gt;दीक्षा तीन प्रकार की होती हैः शांभवी दीक्षा, जो निगाहों से दी जाती है। स्पर्श दीक्षा, जैसे शुकदेवजी ने परीक्षित के सिर पर हाथ रखकर दी थी। तीसरी है मांत्रिक दीक्षा। गुरु-गोविन्द का, भगवान का कोई नाम दे देना।&lt;br /&gt;मांत्रिक दीक्षा में मंत्र देने वाले का चित्त जैसी ऊँचाई पर होता है वैसा उस मंत्र का प्रभाव पड़ता है। कोई भाड़भूँजा तुम्हें कह दे कि 'राम राम जपो, कल्याण हो जायगा....' तो इतना गहरा कल्याण नहीं होगा जितना कोई ब्रह्मवेत्ता सत्पुरुष राम मंत्र दें और कल्याण हो जाय। रामानंद स्वामी ने ऐसे ही 'राम.... राम' उच्चारण किया और कबीर जी ने गहरी श्रद्धा से पकड़ लिया कि गुरुदेव के श्रीमुख से मंत्र मिल गया है, तो कबीर जी उस मंत्र से सिद्ध हो गये। मंत्र तो वही है लेकिन मंत्र देने वाले की महिमा है। कोई चपरासी कुछ कह दे तो उसकी अपनी कीमत है और प्रधान मंत्री वही बात कह दे तो प्रभाव कुछ और ही पड़ेगा।&lt;br /&gt;आध्यात्मिकता में जो उन्नत हैं उनके द्वारा मंत्र मिलता है और सामने वाला श्रद्धा से साधना करता है तो मंत्र उसको तार देता है। मंत्र का अर्थ ही हैः मननात् त्रायते इति मंत्रः। जिसका मनन करने से जो त्राण करे, रक्षा करे वह है मंत्र। अंतर में मनन करने से मंत्र मन को तार देता है।&lt;br /&gt;मांत्रिक दीक्षा में जितने शब्द कम होते हैं और मंत्रोच्चारण जितना तालबद्ध होता है उतनी साधक को सुविधा रहती है, वह जल्दी से आगे बढ़ता है।&lt;br /&gt;मांत्रिक दीक्षा में अगर कोई संप्रदाय चलाना है, कोई मजहब पकड़ रखना है तो उसमें ख्याल रखा जायगा कि मंत्र दूसरों से कुछ विलक्षण हो। ऐसे मजहब-संप्रदायों में साधक की उन्नति मुख्य नहीं है, संप्रदाय का गठन मुख्य है। संप्रदाय का गठन करने वाले जो भी संप्रदाय के आचार्य हैं उनको उनका कार्य मुबारक हो। नारदजी ऐसे सांप्रदायिक संत नहीं थे। नारदजी के लिए सामने वाले की उन्नति मुख्य थी। सामने वाले के जीवन की उन्नति जिनकी दृष्टि में मुख्य होती है वे लोक संत होते हैं। नारद जी ने वालिया लुटेरा को मंत्र दिया 'रा....म'। 'रा' लम्बा और 'म' छोटा। वालिया मूलाधार केन्द्र, स्वाधिष्ठान केन्द्र में जीने वाला आदमी है। उन केन्द्रों में इस मंत्र के आन्दोलन पड़ेंगे तो धीरे-धीरे वह अनाहत केन्द्र में, हृदय केन्द्र में पहुँचेगा ऐसा समझकर नारदजी ने मांत्रिक दीक्षा देते समय शांभवी दीक्षा का भी दान कर दिया, निगाहों से उसके अंतर में अपने किरण डाल दिये। वालिया लुटेरा लग गया मंत्र जाप में। 'मरा... मरा.... मरा...मरा...' तालबद्ध मंत्र जपते-जपते उसकी सुषुप्त कुण्डलिनी शक्ति जाग्रत हुई और वालिया लुटेरा आगे जाकर वाल्मीकि ऋषि बन गया।&lt;br /&gt;मंत्रदीक्षा देने वाले महापुरुष और लेने वाला साधक दोनों बढ़िया होते हैं तो साधना और सिद्धि भी बढ़िया हो जाती है। कभी-कभी ऐसा भी हो सकता है कि मंत्रदीक्षा लेने वाले की अत्यंत श्रद्धा है, साधना में अत्यंत लगन है, नियमबद्ध अभ्यास है तो देने वाला कोई साधारण व्यक्ति भी हो फिर भी लेने वाला आगे निकल सकता है। अधिक लाभ तो तब होता है जब देने वाला भी खूब ऊँचे हों और लेने वाला भी अडिग हो। ऐसे मौके पर कार्य अधिक सुन्दर और सुहावना होता है।&lt;br /&gt;साधक अगर आसन, प्राणायाम आदि नियम से करता रहे तो उसका तन निरोगी रहेगा, प्राण थोड़े नियंत्रित रहेंगे। प्राणायाम करने से प्राणों में तालबद्धता आती है। हमारे प्राण तालबद्ध नहीं हैं इसलिए छोटी-छोटी बातों में हमारा मन चंचल हो जाता है। साधारण लोग और योगियों में इसी बात का फर्क है। योगी बड़ी-बड़ी आपत्तियों में इतने विक्षिप्त नहीं होते क्योंकि उन्होंने प्राणायाम आदि करके मन और प्राण को तालबद्ध किया हुआ होता है। उनमें सब पचा लेने की शक्ति होती है।&lt;br /&gt;पहले समय में लकड़े के पुल होते थे। सेना की कोई बटालियन जब कूच करती है तब एक... दो.... एक..... दो, इस प्रकार तालबद्ध कदम मिलाकर चलती है। उस समय में जब लकड़े के पुल पर से सेना गुजरती तब केप्टन सेना को आज्ञा देता कि ताल तोड़ो। तालबद्ध कदम पड़ने से ताकत पैदा होती है और उससे लकड़े का पुल टूट सकता है।&lt;br /&gt;तालबद्धता में शक्ति है। कोई बिना ताल के गीत गाये तो मजा नहीं आएगा। साधनों के साथ स्वर मिलाकर गाया जाय तो पूरी सभा डोलायमान हो सकती है। संगीत के साधन सबके स्वर मिलाने में सहयोग देते हैं।&lt;br /&gt;तालबद्धता में एक प्रकार का सुख और सामर्थ्य छुपा है। हमारे प्राण अगर तालबद्ध चलने लग जायें तो सूक्ष्म बनेंगे। श्वास तालबद्ध होगा तो दोष अपने आप दूर हो जायँगे। श्वास सूक्ष्म और तालबद्ध नहीं है इसलिए काम सताता है। श्वास तालबद्ध नहीं है इसलिए क्रोध प्रभाव डाल देता है। रोग, शोक, मोह आदि सब प्राणों की तालबद्धता के अभाव में होते हैं। प्रतिदिन अगर थोड़ा समय भी श्वास या प्राणों की तालबद्धता के लिए निकालें तो बहुत-बहुत लाभ होगा।&lt;br /&gt;मानो, हमें क्रोध आ रहा है। उस समय जाँचो तो पता चलेगा कि श्वास का ताल विशेष विकृत होगा। उस समय क्या करना चाहिए? अपने श्वास को देखो, सावधान होकर निहारो प्राण की गति को। क्रोध पर नियंत्रण आ जाएगा।&lt;br /&gt;हम कभी चिन्ता में हैं। चित्त में कुछ बोझा है। तो क्या करें? शुद्ध हवा में मुँह के द्वारा लम्बे-लम्बे श्वास लो। नथुनों से बाहर निकालो। फिर मुँह से लम्बे श्वास लो और नथुनों से निकालो। इस प्रकार दस बारह बार करो। तुम्हारी उदासी में, चिन्ता में जरूर परिवर्तन आ जायगा।&lt;br /&gt;मान लो, किसी के चित्त में कोई पुरानी गन्दी आदत है। कई युवकों को हस्तमैथुन की आदत होती है। पाप की पराकाष्ठा है वह। ऐसी आदतवाले युवक को अगर बदलना है तो उसको प्राणायाम सिखाया जाय।&lt;br /&gt;हस्तमैथुन जैसी भद्दी आदतवाला युवक रात को सोता है और सुबह को जब उठता है तब उसका चेहरा देखकर&amp;nbsp; पता चलता है कि वह रात को अपनी ऊर्जा का सत्यानाश करता है। मनुष्य भीतर दुःखी होता है तो और दुःख का सामान इकट्ठा करता है। सत्संग नहीं मिलता है, साधन-भजन नियमित नहीं होता है, भीतर का थोड़ा-बहुत रस नहीं आता। तब आदमी कामचेष्टा या और पाप कर्म करता है।&lt;br /&gt;ऐसे लोगों को भी मोड़ना है, आगे बढ़ाना है तो उन्हें प्राणायाण सिखाया जाय। उनके प्राणों में थोड़ी सूक्ष्मता लायी जाय। वे बदल जाएँगे। उनके जीवन में मानो जादू हो जाएगा।&lt;br /&gt;इन्द्रियों का स्वामी मन है और मन का स्वामी प्राण है। योगियों का कहना है कि अगर प्राण का पूरा प्रभुत्व आ जाय तो चंदा और सूरज को गेंद की तरह अपनी इच्छा के मुताबिक चला सकते हो। सती शाण्डिली ने सूरज को रोका था। नक्षत्रों को अपनी जगह से तुम हिला सकते हो, अगर प्राणशक्ति को अत्यंत सूक्ष्म कर लो तो।&lt;br /&gt;जिसने केवली कुंभक की साधना कर ली है उसके आगे संसारी लोग अपनी शुभ कामना की मनौती माने तो उनके कार्य होने लगते हैं। प्राणायाम का ऊँचा फल जिसने पाया है, प्राणों पर नियंत्रण पाकर जिसने मन को जीत लिया है उसने सब कुछ जीत लिया है। जिसने मन को जीत लिया उसने प्राण को जीत लिया।&lt;br /&gt;कभी अपने को हताश और निराश न करो, क्योंकि तुम प्राण लेते हो और मन भी तुम्हारे पास है। थोड़ा-बहुत साधना का मार्ग भी तुम्हारे पास है। ऐसी बात समझने की थोड़ी बहुत श्रद्धा, भक्ति और बुद्धि भी भगवान ने दी है। अतः घबराना नहीं चाहिए। कैसी भी कमजोरी हो, पहले का कैसा भी पलायनवाद घुसा हो फिर भी उत्साहपूर्वक निश्चय करो किः&lt;br /&gt;"मैं सब कुछ कर सकता हूँ। ईश्वर का अनन्त बल मुझमें सुषुप्त पड़ा है। मैं उसे जगाऊँगा।"&lt;br /&gt;मन और प्राण प्रकृति के हैं। प्रकृति परमात्मा की है। मन और प्राण का उपयोग तो करो, फिर मन और प्राण भी परमात्मा को अर्पण कर दो। प्राणायाम आदि करो, मन को एकाग्र करो, अपने नियंत्रण में लाओ, फिर ऐसा चिन्तन करो कि 'इन सब को देखने वाला मैं साक्षी, चैतन्य आत्मा हूँ।' ऐसा चिन्तन किया तो मन और प्राण ईश्वर को अर्पित हो गये। यह हो गया भक्ति योग। इससे भाव की शुद्धि होगी और बुद्धि परमात्मा में प्रतिष्ठित होगी।&lt;br /&gt;जो कर्मकाण्ड का अधिकारी है उसको कर्मकाण्ड में रूचि बढ़े ऐसे लोगों का ही संग करना चाहिए। जो उपासना का अधिकारी है, उसको उपासना में दृढ़ता रहे, उपासना में प्रीति बढ़े ऐसे वातावरण में और ऐसे संग में रहना चाहिए। उपासना करने वाला अगर विचार करेगा, बुद्धि का उपयोग करेगा तो उपासना से च्युत हो जायगा। उपासना का मार्ग यह है कि तुम श्रद्धा से उन्नत हो जाओ। जैसे, है तो शालिग्राम लेकिन आदि नारायण हैं। है तो शिवलिंग लेकिन कैलासपति भगवान शंकर हैं। कैलासपति मानकर उपासना करते हैं तो ठीक है लेकिन उपासक अगर विचार करे कि, 'कैलास में भगवान शंकर हैं कि नहीं, क्या पता....' तो वह उपासना से च्युत हो जायगा। पहले के जमाने में पैदल जाना होता था। कैलास में कैलासपति है कि नहीं यह पता लगाने का कोई साधन नहीं था। वहाँ भगवान हैं ही ऐसी श्रद्धा बनी रहती थी। लेकिन आजकल हेलिकोप्टर आदि साधनों से कहीं भी खोजबीन की जा सकती है पर उपासना के लिए ऐसी बुद्धि चलाना इष्ट नहीं है। उपासक को तो अपनी श्रद्धा बढ़ा-बढ़ाकर आगे बढ़ना चाहिए। वहाँ विचार की आवश्यकता नहीं है।&lt;br /&gt;कर्मकाण्डी अगर सीधा उपासना में आ जाएगा तो कर्म में उसकी रूचि टूट जाएगी। उपासक अगर विचार में आ जाएगा तो उपासना में रूचि टूट जाएगी। अतः जिस समय जो करते हैं उसमें लग जाओ। जिस साधक को जो साधन ज्यादा अनुकूल पड़ता हो उसमें दृढ़ता से लग जाये। तत्परता से साधना करे।&lt;br /&gt;अगर प्राणोपासना में कोई ठीक से लग जाय तो उसका केवली कुंभक सिद्ध होता है। जिसका केवली कुंभक सिद्ध हो गया हो उसके आगे दूसरे लोगों की मनोकामनाएँ पूर्ण होने लगती हैं तो उसकी अपनी कामनाओं का तो पूछना ही क्या?&lt;br /&gt;मन, प्राण और शरीर इन तीनों का आपस में जुड़वे भाई जैसा सम्बन्ध है। शरीर भारी रहता हो तो प्राणायाम आदि करने से वह हल्का बन सकता है। एक बात खास याद रखें कि कभी बिना आसन के न बैठो। कोई भी एक आसन पंसन्द करो, बार-बार उसी आसन में बैठो। इससे मन पर थोड़ा प्रभाव आएगा। मन पर प्रभाव आएगा तो प्राण सूक्ष्म होने लगेंगे। कुण्डलिनी जगेगी। फिर जो कुछ क्रिया होने लगे उसको रोको नहीं। ध्यान करते समय शरीर घण्टी की तरह घूमता है या उछलकूद मचाता है तो उसको रोको मत। लेकिन ऐसे ही भजन में बैठे हो तो शरीर को चंचल मत रखो। बन्दर की तरह इधर हिले, उधर हिले, इधर झाँका, उधर झाँका..... ऐसे नहीं। बिना प्रयोजन की फालतू चेष्टाओं से शरीर को बचाओ। इससे मन की एकाग्रता बढ़ेगी।&lt;br /&gt;हम साधन-भजन करते हैं तो मन थोड़ा-सा एकाग्र होता है, प्राण थोड़े सूक्ष्म होते हैं। शरीर में एक प्रकार की बिजली पैदा होती है, पित्त का प्रभाव बढ़ता है। शरीर का भारीपन और आलस्य दूर होता है, स्फुर्ति आती है।&lt;br /&gt;तुलसी के पत्ते सात दिन तक बासी नहीं माने जाते। बेलफल तीन दिन तक बासी नहीं माना जाता। कमल का फूल दो दिन तक बासी नहीं माना जाता। दूसरे फल एक दिन तक बासी नहीं माने जाते।&lt;br /&gt;तुलसी के पाँच पत्ते चबाकर पानी पियें तो शरीर में विद्युत शक्ति बढ़ती है। तुलसी में विद्युत तत्त्व ज्यादा है। तो क्या तुलसी दल ज्यादा खा लें? नहीं, नहीं। पाँच पत्ते ही काफी हैं। शरीर को तन्दुरुस्त रखने में सहायक होंगे।&lt;br /&gt;कभी-कभी अपने इष्ट को प्यार करते हुए ध्यान करना चाहिए, उपासना करनी चाहिए। वे इष्ट चाहे भोलेनाथ हों, भगवान राम हों, भगवान कृष्ण हों, कोई देवी देवता हो चाहे अपने सदगुरुदेव हों, जिनमें तुम्हारी अधिक श्रद्धा हो उन्हीं के चिन्तन में रम जाओ। रोना हो तो उन्हीं के विरह में रोओ। हँसना हो तो उन्हीं को प्यार करते हुए हँसो। एकाग्र होना तो उन्हीं के चित्र को एकटक निहारते हुए एकाग्र बनो।&lt;br /&gt;इष्ट की लीला का श्रवण करना भी उपासना है। इष्ट का चिन्तन करना भी उपासना है। इष्ट के लिए रोना भी उपासना है। मन ही मन इष्ट के साथ चोरस खेलना भी उपासना। इष्ट के साथ मानसिक कबड्डी खेलना भी उपासना है। इष्ट के कुस्ती खेलना भी उपासना है। ऐसा उपासक शरीर की बीमारी के वक्त सोये सोये भी उपासना कर सकता है। उपासना सोते समय भी हो सकती है, लेटे लेटे भी हो सकती है, हँसते हँसते भी हो सकती है, रोते रोते भी हो सकती है। बस, मन इष्टाकार हो जाय।&lt;br /&gt;मेरे इष्ट गुरुदेव थे। मैं नदी पर घूमने जाता तो मन ही मन उनसें बातें करता। दोनों की ओर होने वाला संवाद मन ही मन घड़ लेता। मुझे बड़ा मजा आता था। दूसरे किसी इष्ट के प्रत्यक्ष में कभी बात हुई नहीं थी, उसकी लीला देखी नहीं थी लेकिन अपने गुरुदेव पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी भगवान का दर्शन, उनका बोलना-चालना, व्यवहार करना आदि सब मधुर लीलाएँ प्रत्य़क्ष में देखने को मिलती थी, उनसे बातचीत का मौका भी मिला करता था। अतः एकान्त में जब अकेला होता तब गुरुदेव के साथ मनोमन अठखेलियाँ कर लेता। अभी भी कभी-कभी पुराने अभ्यास के मुताबिक घूमते-फिरते अपने साँईं से बातें कर लेता हूँ, प्यार कर लेता हूँ। साँईं तो साकार नहीं हैं, अपने मन के ही दो हिस्से हो जाते हैं। एक साँईं होकर प्रेरणा देता है दूसरा साधक होकर सुनता है। क्योंकि साँईं तत्त्व व्यापक होता है, गुरुतत्त्व व्यापक होता है।&lt;br /&gt;कभी-कभी उपासक शिकायत करता है कि मेरा मन भगवान में नहीं लगता है। इसी प्रकार करे तो ही भगवान में मन लगा है। ऐसी बात नही है । और किसी ढंग से भी मन भगवान में लग सकता है। जो लोग थोड़े भी उन्नत उपासक हैं उनका मन जब चाहे तब भगवान में लग सकता है।&lt;br /&gt;मेरे गुरुदेव कभी-कभी अकेले कमरे में बैठे-बैठे भगवान के साथ विनोद करते। उनका भगवान तो तत्त्व रूप में था। वे जगे हुए महापुरुष थे। वे एकांत में कभी-कभी ठहाका मारकर हँसते। मोर की तरह आवाज करतेः&lt;br /&gt;"पियू&amp;nbsp; ऽऽऽऽ....!"&lt;br /&gt;फिर अपने आपको कहतेः&lt;br /&gt;"बोल,लीलाशाह !"&lt;br /&gt;वे अपने आपको 'शाह' नहीं बोलते थे, पहले दो अक्षर ही अपने लिए बोला करते थे, लेकिन मुझसे वह नाम बोला नहीं जाता। वे अपने आपसे संवाद-वार्ता-विनोद करतेः&lt;br /&gt;"बोल,लीलाशाह !"&lt;br /&gt;"जी साँईं !"&lt;br /&gt;"रोटी खाएगा?"&lt;br /&gt;"हाँ, साँईं ! भूख लगी है।"&lt;br /&gt;"रोटी तब खायगा जब सत्संग का मजा लेगा। लेगा न बेटा ?"&lt;br /&gt;"हाँ महाराज ! लूँगा, जरूर लूँगा।"&lt;br /&gt;"कितनी रोटी खाएगा। ?"&lt;br /&gt;"तीन तो चाहिए।"&lt;br /&gt;"तीन रोटी चाहिए तो तीनों गुणों से पार होना है। बोल, होगा न ?"&lt;br /&gt;"हाँ, साँईं, पार हो जाऊँगा लेकिन अभी तो भूख लगी है।"&lt;br /&gt;"अरे भूख तुझे लगी है ? झूठ बोलता है ? भूख तेरे प्राणों को लगी है।"&lt;br /&gt;"हाँ साँई, प्राणों की लगी है।"&lt;br /&gt;"शाबाश ! अब भले रोटी खा, लीलाशाह ! रोटी खा !"&lt;br /&gt;ऐसा करके विनोद करते और फिर भोजन पाते। उनकी उपासना-काल का कोई अभ्यास पड़ा होगा तो नब्बे साल की उम्र में भी ऐसा किया करते थे.&lt;br /&gt;यह सब बताने के पीछे मेरा प्रयोजन यह है कि तुम्हें भी उपासना की कोई कुंजी हाथ लग जाय।&lt;br /&gt;इष्ट का चिन्तन करना अथवा इष्टों का इष्ट आत्मा अपने को मानना और शरीर के अपने से अलग मानकर चेष्टा और चिन्तन करना यह भी उपासना के अंतर्गत आ जाता है।&lt;br /&gt;लड़की जब ससुराल जाती है तब मायका छोड़ते हुए कठिनाई लगती है। जब ससुराल में सेट हो जाती है तो मायके कभी-कभी ही आती है। आती है तब भी उसके पैर अधिक टिकते नहीं। कुछ ही समय में वह चाहती है कि अब जाऊँ अपने घर। आज तक जिसको अपना घर मान रही थी वह धीरे-धीरे भाई का घर हो जाता है, बाप का घर हो जाता है। पति का घर ही अपना घर हो जाता है।&lt;br /&gt;ऐसे ही उपासक अपने इष्ट के साथ ब्याहा जाता है तो उसको इष्ट का चिन्तन अपना लगता है और संसार का चिन्तन पराया लगता है।&lt;br /&gt;संसार तुम्हारा पराया घर है। असली घर तो है भगवान, आत्मा-परमात्मा। वह प्यारा तुम्हारा बाप भी है, भाई भी है, पति भी है, सखा भी है, जो मानो सो है। लड़की का पति सब नहीं हो सकता लेकिन साधक का पति सब हो सकता है। क्योंकि परमात्मा सब कुछ बना बैठा है।&lt;br /&gt;गुरु को जो शरीर में ही देखते हैं वे देर-सबेर डगमग हो जाते हैं। गुरु को शरीर मानना और शरीर को ही गुरु मानना यह भूल है। गुरु तो ऐसे हैं जिससे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। 'शिवमहिम्न स्तोत्र' में आता हैः&lt;br /&gt;नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्।&lt;br /&gt;गुरु से ऊपर कोई भी तत्त्व नहीं है। गुरु तत्त्व सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त होता है। अतः गुरु को केवल देह में ही देखना, गुरु को देह मानना यह भूल है।&lt;br /&gt;मैं अपने गुरुदेव को अपने से कभी दूर नहीं मानता हूँ। आकाश से भी अधिक सूक्ष्म तत्त्व हैं वे। जब चाहूँ तब गोता मारकर मुलाकात कर लेता हूँ।&lt;br /&gt;ऐसे सर्वव्यापक परम प्रेमास्पद गुरुतत्त्व को इसी जीवन में पा लेने का लक्ष्य बना रहे। साधक यह लक्ष्य न भूले। ध्यान-भजन में भी लक्ष्य भूल जाएगा तो निद्रा आयेगी, तंद्रा आयेगी।&lt;br /&gt;साधक चिंतन करता रहे कि मेरा लक्ष्य क्या है। ऐसा नहीं कि चुपचाप बैठा रहे। निद्रा, तंद्रा, रसास्वाद आदि विघ्न आ जायें तो उससे बचना है। ध्यान करते समय श्वास पर ध्यान रहे, दृष्टि नासाग्र या भ्रूमध्य में रहे अथवा अपने को साक्षी भाव से देखता रहे। इसमें भी एकाध मिनट देखेगा, फिर मनोराज हो जायेगा। तब लम्बा श्वास लेकर प्रणव का दीर्घ उच्चारण करेः 'ओ....म् ऽऽऽऽ....'&lt;br /&gt;फिर देखे कि मन क्या कर रहा है। मन कुछ न कुछ जरूर करेगा, क्योंकि पुरानी आदत है। तो फिर से गहरा श्वास लेकर होंठ बन्द करके 'ॐ' का गुंजन करे। इस गुंजन से शरीर में आंदोलन जगेंगे, रजो-तमोगुण थोड़ा क्षीण होगा। मन और प्राण का ताल बनेगा। आनन्द आने लगेगा। अच्छा लगेगा। भीतर से खुशी आयेगी। तुम्हारा मन भीतर से प्रसन्न है तो बाहर से भी प्रसन्नता बरसाने वाला वातावरण सहज में मिलेगा। भीतर तुम चिंतित हो तो बाहर से भी चिंता बढ़ाने वाली बात मिलेगी। भीतर से तुम जैसे होते हो, बाहर के जगत से वैसा ही प्रतिभाव तुम्हें आ मिलगा।&lt;br /&gt;जगत तीन प्रकार के हैं- एक स्थूल जगत है जो हम आँखों से देखते हैं, इन कानों से सुनते हैं, इस जिह्वा से चखते हैं, इस नासिका से सूँघते हैं। यह स्थूल जगत है, दूसरा सूक्ष्म जगत है। स्थूल जगत लौकिक जगत है, दूसरा अलौकिक जगत है। इन दोनों से पार तीसरा है लोकातीत जगत। यह है लौकिक अलौकिक दोनों का आधार, दोनों का साक्षी।&lt;br /&gt;जगत को देखने की दृष्टि भी तीन प्रकार की हैः एक है स्थूल दृष्टि या चक्षुदृष्टि, दूसरी मनदृष्टि और तीसरी वास्तविक दृष्टि।&lt;br /&gt;स्थूल जगत में जो कुछ दिखता है यह स्थूल आँखों से दिखता है। सूक्ष्म जगत अंदर के मनः चक्षु से दिखता है। जैसे, किसी साधना के द्वारा हम अपने इष्ट या सदगुरु से अनुसंधान कर लें तो हमें दूर का कुछ अजीब-सा दर्शन होगा। वह लौकिक नहीं होगा, अलौकिक होगा। कभी संगीतवाद्यों के मधुर स्वर सुनाई पड़ेंगे। कभी अलौकिक सुगन्ध आने लगेगी। इस प्रकार के अनुभव हों तब जानना कि मन लौकिक जगत से हटकर अलौकिक जगत में प्रविष्ट हुआ है, बाह्य चक्षु से हटकर आंतरक्षु में गया है। आंतरचक्षु वाले साधक एक दूसरे को समझ सकते हैं जबकि दूसरे लोग उनकी बातों की मजाक उड़ायेंगे।&lt;br /&gt;साधक को अपने आंतर जगत के अनुभव अत्यंत बहिर्मुख लोगों को नहीं सुनाना चाहिए। क्योंकि बहिर्मुख लोग तर्क-कुतर्क करके साधक के अनुभव को ठेस पहुँचा देगा। बाहर के आदमी में तर्क करने की योग्यता ज्यादा होगी और साधक तर्क के जगत में नहीं है, भावना के जगत में है। भाववाला अगर बौद्धिक जगत वाले के साथ टकराता है तो उसके भाव में शिथिलता आ जाती है। इसीलिए साधकों को शास्त्र की आज्ञा है कि अपना आध्यात्मिक अनुभव नास्तिक और निगुरे, साधारण लोगों को नहीं सुनाना चाहिए। आध्यात्मिक अनुभव जितना गोप्य रखा जाए उतना ही उसका प्रभाव बढ़ता है।&lt;br /&gt;मन, प्राण और शरीर इन तीनों का एक दूसरे के साथ जुड़वे भाई जैसा सम्बन्ध है। इसलिए शरीर को ऐसा खुराक मत खिलाओ कि ज्यादा स्थूलता आ जाय। अगर नींबू प्रतिकूल न पड़ता हो तो साधक को भोजन में नींबू लेना चाहिए। प्रतिदिन तुलसी के पत्ते चबाने चाहिए। नंगे पैर कभी भी नहीं घूमना चाहिए। नंगे पैर चलने फिरने से शरीर का विद्युत तत्त्व भूमि में उतर जाता है। भजन के प्रभाव से बढ़ा हुआ विद्युत तत्त्व कम हो जाने से शिथिलता आ जाती है।&lt;br /&gt;शरीर में भारीपन रहने से ध्यान-भजन में मजा नहीं आता, काम करने में भी मजा नहीं आता। जिसको ध्यान-भजन में मजा आता है उस साधक को लौकिक जगत में से अलौकिक सूक्ष्म जगत में जाने की रूचि जगती है। लौकिक जगत में तो कर्म करके, परिश्रम करके थोड़ा सा मजा मिलता है जबकि भावना के जगत में बिना कर्म किये, भावना से ही आनन्द मिलता है। ध्यान के द्वारा, प्रेमाभक्ति के द्वारा साधक को जो मजा मिलता है वह लौकिक जगत के पदार्थों से नहीं मिल सकता। भीतर का मजा ज्यों-ज्यों आता जाएगा त्यों-त्यों बाहर के पदार्थों का आकर्षण छूटता जाएगा। आकर्षण छूटा तो वासना कम होगी। वासना कम होगी तो मन की चंचलता कम होगी। मन की चंचलता कम होगी तो बुद्धि का परिश्रम कम होगा। बुद्धि स्थिर होने लगेगी तो ज्ञानयोग में अधिकार मिल जाएगा।&lt;br /&gt;निष्काम कर्म उपासना का पासपोर्ट देता है उपासना ज्ञान का पासपोर्ट देती है। फिर भी यदि किसी ने पहले उपासना कर रखी है, बुद्धि बढ़िया है, श्रद्धा गहरी है और समर्थ सदगुरु मिल जाते हैं तो सीधा ज्ञान के मार्ग पर साधक चल पड़ता है। जैसे राजा जनक चल पड़े थे वैसे कोई भी अधिकारी साधक जा सकता है। कोई उपासना से शुरु कर सकता है। प्रायः ऐसा होता है कि सत्कर्म, शुभकर्म करते हुए, सदाचार से चलते हुए साधक आगे बढ़ता है। फिर उपासना में प्रवेश होता है। उपासना परिपक्व होने पर ज्ञान मार्ग में गति होने लगती है।&lt;br /&gt;प्रारंभिक साधक को समाज में रहते हुए साधना करने से यह तकलीफ होती है कि उसके इर्दगिर्द पच्चीस लोग भ्रष्टाचारी होते हैं और साधक होता है सदाचारी। वे पच्चीस लोग इसे मूर्ख मानेंगे। उन भ्रष्टाचारियों को पता नहीं होता कि वे अपना मन और जीवन मलिन करके जो कुछ इकट्ठा कर रहे हैं उसका भोग तो उनके भाग्य में जितना होगा उतना ही कर पाएँगे। बाकी से तो उनका आहार, तन और मन अशुद्ध होगा और दुःख देगा। लेकिन वे लोग समझते नहीं और साधक का मजाक उड़ाते हैं।&lt;br /&gt;भोगी विलासी लोग रजो-तमोगुण बढ़ानेवाले आहार लेते हैं और मानते हैं कि हम 'फर्स्ट क्लास' भोजन करते हैं लेकिन वास्तव में इन्हीं आहारों से आदमी 'थर्ड क्लास' होता है। दुनिया की नजरों में अच्छा आहार है उसको साधक समझता है कि यह नीचे के केन्द्रों में ले जाने वाला आहार है। यह 'थर्ड क्लास है।' 'फर्स्ट क्लास' के आहार तो शरीर को तन्दुरुस्त रखता है मन को प्रसन्न रखता है और बुद्धि को तेजस्वी बनाता है।&lt;br /&gt;मैंने सुनी है एक कहानी।&lt;br /&gt;एक मुल्ला की प्रसिद्धि दूसरे मुल्ला-मौलवियों की असह्य हो रही थी। जब तक आत्म-साक्षात्कार नहीं होता तब तक धार्मिक जगत हो जा व्यावहारिक जगत हो, राग-द्वेष चलता रहता है, एक दूसरे के पैर खींचने की चेष्टाएँ होती ही रहती हैं। स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर जब तक है तब तक ऐसा होता ही रहेगा। दोनों शरीरों से जो पार गया, आत्मज्ञानी हो गया उसके लिए यह झंझट नहीं है, बाकी के लिए तो झंझट रहेगी ही।&lt;br /&gt;दूसरे मौलवियों ने इस मुल्ला के लिए बादशाह को शिकायत कर दी। उसके चारित्र्य विषयक कीचड़ उछाल दी। बादशाह ने सोचा कि यह प्रसिद्ध मुल्ला है। इसको अगर दंड आदि देंगे तो राज्य में भी इसके चाहकों की बददुआ लगेगी। वजीरों की राय ली तो उन्होंने कहा कि ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे साँप भी मर जाए और लाठी भी बच जाय। उन्होंने उपाय भी बता दिया। बादशाह ने उस प्रकार अपने महल के चार कमरे में व्यवस्था कर दी। फिर मुल्ला को बुलवाकर कहा गया कि आप रात भर यहाँ अकेले ही रहेंगे। दूसरा कोई नहीं होगा। इन चार कमरों में से किसी भी एक कमरे का उपयोग करोगे तो बादशाह सलामत खुश होंगे और आपको छोड़ दिया जायगा। अगर उपयोग नहीं किया तो जहाँपनाह का अनादर माना जाएगा। फिर वे जो फरमान करेंगे वैसा होगा।&lt;br /&gt;उन चारों कमरों में मुल्ला ने देखा। पहले कमरे में फाँसी लटक रही थी। इस कमरे का उपयोग करना माने फाँसी खाकर मर जाना। मुल्ला आगे बढ़ गया। दूसरे कमरे में हार-सिंगार करके नाज-नखरे करती हुई वेश्या बैठी थी। तीसरे कमरे में मांस-कबाब-अंडे आदि आसुरी खुराक खाने को रखे गये थे। चौथे कमरे में दारू की बोतलें रखी गईं थीं।&lt;br /&gt;मुल्ला ने सोचा कि ऐसी नापाक चीजों का उपयोग मैं कैसे करूँ। मैं दारू क्यों पिऊँ ? मांसाहार भी कैसे कर सकता हूँ ? वेश्यागमन से तो खुदा बचाय ! तो क्या फाँसी खाकर मर जाऊँ ? क्या किया जाय ?&lt;br /&gt;मुल्ला इधर-उधर चक्कर काट रहा है। रात बीती जा रही है। प्यास भी लगी है। उसने सोचाः दारू में पानी भी होता है। पानी से हाथ भी साफ किये जाते हैं। अब बात रही थोड़ी-सी। जरा-सा दारू पी लूँगा। प्यास भी बुझ जायगी और बादशाह सलामत की बात भी रह जायेगी। मैं मुक्त हो जाऊँगा।&lt;br /&gt;मुल्ला ने थोड़ा दारू पी लिया। जिह्वा पर थोड़ा अशुद्ध आहार आ गया तो मन पर भी उसका प्रभाव पड़ गया। थोड़ा और पी लूँ तो क्या हर्ज है ? ऐसा सोचकर किस्म-किस्म के दारू के घूँट भरे, नशा चढ़ा। भूख भी खुली। मन, बुद्धि, प्राण नीचे आ गये। भूख लगी है और खुदा ने तैयार रख ही दिया है तो चलो, खा लें। मुल्ला ने मांस-अंडे-कबाब आदि भर पेट खा लिया। अंडे खाये तो इन्द्रियाँ उत्तेजित हो गईं तो चला गया वेश्या के कमरे में। 'वह बेचारी इन्तजार कर रही है। किसी के मन को खुश करना यह भी तो पुण्यकर्म है।' मन कैसा बेवकूफ बना देता है इन्सान को?&lt;br /&gt;मुल्ला वेश्या के कमरे में गया। सुबह होते-होते उसका सत्त्व खत्म हो गया, शरीर में बल का बुरी तरह ह्रास हो गया। मुल्ला का चित्त ग्लानि से भर गया। 'हाय ! यह मैंने क्या कर लिया? दारू भी पी लिया, अभक्ष्य भोजन भी खा लिया और वेश्या के साथ काला मुँह भी कर लिया। मैं धार्मिक मुल्ला ! पाँच बार नमाज पढ़नेवाला ! और यह मैंने क्या किया ? लोगों को क्या मुँह दिखाऊँगा ?'&lt;br /&gt;हीन भाव से मुल्ला आक्रान्त हो गया और चौथे कमरे में जाकर फाँसी खाकर मर गया। पतन की शुरुआत कहाँ से हुई ? 'जरा-सा यह पी लें।' बस 'जरा-सा.... जरा-सा...' करते-करते मन कहाँ पहुँचाता है ! जरा-सा लिहाज करते हो तो मन चढ़ बैठता है। दुर्जन को जरा सी उँगली पकड़ने देते हो तो वह पूरा हाथ पकड़ लेता है। ऐसे ही जिसका मन विकारों में उलझा हुआ है उसके आगे लिहाज रखा तो अपने मन में छुपे हुए विकार भी उभर आयेंगे। अगर मन को संतों के तरफ, इष्ट के तरफ, सेवकों के तरफ, सेवाकार्यों के तरफ थोड़ा-सा बढ़ाया तो और सेवकों का सहयोग मिल जाता है। उपासना के तरफ मन बढ़ाया तो और उपासक मिल जाते हैं। इस मार्ग में थोड़ा-थोड़ा बढ़ते-बढ़ते मन नारायण से मिलता है और उधर अगर मन मुड़ जाता है तो आखिर में असुर से मिलता है।&lt;br /&gt;असुर से मिलता है, तमस् से मिलता है तो मन नीची योनियों में जाता है। मन अगर साधकों का संग करता है, सत्संग करता है, इष्ट के साथ जुड़ता है तो इष्ट के अनुभव से एक हो जाता है, अहं ब्रह्मास्मि का अनुभव कर लेता है। गुरु का अनुभव अपना अनुभव हो जाता है, श्रीकृष्ण का अनुभव हो जाता है, शिवजी का अनुभव अपना अनुभव हो जाता है, रामजी का अनुभव अपना अनुभव हो जाता है। अन्यथा तो फिर पशु-पक्षी, वृक्ष आदि योनियों में भटकना पड़ता है।&lt;br /&gt;मनुष्य जीवन मिला है। पराधीनता की जंजीरों में जकड़ने वाले विनाश की ओर चलो या परम स्वातंत्र्य के द्वार खोलने वाले विकास की ओर उन्मुक्त बनो, मरजी तुम्हारी।&lt;br /&gt;नारायण..... नारायण.... नारायण.... नारायण.... नारायण....।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5113688638599628772-2535385051828656479?l=hariomprabhu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/feeds/2535385051828656479/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/06/blog-post.html#comment-form' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/2535385051828656479'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5113688638599628772/posts/default/2535385051828656479'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://hariomprabhu.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title=''/><author><name>DEEPAK</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07747454672529741023</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='33' height='26' src='http://3.bp.blogspot.com/-SYU1kli6gA4/TXJ-0PC2mJI/AAAAAAAAAY4/MN_oJ9Hu2-4/s220/IMG0345A.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/-29RzSd1hmhs/TfXbfUBz_RI/AAAAAAAAAgk/WNNJ9K9vd3s/s72-c/251310_136704789737025_100001925140865_239603_1094509_n.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5113688638599628772.post-1916127201639163615</id><published>2011-05-30T12:42:00.003+05:30</published><updated>2011-05-30T12:45:28.330+05:30</updated><title type='text'></title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; 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